Monday, September 18, 2017








     प्रेम की प्रतिमूर्ति थे डॉक्टर प्रेम भारद्वाज [संस्मरण ]
कुछ लोग संसार में ऐसे होते हैं जिनकी जीवन में आमद खिलखिलाती बहार की तरह होती है और स्मृतियाँ महकती खुशबु की तरह | बेशक वे इस नश्वर शरीर को छोड़ कर परमधाम चले जाएँ परन्तु उनके चाहने वालों को उनके सदैव साथ होने का एहसास बरकरार रहता है | उनकी स्मृतियों के पुष्प सदैव उनके दिल में खिलते रहते हैं उनका प्रेम सदैव जीवन में रंग भरता रहता है ,उनके आदर्श सदैव मार्गदर्शन करते रहते हैं | मेरी मुराद ऐसी ही एक शख्सियत से है जिनकी रहबरी में कई लोगों ने मंजिलें फतह करने की ओर कदम बढाये हैं | उनकी रहबरी में मुझ जैसे व्यक्ति ने भी चंद कदम शब्दों की इस तिलिस्मी दुनिया में बढ़ाये ,उनका नाम है डॉक्टर प्रेम भारद्वाज | यह वह शख्सियत हैं जो स्वयं में एक संस्था थे | शायरी उनके लफ्ज - लफ्ज में समाई थी |
डॉक्टर प्रेम भारद्वाज अपने नाम के अनुरूप प्रेम की एक जीवन्त मिसाल थे | जिससे भी मिलते उसे अपने प्रेम की डोर से बांध लेते | यह उनके व्यक्तित्व का सबसे खूबसूरत पक्ष था | अपने व्यक्तित्व की इसी खूबसूरती के कारण वे लोगों के दिलों पर राज करते थे  | जो भी व्यक्ति उनके सम्पर्क में आता था | उनके व्यक्तित्व का कायल हो जाता था | वे जितने खूबसूरत रचनाकार थे उतने ही खूबसूरत इन्सान भी थे |
उनके साथ जुडी यादों की एक लम्बी श्रृंखला है | मैंने उन्हें सबसे पहले उन्नीस सौ निन्यानवे के पहाड़ी दिवस के कवि सम्मेलन जो बचत भवन चंबा में था वहां देखा था और उनकी रचनाएँ रूबरू सुनी थीं | परन्तु यह एक कवि सम्मेलन में मंच साँझा    करने तक ही सिमित था | उस समय यह शायद भरमौर में एस. डी. एम. थे | जब ये डलहौजी में बतौर एस. डी. एम. थे तो एक दिन बनीखेत में बी. आर. सी. कार्यालय में हमारी मीटिंग लेने आये थे ,मैं डी. पी. ई. पी. में उन दिनों बतौर सी. आर. सी. सी. की प्रतिनियुक्ति पर था | शिक्षा के कई बिन्दुओं पर उन्होंने बड़ी व्यवहारिक बातें बताईं | [ यह तो बाद में पता चला कि वे एच. ए. एस. में आने से पहले शिक्षक रह चुके थे ] मुझे ठीक से याद नहीं जब मैंने अपना परिचय दिया तो मेरे नाम को सुनते ही झट से बोले लिखते हो ,नाम तो पढ़ा है | मैंने हाँ कही तो बोले मीटिंग के बाद मिलना , मैं भी इसी बीमारी का मरीज हूँ | खैर मीटिंग के बाद मैं उनसे मिला | लेखन पर थोड़ी बहुत बातचीत हुई और उन्होंने कहा कि डलहौज़ी आये तो मुझसे मिलना | मैं उन दिनों नवोदित था जबकि वे हिमाचल के स्थापित एवं मूर्धन्य रचनाकार थे |
   एक दिन मैं डलहौजी गया तो उनके दफ्तर पहुँच गया | फिर वे मुझे अपने आवास पे ले आये वहां उन्होंने अपनी दो किताबे अपने हस्ताक्षरों के साथ  ‘एक मौसम ख़राब है” और दूसरी  ‘लोक कथा मानस”  दीं जो आज तक मैंने अमूल्य पूँजी की तरह संभाल कर रखीं हैं | उसके बाद हमारी मित्रता गुरु शिष्य की तरह समझ लो या अनुज अग्रज की तरह समझ लो , बढ़ती गई | कई कवि सम्मेलनों में हम साथ साथ रहे |
एक बार की बात है डलहौज़ी के पंजपुला में स्वतन्त्रता दिवस के उपलक्ष्य में कवि सम्मेलन था | कांगड़ा से पवनेन्द्र पवन जी व डा कुशल कटोच आदि कवि आ रहे थे | परन्तु बारिश इतनी हुई कि रस्ते बंद हो जाने के कारण उन्हें रस्ते से वापिस जाना पड़ा | पंजपुला के कैफे में डलहौजी के कई गणमान्य लोग मौजूद थे | मैंने डा साहब से धीरे से कहा – कवि तो हम तीन ही हैं | तो वे तपाक से बोले – कवि तो एक भी बड़ा होता है हम तो तीन हैं | खैर जब महफिल जमी तो यह सब सच्च साबित हो गया | उन्होंने पूरी महफ़िल को इस तरह बांधे रखा कि यह एक यादगार सम्मेलन हो गया | बाद में कुछ लोग बतौर टूरिस्ट जो लुधियाना से आये थे वे भी हमारे साथ जुड़ गये उनमें मुकेश आलम जैसे लोग आज तक जुड़े हुए हैं |
