Sunday, February 7, 2016

हाइकू

[1]
बिन बच्चों के
लगता सुनसान
घर मकान |
[2]
खुश थी रात
यादों की बरसात
तुम्हारा साथ |
[3]
उदास मन
सूना सूना आँगन
तुम्हारे बिन |
[4]
अपूर्व थाती
अँधेरे से बचाती
किताबें साथी |
[5]
हवाएं चलीं
फिर याद आ गई
सहमी कलि |
[6]
तुम्हारी याद
गरमाती बदन
जाड़े की धूप |
[7]
जिसने छीना
मजदूर का पसीना
मुश्किल जीना |
                  अशोक 'दर्द'

क्या यह ठीक है

        
जहां लाखों पेट भूख से व्याकुल हों
और तुम रोटी खाओ
अगल बगल में मातम हो और तुम जश्न मनाओ
आँगन आँगन चीत्कारें हों
और तुम नगमे गाओ
चहुँदिशी हो रहा हो रुदन क्रंदन और तुम हँसो हँसाओ
तुम ही कहो क्या यह ठीक है
अगल बगल में आतंक हो और तुम सो जाओ
गलियों में गोलियाँ बरसें और तुम छुप जाओ
बिन छत के यहाँ लाखों हों और तुम महल बनाओ
नन्हें हाथों में छले फूटें और तुम कुछ न कर पाओ
अबलाओं की अस्मत लुटे
और तुम आँख बचाओ
बस्ती बस्ती भेड़ीये घूमें और तुम डर जाओ
तुम ही कहो क्या यह ठीक है .....
विस्तृत फैली हो निर्वस्त्रता और तुम नये नये
परिधान सिलाओ
शोषण अन्याय की चक्की चले और तुम मुंह बिचकाओ
सत्ता ,सौहार्द को बाँट दे और तुम बंट जाओ
कुरसी नई नई चाल चले और तुम बिक जाओ
तुम ही कहो
क्या यह ठीक है ....||

                          अशोक ‘दर्द’