Thursday, May 31, 2018

दो कविताएं

समय से मुठभेड़
तुम चाहते हो कि हरेक आंगन तक
गुनगुनी धूप पहुंचे ताकि
कोई ठिठुरती सर्दी में न कंपकंपाये
तुम चाहते हो कि हरेक दर्पण बिना धूल के हो
ताकि पारदर्शिता में कोई बाधा न आये
तुम चाहते हो कि हरेक शाख पे मौसम बराबर
बना रहे ताकिवसंत में भी कोई शाख पतझड़ में डूब
मातम न मनाये
तुम चाहते हो कि हरेक नदी में पानी अठखेलियाँ
करता रहे ताकि मछलियाँ कभी बेमौत न मरें
तुम चाहते हो कि हरेक बाजार में जिन्दगी का सामान बिके
ताकि हरेक घर में होली दीवाली रहे
तुम चाहते हो कि सारे पेड़ फलों फूलों से लदे रहें
ताकि यह उपवन सदा महका महका रहे
तुम चाहते हो कि हरेक बदल बरस बरस कर मुड़े
ताकि कोई पपीहा प्यासा न रहे
तुम चाहते हो कि हरेक दीवार पे चस्पा इश्तिहार
रौशनी से सराबोर हो ताकि कहीं भी
अंधेरों का साम्राज्य न पनप पाए
परन्तु मेरे प्रिय कवि
तुम्हारे चाहने भर से शायद कुछ न हो पायेगा
क्योंकि बहुत से गिद्ध रक्त मांस की पिपासा लिए
तुम्हारी चाहतों के खिलाफ इक्कठे हो गये हैं
तुम अकेले किस किस से भिड़ोगे
यह सोचकर कभी हार मत जाना युद्ध से भाग मत जाना
तुम्हारे पास हथियार है कलम
उठाओ कलम और मुठभेड़ करो समय से
आखिरी सांस तक लड़ो गिद्धों से जीत हार तो बाद की बात है
संभव है तुम्हारी चाहतें एक दिन पूरी हो जाएं ||


     अम्बार बमों के
अम्बार बमों के लगाने लगा है आदमी |
डंका युद्ध का बजाने लगा है आदमी ||

तबाही के सिवा नहीं है कुछ जिस मुकाम पर |
रास्ते उस तरफ बनाने लगा है आदमी ||

कभी अल्लाह तो कभी ईश्वर के नाम पर |
सियासत अपनी चमकाने लगा है आदमी ||

जमाने में बढ़ गई है भूख इस कदर |
बेबस आदमी को खाने लगा है आदमी ||

जानवरों से तो बेखौफ है मगर |
खौफ अपनी ज़ात से खाने लगा है आदमी ||

छीनकर मजलूम - बेसहारों का हक़ |
ताले तिजोरियों पर लगाने लगा है आदमी ||

बुलंदियां आसमां की छूकर भी आज |
कदमों पे ही रुक जाने लगा है आदमी ||

दर्द आज सब कुछ बन गया है आदमी मगर |
आदमी बनने से कतराने लगा है आदमी ||

                                    अशोक दर्द

Monday, May 7, 2018

kavita


बर्फ और पहाड़ की कविता ......

ऊँचे देवदारों की फुनगियों पर फिर
सफेद फाहे चमकने लगे हैं
सफेद चादर में लिपटे पहाड़ फिर दमकने लगे हैं |

पगडंडियों पर पैरों की फच फच से
उभर आये हैं गहरे काले निशान
दौड़ती बतियाती बस्तियां हो गई हैं फिर से खामोश गुमसुम वीरान |

टपकती झोंपड़ियों और फटे कम्बलों
के बीच से निकलने लगी हैं ठंडी गहरी सिसकारियां
भीगे मौजे और फटे जूते करने लगे हैं जैसे युद्ध की तैयारियां |

फिर भी सब कुछ ठंडा ठंडा नहीं है यहाँ
कुछ हाथों में दस्ताने भी हैं और बदन पे गर्म कोट भी
फैंक रहे हैं वे एक दूसरे पर बर्फ के गोले
खिंचवा रहे हैं एक दूसरे से चिपक कर फोटो |

वाच रहे हैं बर्फ का महात्म्य
सिमट कर एक दूसरे की बाहों में होटलों के गर्म कमरों में
काफी की चुस्कियां लेते हुए |

गाँव में तो सिमट गया है पहाड़ चूल्हों के भीतर
ठेकेदार का काम बंद है बर्फ के पिघलने तक
गरीबु कभी ऊपर बादलों की तरफ देखता है तो कभी अपने कनस्तर में आटा
उसे तो बर्फ में कोई सौन्दर्य नजर नहीं आता |

इसमें सौन्दर्य उन्हें दीखता है जिनके कनस्तर आटे से भरे पड़े हैं
पैरों में गर्म मौजे हैं बदन पे मंहगे कोट और गले में विदेशी कैमरे
वे बर्फ में फोटो भी खींचते हैं और इसके सौन्दर्य पर कविताएँ भी लिखते हैं |

श्वेत धवल पहाड़ सुंदर तो दिखते हैं परन्तु दूर से
पास आओ तो इनकी दुर्गमता व कठिनता बड़ी विशाल है
यहाँ पीठ पर पहाड़ को धोना पड़ता है
बर्फ के गिरने से बोझ और भी बढ़ जाता है
पहाड़ पर जीने के लिए पहाड़ हो जाना पड़ता है |

            अशोक दर्द