डलहौज़ी में साहित्यिक मंच का गठन करवाने में उनकी ही प्रेरणा थी | एयर कमाडोर अशोक महाजन जी व बलदेव मोहन खोसला जी की सरपरस्ती में इस मंच ने कई प्रतिभाओं को तराशा भी | कलम की स्थापना के बाद डा साहब की  छत्रछाया में कई बड़े बड़े सफल आयोजन करवाए गये | हरेक आयोजन में नगरपालिका अध्यक्ष मनोज चढ्ढा , डलहौज़ी पब्लिक स्कूल के मालिक डा जे एस ढिल्लन व बलदेव मोहन खोसला इत्यादि कई गणमान्य लोग सदैव मित्रवत साथ रहते थे | उनके द्वारा स्थापित यह मंच आज भी उनके आदर्शों का पालन करता हुआ सदैव साहित्य संवर्धन एवं सामाजिक कार्यों में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहा है |
डलहौजी में रहते हुए डा साहब ने दो काव्य संग्रहों मौसम मौसम व कई रूप रंग की रचना की | कई रूप रंग हिमाचली में गजल संग्रह है जबकि मौसम मौसम हिंदी गज़ल संग्रह है | इनका लोकार्पण भी यहीं हुआ और परिचर्चा भी |
 एक बार राष्ट्रिय पाण्डुलिपि मिशन की एक वर्कशॉप के लिए मैं चामुंडा में था तो मैंने उन्हें एक दिन फोन कर दिया | बड़े खुश होकर बोले कहाँ हो दर्द जी ? मैंने बताये कि मैं चामुंडा में हूँ तो बोले आ जाओ नगरोटा बगवां | दूसरे दिन मैं उनसे मिलने एक और मित्र के साथ वहां चला गया | वहां पहुँच कर फोन किया तो बोले मैं स्कूल में हूँ आप यहीं चले आओ और उन्होंने स्कूल का पता बताया | स्कूल बाजार में ही था | मैंने गेट पर जाकर फोन किया तो बोले रुको मैं आता हूँ | फिर वे उठकर बाहर आ गये | अपनों की तरह गले मिले और हमें एक रेहड़ी पर ले गये वहां तीन कप चाय का आर्डर दिया | वहीं खड़े होकर हमारे साथ चाय पी | इतने सरल व इतने आत्मीय कि सामने वाले को पता ही नहीं चलता कि आप जिस व्यक्ति से मिल रहे हैं  वह कितने  बड़े रचनाकार व कितने बड़े पद पर हैं | यही उनके व्यक्तित्व की खूबसूरती थी | फिर उन्होंने अंदर चलने के लिए कहा - बोले मुझे आयोजक ढूंढ रहे होंगे कि मुख्यातिथि कहाँ चला गया - चलो अंदर बैठते हैं | परन्तु मैंने कहा - सर आपसे मिलने की तमन्ना थी वो तो पूरी हो गई अब हमें जाने दीजिये | फिर हम उनसे विदा लेकर चले आये और वे अंदर चले गये |
बहुत समय के बाद पालमपुर के कंडवाड़ी स्थित आश्रम में होली के अवसर पे आयोजित कवि सम्मेलन में उनसे मुलाकात हुई | उन दिनों वे अस्वस्थ चल रहे थे और बहुत ही कमजोर हो गये थे परन्तु जिजीविषा व हंसने मुस्कुराने का स्वभाव वैसा ही | मैंने पैर छुए तो बोले कैसे हो दर्द जी ? उनकी सेहत देखकर मेरा मन भर्रा आया मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी भावनाओं पे काबू किया | थोड़ी सी बातचीत हुई फिर कवि सम्मेलन शुरू हो गया  और फिर शाम को  सभी अपने अपने गन्तव्य की ओर चल दिए |
मई माह में लोक सभा के चुनाव थे मेरी ड्यूटी चरह विधान सभा के चांजू में लगी थी | चुनाव के बाद हम वापिस भंजराडू आ रहे थे तो रात के लगभग दस बजे होंगे मुझे कांगड़ा से साहित्यकार मित्र  देवराज संजू का फोन आया उसने यह बुरी खबर दी तो आँखों से आंसुओं की बूँदें टपक पड़ीं | मैंने खुद को ऐसे पाया जैसे कोई यतीम हो जाता है | प्रेम के प्रेम से मैं ही नहीं कई मित्र महरूम हो गये थे |
      डा प्रेम भारद्वाज जमीन से जुड़े रचनाकार थे | उनकी रचनात्मकता सदैव पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी | उनको याद करते हुए इरावती साहित्य कला मंच बनीखेत ने दो बरस पहले एक अन्तर्राज्यीय कवि सम्मेलन करवाया और उनकी सहधर्मिणी को सम्मानित किया | हमारी ओर से यह उनके लिए श्रधान्जली थी | उनकी  याद में लिखी एक कविता .....,
आज भी गूंजती है मन्दिर में घंटियों की मधुर झंकार
बहती है आज भी मधुर शीतल सुरभित बयार         
आज भी झूमते हैं मस्ती में डलहौजी के बान तोष और देवदार
हरीतिमा ओढ़े आज भी निहारती है धौलाधार
आज भी परिंदे भरते है उन्मुक्त गगन में ऊँची उड़ान
झर झर झरते झरने आज भी छेड़ते हैं सुरमयी तान
आज भी वन उपवन में नन्हीं कोंपले खिलती हैं
गलियाँ गाँव की आज भी धूप छाँव से मिलती हैं 
आज भी वो बरगद मुझे दुलारता है
गाँव का पनघट आज भी रह रह कर पुकारता है
आज भी सजती है गाँव की चौपाल
बांसुरी पर मधुर धुनें छेड़ते हैं ग्वाल |
आज भी दिए जलते हैं मजारों पे
बर्फ गिरती पिघलती है पे
आज भी फूल इतराते इठलाते हैं बहारों पे
आज भी वाह वाह निकलती है तुम्हारे लिखे अशारों पे
सब कुछ है आज भी इस गाँव में
बस एक तुम नहीं
और हमारा सर नहीं तुम्हारे आंचल की छाँव में ||

                                  अशोक दर्द  बनीखेत जिला चंबा  






                      एक अध्यापक का विद्यार्थियों की सुखद स्मृतियों में जिन्दा रहना ....... [संस्मरण ]  




 बचपन का स्मरण आते ही कई स्मृतियाँ  इस तरह सामने आकर खड़ी हो जाती हैं मानो  अभी-अभी की हों  
| बरसों बीतने के बाद भी ये स्मृतियाँ अवचेतन में सोई पड़ी रहती है | अच्छी स्मृतियों  की सुगंध जहाँ तन-मन को महका देती है वहीँ कठिन स्मृतियों  की दुर्गंधित टीस अन्दर तक चीरती चली जाती है | दोनों स्थितियों में प्रेम व आक्रोश स्वत: जाग उठते हैं |
              इन्हीं स्मृतियों के ताने-बाने में झाँक कर देखूं तो मुझे बचपन के वो दिन उद्वेलित करने लगते हैं जब एक अध्यापक ने मुझे पीट-पीट कर इतना प्रताड़ित किया कि मैंने स्कूल तक छोड़ दिया था | यह किस्सा सातवीं कक्षा का है | यह तो मेरा सौभाग्य रहा कि उसी स्कूल में लगे दूसरे अध्यापक ने मेरी पीड़ा को समझा और मुझे पुन: स्कूल तक पहुंचा दिया  और फिर मैं पढ़-लिख गया | अन्यथा आज अध्यापक होने के स्थान पर कहीं ईंटे ढो रहा होता या बजरी कूट रहा होता |
                   आपको बताता चलूँ कि मेरे घर में उस जमाने में कोई भी पढ़ा-लिखा नहीं था | अम्मा-बापू दोनों अंगूठा छाप थे  | बड़ा भाई पांचवीं तक पढ़कर चौदह वर्ष की उम्र में मजदूरी करने लग पड़ा था | घर में मैं ही इकलौता पांचवीं से आगे बढ़ा था ; यह बात पूरे परिवार के लिए गौरव की बात भी थी | मैं पढ़ने में भी अच्छा था | इसलिए कुछ अध्यापक मुझे बहुत प्यार करते थे | जो मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते थे, वे थे उस स्कूल में शास्त्री जी  थे | ये बिलासपुर  के झंडूत्ता से थे  | वह मेरे प्रिय अध्यापक थे | उनको  मैं अपना आदर्श मानता था |
        राजकीय माध्यमिक पाठशाला निगाली मेरे गाँव घट्ट से लगभग 2.5 कि. मी. दूर होगी | सुबह जब घर से स्कूल जाते तो सारा रास्ता उतराई थी और जब शाम को स्कूल से घर आते तो घर तक चढ़ाई वाला रास्ता था  | टेढ़ा-मेढ़ा संकरा रास्ता | एक नाला जिसे स्थानीय बोली में ‘ध्रेड्डा दा नाल’ कहा जाता है; इस तरह से टेढ़ा-मेढ़ा था की उसी एक नाले को पांच बार पार करना पड़ता | नाले में इतना घना जंगल था की कोई चिड़िया भी फड़फड़ाती तो डर लगता |  दिन में भी अँधेरा रहता इतने घने पेड़ थे | मेरी उम्र उस समय कोई बारह वर्ष की थी | मैं अपने गाँव से अकेला ही जाता था | जो दूसरे गाँव से जाते थे उनमें से मेरे सहपाठी हंस राज और प्रीतम छठी में फेल होने के कारण स्कूल छोड़ चुके थे | टप्पर गाँव से एक लड़का चमन भी वहां छठी में दाखिल हुआ था, परन्तु वह अपनी मर्जी से आता जाता था | मैं तैयार होकर उसके घर पहुँच जाता तो वह कई बार सोया होता | घर वाले उसे उठाकर हाथ मुंह धुलाकर व रोटी  खिलाकर उसे बड़ी मुश्किल से तैयार करके स्कूल भेजते | मेरा स्वार्थ यह होता था कि मुझे अकेले नाले में डर लगता था, उसके साथ होने से मुझे डर नहीं लगता था  | इसलिए उसके घर चला जाता था | परन्तु उसके चक्कर में कई बार मैं भी लेट हो जाता | साल के शुरू के कुछ दिन स्कूल  जाने के बाद उसने भी स्कूल छोड़ दिया |
               अब मैं निपट अकेला हो गया था  |  मैं नाले में  पहुंचता तो बहुत डरता | कहीं चिड़िया भी फड़फड़ाती तो मैं रोने को हो आता | फिर भी मुझे पढ़ना था | परन्तु  इस डर के कारण मैं भी स्कूल से कई बार अनुपस्थित हो जाता | जब मैं अनुपस्थिति के बाद दूसरे दिन स्कूल जाता तो एक टीचर मेरा ऐसा रिमांड लेते कि कई बार पीठ पर उभरे नीले निशान कई कई दिनों तक नहीं मिटते |  अंत में , एक नाले का डर, दूसरे उस अध्यापक की पिटाई ने मुझे ऐसा डराया कि मैंने स्कूल जाना ही बंद कर दिया और कुछ दिनों बाद मेरा नाम भी  कट गया | नाम कटने का पता मुझे दुसरे गाँव के बच्चों से लगा | पिताजी मुझे स्कूल जाने के लिए कहते तो मैं टस से मस न होता |
       जब पिता जी ने  स्कूल जाने के लिए मुझ पर ज्यादा ही दबाब डाला तो मैंने कहा अगर आपने मुझे  पढ़ाना ही है तो मैं बनीखेत स्कूल में पढूंगा | इस स्कूल में मैं कभी नहीं जाऊँगा | मैं माँ  के साथ खेतों में घास काटने के लिए चला जाता तो  मैने उसे न पढने के लिए राजी कर लिया था | वो कहती जान है तो जहान है; जो नहीं पढ़ते हैं वे भी रोटी खाते हैं | नहीं पढ़ना है  तो मत पढ़ | मैं अन्दर ही अन्दर माँ की ये नर्म बातें सुनकर खुश हो जाता | अब मैं सोचता, मुझे उस अध्यापक से पशुओं की तरह जो मार पड़ती थी, उससे निज़ात मिल जाएगी | परन्तु पिताजी तो मुझे पढ़ाना चाहते थे | जब उन्होंने बड़ा जोर देकर स्कूल जाने को दबाब बनाया  तो मैंने उन्हें अपना सर्टिफिकेट लाने के लिए कहा कि आप मेरा सर्टिफिकेट ले आओ मैं बनीखेत पढ़ने चला जाऊँगा | मेरी जिद्द को देखते हुए वे मेरा सर्टिफिकेट लेने स्कूल चले गए | मुझे याद है उस समय हमारे स्कूल में एक ग्रेजुएट टीचर जिनका नाम के.के. शर्मा था, स्कूल के इंचार्ज थे | जब पिताजी ने उनसे प्रमाण पत्र के लिए कहा तो उन्होंने पिताजी को प्रमाण पत्र देने से इन्कार कर दिया और कहा की एक बार उसे स्कूल तक पहुँचाओ फिर वह यहां नहीं पढ़ना चाहेगा तो हम आपको  प्रमाण-पत्र दे देंगे | बच्चा पढने वाला है | बनीखेत जाकर बिगड़ जायेगा | जब मेरे वहां न पढने की बात का पता शास्त्री जी को लगा तो उन्होंने  पिताजी को कहा की आप घर जाओ मैं शाम को आपके घर आऊँगा और उसे खुद मनाऊंगा |
                       पिताजी जब स्कूल जाकर घर वापिस पहुंचे तो मैंने पूछा की आप मेरा सर्टिफिकेट ले आये...| तो उन्होंने बताया की हैडमास्टर ने सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया और शास्त्री जी (अध्यापक) आज शाम को छुट्टी के बाद हमारे घर तुझसे मिलने आ रहे हैं | अब मुझे सारी आशाएं टूटती हुई दिखने लगीं | मुझे पता था वो मुझे दोबारा स्कूल ले जाएंगे | मैं उन्हें मना नहीं कर पाऊंगा |
    जब शाम के समय हम खेत में मक्की काट रहे थे तो दूर से रास्ते में वो मुझे आते दिखे | मैंने उन्हें पहचान लिया सफेद कुर्ता-पजामा, पतले लम्बे व्यक्तित्व के मालिक | मैं यूँ भी, पिता जी के कहने के बाद कि वो शाम को हमारे घर आ रहे हैं ; रास्ते को बार-बार देखे जा रहा था कि कब आते हैं...| आखिर मेरा इन्तजार ख़त्म हो गया था | मैंने उन्हें पहचान लिया वो शास्त्री जी ही थे  | अब मुझे डर लगने लगा था | मेरे दृढ़ निर्णय की दीवार एकाएक मुझे ढहती हुई लगने लगी थी | मुझे अन्दर ही अन्दर कंपकपी लगने लगी थी |
                      उन्होंने आकर मुझे मेरे स्कूल छोड़ने का कारण पूछा तो मैंने सारी बातें (अध्यापक के रोज पीटने व नाले में डरने ) उन्हें बता दीं | उन्होंने मुझे समझाया कि अब मैं उस अध्यापक को कह दूंगा कि वह तुम्हें न पीटे | फिर वे उस दिन हमारे घर ही रहे | यहां मैं बताता चलूँ कि उन दिनों वे एक ही समय भोजन करते थे वह भी खुद बनाकर ,  बाहर का पानी तक नहीं पीते थे | (बरसों बाद आज भी उनकी यही चर्या है) उन्होंने हमारे घर में खाना तो दूर पानी तक न पिया | दूसरे दिन सुबह वे मुझे स्कूल साथ लेकर ही गये | मेरा पुन: नाम दर्ज हो गया और मेरी पढ़ाई भी शुरू हो गई | अब उस क्रूर अध्यापक ने मुझे पीटना भी बंद कर दिया | शायद उन्होंने उसे समझा दिया था | फिर बाद में उन्होंने अपना क्वार्टर ही मेरे गाँव के पास वाले गाँव में रख लिया | स्कूल के पास रखे क्वार्टर को छोड़कर इतने दूर आने-जाने की उन्हें क्या जरुरत थी | आज मुझे समझ आता है ये सब मेरे लिए ही था |  आज मैं उनके आशीर्वाद से फल-फूल रहा हूँ ; मैं आज भी सोचता हूँ कि मैं उनका एहसान कैसे चुकाऊंगा ,  न तो मेरे पास इतनी शक्ति है , न ही सामर्थ्य | मैं आज जो कुछ हूँ उसी विभूति की बदौलत हूँ | और हाँ आज भी मैं जब-जब भी अतीत की स्मृतियों में डूबता हूँ, उस दुष्ट अध्यापक की तस्वीर मेरे मानस पटल पर उभर आती है | मेरे अंदर क्षोभ की ज्वाला धधक उठती है | बरसों बीतने के बाद भी  मैं उसके बुरे व्यवहार को भूल नहीं पाया हूँ |  यदि शास्त्री जी जैसा अध्यापक मेरी जिन्दगी में न आता  तो  उस शख्स ने तो मेरा जीवन ही बर्बाद  कर दिया था | यूं तो वह शख्स भी मेरा अध्यापक था, परन्तु उसके लिए मेरे दिल में  आज भी  कहीं जगह नहीं है | जबकि शास्त्री जी को मैं अपनी हरेक उपलब्धि पे अन्दर ही अन्दर स्मरण कर लेता हूँ | वे मेरे दिल में धड़कते हैं, सांसों में बसते हैं | उन्हें मैं अपनी हर उपलब्धि सौंपकर स्मरण कर लेता हूँ | एक अध्यापक के नाते आज मैं सोचता हूँ कितना सुखकर होता है अप ने विद्यार्थियों की सुखद स्मृतियों में जिन्दा रहना , जैसे मेरे भीतर शास्त्री जी जिन्दा हैं ||

                                                                                                                                     अशोक दर्द 



























  































   महकते शब्दों की चितेरी --- डॉ. गीता डोगरा

अप्रैल दो हजार सत्रह में जालन्धर से त्रिवेणी साहित्य अकादमी के दो दिवसीय कार्यक्रम के लिए डलहौज़ी आईं थीं |
डलहौजी के मेहर होटल में रुकीं थीं | मैंने इसी दौरान उनसे साहित्यिक साक्षात्कार के लिए निवेदन किया तो उन्होंने मेरे निवेदन को स्वीकार करते हुए जीवन एवं साहित्य के विविध रंगों पर बखूबी बातचीत की | प्रस्तुत हैं कुछ विशेष अंश :

मैं [अशोक दर्द ] : डॉक्टर साहब अपने जन्म व जन्मस्थान के बारे में बताएं ?

डा. गीता डोगरा : मेरा जन्म फिरोजपुर में हुआ | पिता पुलिस अधिकारी थे | माँ साहित्य पढने वाली थीं , कोलकाता में जन्मी पली बढ़ीं | साहित्य व संगीत उन्हें परिवार से मिला था | परन्तु मेरे दादा के घर पुरुष देश के प्रति समर्पित थे | जबकि अधिकाँश औरतें घरेलू |
यहाँ तक मुझे याद है मैंने ग्यारह साल की उम्र में होश संभाला उन दिनों भारत पाक युद्ध चल रहा था | हम उन दिनों फिरोजपुर में थे | रात को मोहल्ले वाले रोटी इकट्ठी करते और फौजी भाइयों को बार्डर पर भेजते | माँ भी रोज बीस रोटियाँ फौजियों के लिए भेजती और मैं चुपके से अपने हिस्से की रोटियाँ उनमें जोड़ देती | तब सोचती देश हमारे लिए जरूरी क्यों है |
माँ मुझे वीरता की कहानियाँ सुनाती तो मैंने खाबों में खुद ही खुद को राजकुमारी पाया जो लड़ती और हर बार जीतकर घर लौटती | मैं देश प्रेम के मनघडंत गीत गुनगुनाती |

मैं [ अशोक दर्द ] : आपने लेखन की दुनिया में कब प्रवेश किया , कोई किस्सा ?
डा.गीता डोगरा : तेरह साल की उम्र में मैंने बाकायदा लिखना शुरू किया | तबादलों के मौसम में हम उन दिनों फाजिल्का चले आये थे | होली का दिन था | गली में हुड़दंग था | तभी मन में कुछ पंक्तियाँ आईं | उन्हें पांच सात बार दोहराया छोटी सी कविता बनी पर यह एहसास न था कि वह मेरी कविता है | फिर जैसे सिलसिला शुरू हो गया | कहानी बनी तो मैंने कापी के पन्ने उधेड़े और कहानी लिख दी | फिर भी इतना डर था कि वो पन्ने मैंने छुपाकर रख दिए | माँ से बहुत डर लगता था | आठवीं कक्षा तक आते आते मैंने उपन्यास रच डाला |
माँ को स्कूल से शिकायत आई कि मैंने होम वर्क नहीं किया तो माँ का माथा ठनका और मेरी किताबें कापियां चेक की गईं |फिर क्या था चोरी पकड़ी गई |
उन दिनों गलि मोहल्लों में पुस्तकालय होते थे | लोग साहित्य से जुड़े थे | शायद तभी समाज की सूरत अच्छी थी | बच्चों के लिए साफ़ सुथरा साहित्य था | चंदा मामा , नंदन जैसी पत्रिकाएँ हम पढ़ते थे | माँ साहित्य पढ़ती थी तो मैं ही अक्सर लाइब्रेरी जाती मैं किताब उठाती और पन्ने पलटती | किताब की खुशबु बता देती कि किताब अच्छी है मैं ले आती माँ हैरान होती मेरे चुनाव पर | हलांकि साहित्य अच्छा ही होता है |

मैं [अशोक दर्द ] : आप महिला लेखन की चुनौतियों को किस तरह देखती हैं ?
डा गीता डोगरा : लेखिकाओं की दुनिया को अलग से विचार करने की जरूरत इसलिए है क्योंकि पुरुष ने उसे हर कदम अपनी दुनिया से अलग होकर सोचा | पुरुष लेखकों ने पहले नारीवादी और नयी लेखिकाओं के महत्व को पूरी तरह से नहीं जाना | और न ही उसके महत्व को समझा | यहाँ तक कि स्त्री विमर्श का साहित्य जैसे लेखन के बारे में  एक वरिष्ठ  आलोचक  का यह कहना कि “ यह कुछ दिनों के लिए है , नया नया  जोश है अधिक दिन नहीं चलेगा | भला कहां तक तर्कसंगत है | जबकि कृष्णा सोबती छठे  दशक से लिखती आ रही हैं |अभी तक लिख रही हैं | अमृता प्रीतम को यह पुरुष समाज कहां पचा पाया ?
यही न अमृता जी प्रेम कर बैठी | प्रेम किया तो उनका रचना संसार कितना अद्भुत है | स्त्री को प्रेम स्वीकार नहीं क्या ?  
चुनौतियां – ये चुनौतियां स्त्रियाँ ही क्यों फेस कर रही हैं | हलांकि अब ऐसा  नहीं है फिर भी कई मोर्चों पर यह सब झेलना ही पड़ता है | साहित्य के माध्यम से स्त्री ने स्त्री जगत को जागरूक किया है | बेशक यह परम्परा मुंशी प्रेम चंद के समय से है फिर भी औरत ने सामाजिक धारणाओं को परे  धकेलने का साहस किया | उनमें बाल विवाह , विधवा विवाह को लेकर कहानियां लिखी गईं | पुरुष लेखकों ने आलोचना की पर वहीँ समाज ने स्वीकृति की मोहर भी लगाई | जब क्रांति की लहर आ जाये तब अकेला पुरुष लेखक क्या करेगा ? वैसे मेरे ख्याल में चुनौती वाली बात नहीं है | महिलाएं इतना लिख रही हैं कि ये चुनौतियां पुरुष लेखकों के आगे हैं | मेरे समक्ष ऐसे लेखक हैं जिन्हें विषय ही नहीं सूझते तो वे बिना स्वस्थ विषय लिए अपने ही कार्यालय की राजनीति को लपेटते नजर आते हैं | चुनौतियों का बिना मुकाबला किये स्त्री लेखन आगे आया और ख्याति पाई | हालाँकि पुरुष लेखक भी अच्छा साहित्य समाज को दे रहे हैं | मेरे ख्याल से स्त्री लेखन व पुरुष लेखन में प्रतिस्पर्धा नहीं होनी चाहिए |

मैं [ अशोक दर्द ] : आपकी पहली रचना छपने की ख़ुशी कैसी थी ? इस ख़ुशी को आपने सबसे पहले किसके साथ बांटा था ?
डा गीता डोगरा : मेरी पहली रचना सन उन्नीस सौ पचहतर में पंजाब केसरी में छपी | जब पढ़ी तो सच में लगा कि मैं कुछ हूँ | मेरी माँ तो मुझसे भी ज्यादा उत्साहित थी | वे हाल बाजार [अमृतसर ]गईं और सात अखबारें खरीद लाई | क्योंकि इतने ही मिले | हर दस मिनट बाद मैं अपनी कविता पढ़ लेती | मेरी माँ ही मेरी प्रेरणा थी | मेरी एक दोस्त थी उषा | उसे स्कूल जाकर अख़बार दिखाई | वह भी खुश थी ,  जितनी मैं  | परन्तु बाद में वह बिछुड़ गई | उसके लिए भी मैंने कविता लिखी - ‘उषा तुम बहुत याद आती हो’ | मेरे काव्य संग्रह में भी दर्ज है |

मैं [ अशोक दर्द ] : समकालीन लेखकों में आपके प्रिय लेखक ? नयी पीढ़ी के लेखन से आप कितना संतुष्ट हैं ?
डा गीता डोगरा : लेखक सभी अपनी अपनी जगह अच्छा ही लिखते हैं | मुझे पुराने लेखकों में रविन्द्र कालिया , मोहन राकेश , कृष्णा सोबती , चित्र मोदगिल , शरद सिंह , नयों में सुभाष नीरव की कहानियां , सुदर्शन वशिष्ठ , आदि कई नाम हैं | हरेक के पास अपनी विधा है | सैली बलजीत राष्ट्रीय फलक पर हैं | सूर्यबाला सुधा अरोड़ा , अमरेन्द्र मिश्र , लखनऊ के राजेन्द्र परदेसी , इतनी किताबें हैं कि आप तय  नहीं कर पाते कि कौन श्रेष्ठ है ?

मैं [अशोक दर्द ] : आपकी पसंदीदा विधा कौन सी है , अपने रचना संसार पर भी प्रकाश डालें ?
डा गीता डोगरा : मैंने पहले जो लिखा वह कविता थी | बेशक बाद में बहुत कहानियाँ लिखीं | रूचि अब भी कविता में है | कितना अद्भुत है न मन की व्यथा आप कुछ पंक्तियों में कवर कर लेते हैं | कविता एक सहज अनुभूति है | एक तथ्य यह भी है कि कविता हरेक प्राणी में है बशर्ते कि आपकी दृष्टि कितनी गहरी है , संवेदना कैसी है | जिसे साहित्य का माहौल मिले , रचनात्मकता के पीछे तो एक दिव्य शक्ति होती है | जो साहित्य नहीं रचते वे एक अच्छे पाठक तो हो सकते हैं |पर यह कितनों के हिस्से आता है |

मैं [ अशोक दर्द ] : आपकी कहानियों का मुख्य स्वर क्या है ,आपकी कहानियों के पात्र समाज के किस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं ?
डा गीता डोगरा : मेरी कहानियाँ अपने आस पास की कहानियाँ हैं | लगभग तीस कहानियां मैंने लिखीं | आतंकवाद के खिलाफ भी , अत्याचार के खिलाफ की भी , और उस समाज की भी जिसे कोई डर नहीं | वह मनमानियां करता है | स्त्री के साथ भी ,परिवार से भी नहीं जुड़ता | मैंने प्रेम कहानियाँ भी लिखीं जो गीतों भरी कहानियाँ बनीं आकाशवाणी पर | उनसे भी बेहद प्रसिद्धि मिली | ये कहानियां खबरों , मैगजीनों व संग्रहों में छपीं |
फिर बोल्ड कहानियों का युग आया तो मेरी भी कलम चली | उनमें एक सच्चाई है | चूंकि में पत्रकारिता में रही तो वे पात्र मैंने पुलिस फाइलों से निकाले | पात्र तो हमें आसपास से ही मिलते  हैं घटनाएँ भी ,कुछ कल्पना का पुट भी रहता है |

मैं [अशोक दर्द ] : इस लम्बे साहित्यिक जीवन में कितना रचा कितना छूट  गया ?

डा गीता डोगरा : साहित्य में मैंने अभी कुछ किया ही कहां है | जो पीछे छूट गया उसका मलाल रहेगा | माँ जब तक साथ रही तब तक तो ठीक था | शादी के बाद जिस घर आई वहां न साहित्य था न माहौल |
मैं एक दिन छपी कहानियां और किताबें , लिखी पांडुलिपियाँ ले ससुराल आ गई | उन्हें लगा कूड़ा - कबाड़ा सो एक दिन मेरी अनुपस्थिति में वे रद्दी में बेच दीं | न मेरे कमरे में कोई किताब बची न कोई कागज | मेरे मन पर क्या बीती आप अंदाजा लगा सकते  हैं | फिर साहित्य तो न लिख सकी हाँ पत्रकारिता के क्षेत्र में काम  करने के लिये अच्छे इंटरव्यू व फीचर जमकर लिखे |
 साहित्य में अब तक एक उपन्यास , छः काव्य संग्रह , व बाकि दूसरी पुस्तकें हैं  | पर मैं संतुष्ट नहीं | मेरी आत्मकथा अधूरी है | एक उपन्यास का काम चल रहा है |

मैं [अशोक दर्द ] : एक लेखिका जब पत्रकारिता में गई तो कैसा रहा ?
डा गीता डोगरा : सम्पादक बनने का बहुत जनून था | जिस भी अख़बार में जाती संपादक की कुर्सी को देखते ही दिल में उसे पाने कि चाहत हिलोरे लेने लगती | मेरे दोस्तों ने कहा रेडियो या टी वी ज्वाइन कर लो | पर मुझे तो संपादक ही बनना था | पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने के लिए एक विशेष पढ़ाई भी चाहिए सो दिल्ली से पत्रकारिता का कोर्स किया | पंजाब केसरी में कई साल तक पत्रकार रही | फीचर किये राजनितिक इंटरव्यू लिए | जो स्टेट लेवल तक राजनितिक गलियारे में चर्चा में रहे | फिर उतम हिन्दू , वीर प्रताप , में पत्रकार व साहित्य सम्पादक रही लगा बाजी मार ली | फिल्ड पत्रकारिता में मैं पहली महिला पत्रकार थी | आतंकवाद के दिनों में मैं पंजाब के राज्य आ गई थी और कालम लिखती थी तैं कि दर्द नी आया | यह उन औरतों से बातचीत थी जिनके परिवारों को आतंकवादी उनके सामने मार गये थे |
और वे तैं मेरे सामने बैठतीं तो उनकी आखें क्रन्दन करतीं कुछ के आंसू सूखते न थे  | और कई ऑंखें खुश्क हो चुकीं थीं | वह मंजर मुझे भूलता न था और कई रातें मैं सो नहीं पाती | फिर एक दिन कहानी लिखी कहर | तब लगा कि कोई ऋण उतार दिया | पत्रकारिता का यह वीभत्स रूप था |



मैं [ अशोक दर्द ] : एक महिला को गृहस्थी , पत्रकारिता व साहित्य को एक साथ जीने में कहीं मुश्किलें तो नहीं आईं ? क्या सब कुछ स्मूथ चलता रहा ?
डा गीता डोगरा : पारिवारिक जिम्मेदारियों की एक लम्बी लिस्ट थी | घर की बड़ी बहू थी मैं | उम्र छब्बीस साल | ससुर चल बसे | आर्मी आफिसर थे वे | तीन भाई बहन पढ़ रहे थे | मेरे पति बेहद नम्र व अच्छे इंसान थे |  आप समझ सकते हैं कि हम दोनों  ने मिल कर तय किया कि मिलकर यह जिम्मेदारी पूरी करनी है, की भी | दिक्कत नहीं आई क्योंकि हम में जबर्दस्त अंडरस्टैंडिंग  थी | फिर अपना परिवार बना | बस हो गई थी पत्रकारिता में रहते | खूब काम किया और नाम भी कमाया | संतुलन तब बनता है जब पति पत्नी मिलकर चलें | लिखना - पढना अक्सर ऑफिस टेबल पर ही कर लेती थी | धीरे – धीरे साहित्य लिखना व पढ़ना भी घर पर हुआ | सुबह आज भी जल्दी उठती हूँ | वही समय मेरा होता है सिर्फ मेरा |


मैं [ अशोक दर्द ] : आपके शब्दों से अमृता प्रीतम के शब्दों सी खुशबु आती है कहीं उनके लेखन का प्रभाव है क्या ?
डा गीता डोगरा : मुझ पे अमृता जी का प्रभाव सचमुच है | बहुत शुरू में उनका उपन्यास पढ़ा देव | कायल हो गई | फिर जिन दिनों पत्रकारिता करने दिल्ली गई तो मेरे सम्पर्क में सारिका ,  पराग के लोग थे | रमेश बत्रा , महावीर , डा जगदीश ,चंद्रिकेश कादम्बनी से | सभी दोस्त थे | मैंने अमृता जी से मिलने की इच्छा जाहिर की तो वे सब भड़क उठे | इतना शेष कि वह अच्छी औरत नहीं बिना शादी इमरोज के साथ रहती है | इन बातों  ने मेरा हौसला और बढ़ा दिया | पर दिल्ली मेरे लिए अंजान था | मैंने अमृतसर से अपने पत्रकार साथी राकेश भाटिया को बुलाया और अमृता जी को फोन कर समय ले लिया |
अमृता जी सचमुच खूबसूरती की मिसाल थीं | उसके बाद मुलाकातें बढ़तीं गईं | उनका साहित्य भी मेरी रगों में रच बस गया | अब अंदाजा लगा लीजिये कि शब्दों में ऐसी उर्जा कहां से आई |अमृता जी मुझे कच्चे बरगी कुड़ी कहती थीं | जब शादी हुई तो मैंने लगभग तीन साल बाद फोन किया तो उन्होंने तपाक से कहा – कित्थे मर गई सी | उन लफ्जों में इतना प्यार था मैं आज तक नहीं भूली हूँ |

मैं [ अशोक दर्द ] : आतंकवाद के दौर में आपने खूब लिखा , एक पत्रकार के नाते आपकी लेखनी को रौंदेने का प्रयास तो नहीं हुआ ?
डा गीता डोगरा : आतंकवाद के दिनों में जैसे कि पहले बताया पंजाब केसरी में कालम  लिखती थी | मेरे साथ -  साथ घनश्याम पंडित भी लिखते थे | एक हफ्ता उनका कालम छपता था एक हफ्ता मेरा | कुछ महीने तो ठीक चला पर बाद में आफिस में फोन आने शुरू हो गये | घनश्याम जी के घर पे रात को पत्थर भी मारे गये | वे बुरी तरह घबरा गये |क्योंकि उनदिनों पंजाब केसरी के सम्पादक व पत्रकार मारे जा रहे थे | दूसरे दिन मुझे भी फोन आया कि जान प्यारी है या कि कलम ? बंद कर दे बकवास लिखनी |
   उसी रत जब मैं आठ बजे डियूटी खत्म कर घर जा रही थी तो तीन लोग मेरे पीछे लग गये | कभी दायें बाएं हो जाते तो बस लगता गये | चौक पे एक दरवाजा खुला देख मैं उस घर के भीतर छुप गई | बीस मिनट बाद बाहर झांका  तो कोई न था | दूसरे  दिन विजय चोपड़ा जी को बताया तो वे बोले कालम तो बंद नहीं होगा हाँ नाम नहीं जाएँगे |
लेकिन हममें से जो भी कालम लिखता उसे फोन आ जाता | उन लोगों को हमारी शब्दावली कि पहचान हो गई थी | उन दिनों नवां जमाना के सम्पादक जगजीत सिंह आनंद पंजाब केसरी कार्यालय आया करते थे ,और मंचों से कहते कि गीता डोगरा तैं की दर्द नी आया ?


मैं [ अशोक दर्द ] : अखबारी दुनिया में आपने किस किस अख़बार में अपने शब्दों की खुशबु बिखेरी और वर्तमान में आप समय की पदचाप को किस तरह देखती हैं ?
डा गीता डोगरा : अखबारी दुनिया तो पहले ही दिन से साथ हो ली थी | जब छपना शुरू हुए तो सुप्रभात प्रथम फिर वीर प्रताप , पंजाब केसरी , हिंदी, मिलाप दैनिक ट्रिब्यून , लोकमत समाचार | दूसरे  राज्यों  के बहुत से अख़बार साथ जुड़ गये | वह ज़माना सचमुच सुंदर था | अखबारें एक पाठशाला का काम करती थीं | जो सम्पादक उस जमाने के थे वे रचना को पढ़ते थे , सुधारते थे , रचना की संवेदनशीलता को समझते थे | सम्पादक आज भी अच्छे हैं ,सूझवान हैं पर नये लेखक की रचना सुधारने का कष्ट न कर उसे रद्दी की टोकरी का रास्ता दिखा देते हैं |
मैंने साहित्य सम्पादक के रूप में कई अख़बारों में काम किया है | पंजाब केसरी में फीचर राइटर थी | बहुत कुछ सीखा | वीर प्रताप में मुझे साहित्य सम्पादक की पोस्ट मिली तो सच जाने मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा | हाँ उससे पहले मैं उतम हिन्दू में पार्ट टाइम साहित्य का एक पन्ना बनाती रही | यह अनुभव भी मेरे काम आया |
तब वीर प्रताप में वीरेंदर जी थे | उनसे तो मुझे सीख का खजाना मिला | उन दिनों मेरा कालम जिन्दगी कतरा - कतरा एक फेमस कालम था | वीर प्रताप उनदिनों गिर रहा था और इस बात से चन्द्र मोहन सम्पादक बेहद परेशान थे | मेरा साहित्य सम्पादक बना रहना सर्कुलेशन पर निर्भर था और उस कालम ने भरपाई की | बाद में मैं दैनिक जागरण में चली गई वहां मैं सोलह साल वरिष्ठ सम्पादक रही |





मैं [अशोक दर्द ] : महिला लेखन में बोल्डनेस की परिभाषा क्या है ?
डा गीता डोगरा : बोल्ड कहानी नाम चर्चा में आया तो मैंने सोचा इसके लक्षण क्या हैं  ? फिर लगा कि बोल्ड साहित्य पढ़ा जाये | मेरे साथियों ने बताया कि कृष्णा सोबती का लघु उपन्यास मित्रो मरजानी पढ़ो | तो समझा कि बेबाक अपनी बात कह देना जिसमें आम प्रयोग किये जाने वाले मर्दाना संवाद भी हो सकते हैं जिन्हें समाज इजाजत नहीं देता कि ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाये |

मैं [अशोक दर्द ] : आपकी रचनाएँ विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी लगी हैं , इस  उपलब्धि को आप किस तरह देखती हैं ?
डा गीता डोगरा : जी सचमुच ख़ुशी होती है जब स्टूडेंट आकर उत्साहित होकर मिलते हैं तो एक तसल्ली होती है कि लिखना सार्थक हुआ | वह ख़ुशी सबसे बड़ी उपलब्धि है | मेरी पुस्तकों पर चार एम् फिल , हो चुकी हैं | कविताओं पर पी एच डी गुरुनानक देव विश्वविद्यालय , कुरुक्षेत्र ,व शिमला से |

मैं [अशोक दर्द ] : ऐसी कोई जरूरी बात जो मैं आपसे पूछ नहीं पाया ?
डा गीता डोगरा : हाँ , मेरी विधा हिंदी कविता कहानी तो है ही साथ ही दूरदर्शन पर नाटक देना | सन उन्नीस सौ अस्सी इक्यासी  में मैंने गुल चौहान की कहानी वापसी पर एक टेली फिल्म लिखी ,गूंगी जिन्दगी | मैंने उसे दूरदर्शन मुंबई भेजा | स्क्रिप्ट पास हुई और वह फिल्म बनी जिसमें कलाकार सुधीर पाण्डेय , रत्ना भूषण [भारत भूषण की पत्नी ] शिवराज व अन्य हस्तियाँ थीं | यह टेली फिल्म मुंबई ही नहीं बल्कि दूरदर्शन के तमाम चैनलों पर चली |  उसके बाद तीन नाटक जालन्धर दूरदर्शन के लिए लिखे वे भी टेलीकास्ट हुए |


मैं [अशोक दर्द ] : अंत में नये रचनाकारों को कोई संदेश ?
डा गीता डोगरा : मैंने सम्पादक रहते हुए कई नये रचनाकारों को उभारा | अब थोड़ी सी आहत हूँ इस बात पर कि नये लेखक साहित्यकार बनना तो चाहते हैं परन्तु सबसे पहले वे यह जानकारी लेते हैं कि पुरस्कार कहां कैसे मिलेंगे | लिखने की तपस्या छोड़  वे इस ओर भागते हैं | कुछ लेखक हैं जो मेहनत कर रहे हैं |नये रचनाकारों को चाहिए कि वे साहित्य पढ़ने की आदत डालें | जो मेहनत पुराने लेखकों ने की है उससे सीखें | पुरस्कार खुद आपके पास चले आयेंगे ||