Wednesday, January 29, 2014

गीत मुहब्बत के


गीत मोहब्बत के ग़मों में गाना तुम |
दर्द छुपाकर महफ़िल  में मुस्काना तुम ||
         
दुनिया कैसे उंगली पे नचाती है |
अपने दिल के राज जरा बतलाना तुम ||

यह मत सोच कि सुनकर दुनिया रो देगी |
यारों से भी दिल के राज छुपाना तुम ||

आ बैठेंगे दिल की शाखों पे बिछुड़े |
मीठी यादों का दाना उनको पाना तुम ||

होकर दिल बेकाबू गजलें कह देगा |
थोड़ा-थोड़ा दिल को बस उकसाना तुम ||

पर्वत झुक कर कदमों पे आ जायेंगे |
हिम्मत से बस थोड़े कदम उठाना तुम ||

 बंजर में भी सोना बस उग आएगा |
कोई दरिया खेतों तक पहुँचाना तुम ||

प्यार मोहब्बत रिश्ते आज बिकाऊ हैं |
सोचसमझ कर दिल को जरा लगाना तुम ||

मन का सारा अँधियारा मिट जायेगा |
रहबर के चरणों में शीश नवाना तुम ||

दौड़े आयेंगे वो खुद लाज बचाने को |
दिल की गहराईयों से उन्हें बुलाना तुम ||
                                                                               
                                                       अशोक दर्द

Monday, January 27, 2014

इज्जतदार लोग (लघुकथा)


भले ही वह शहर की बदनाम औरत थी | परन्तु उसके अन्दर भी एक नेक दिल था | जिसे अक्सर लोगों ने नहीं देखा था | मैं उसकी नियति की कहानियाँ लिखने उसके पास जाता , भरे दिन के उजाले में | वह बार-बार मना करती “ तुम बदनाम हो जाओगे, मुझ संग मिलने-मिलाने से , अगर मिलना ही है मेरी नियति लिखने को तो रात के अँधेरे में आया करो | शहर के कई इज्जतदार लोग मुझसे मिलने रात के अँधेरे में आते हैं और सुबह पौ फटने से पहले चले जातें हैं | कोई उनकी तरफ अंगुली नहीं उठाता | तुम भी ऐसा ही करो |’’ उसने मुझे चेताते हुए कहा | मैं उसकी चेतावनी को नजरअंदाज करके दिन के उजाले में पाक मिलता रहा | कुछ दिनों बाद वे इज्जतदार लोग मेरे उससे मिलने की कानाफूसी कर रहे थे और मैं शहर में बदनाम हो रहा था | वो इज्जतदार लोग आज भी इज्जतदार थे |
                                                                            अशोक दर्द 

Saturday, January 25, 2014

मै पीड़ा हूँ


मैं पीड़ा हूँ उस खेत की
जो कभी बाढ़ में बह जाता है ,कभी सूखे में झुलस जाता है ,
और कभी कभी भरपूर फसल के बावजूद भी ,उस पर रोटियां बीजने वाला ,कर्ज में डूबा ,भूखा ही लंबी नींद सो जाता है ;
मैं पीड़ा हूँ उन हाथों की ,
जो हमेशा छालों से भरे रहते हैं ,जिनकी पीढ़ियाँ मेहनत-मेहनत
लिखते-लिखते खप जाती हैं ;और हासिल-हासिल किसी और के हिस्से दर्ज हो जाता है ,
और वे हाथ रिसते छालों को चीथड़ों में ढककर उम्र गुजार देते हैं ;
मैं पीड़ा हूँ उस एकता की देवी की ,जो छटपटा-कराह-कुम्लाह
रही है ;जिसे कुछ स्वार्थी दानव फलता-फूलता नहीं देखना
चाहते ,इसलिए उसे काटने के लिए उन्होंने,
उस की जड़ों में ,धर्म-जाति-वर्ण-भाषा-क्षेत्रवाद के जहरीले चूहे
छोड़ दिए हैं ;
मैं पीड़ा हूँ उन सिसकियों की ,
जो बिस्तर पर मुहं में तकिया डाल,कमरे के अन्दर
ही घुट-घुट कर मर जाती हैं ;
मैं पीड़ा हूँ उन पंखों की ,जिन्हें उड़ान से पहले ही
काट दिया जाता है ,और जिनके हिस्से का आकाश ,
छीन लिया जाता है ,कभी मर्यादाओं का वास्ता देकर
कभी फ़र्जों का वास्ता देकर ;
मैं पीड़ा हूँ उस सूरज की ,जो चमकना तो चाहता है ,
परन्तु ...,उस के आस-पास फैले भ्रष्टाचार के बादल
उसकी धूप की चमक को धरती को छूने नहीं देते ,
मैं पीड़ा हूँ उन अनाम चीखों की ,जिन्हें किसी नाम से
संबोधित नहीं किया जा सकता ,और
भेड़ियों भरे जंगल में जिन्हें सुनकर ,
हमेशा अनसुना कर दिया जाता है ,
और यदि कोई सुन भी ले तो ,उन चीखों पर रोया नहीं जाता ,
उन्हें चुप नहीं कराया जाता ,सिर्फ
ठहाके लगाये जाते हैं और तालियाँ पीटी जाती हैं ,
मैं पीड़ा हूँ ...,बेबस पीड़ा ..||             
                                                अशोक दर्द                                                                                                                                                                      

Thursday, January 23, 2014

शबनम फूल सितारे लिखना


शबनम फूल सितारे लिखना |
सागर लहर किनारे लिखना ||

शीशे की तासीर थी जिनकी |
तिड़के सपने सारे लिखना ||

जीवन के हमजोली थे जो |
आब-ओ-हवा-अंगारे लिखना ||

जहां भरी थी तेरी झोलियां |
वे सब नाम द्वारे लिखना ||

जहन में दर्ज है जो हर्फों जैसे |
बिछुड़े वो सब प्यारे लिखना ||

दिल कि लगी बुझाते कागद |
कर लिये कितने कारे लिखना ||

ताल-तलैया सागर लिखना |
पानी मीठे खारे लिखना ||
                         अशोक दर्द 

Wednesday, January 22, 2014

मुक्तक


विचारों का रेवड़...


मैं हांकता रहता हूँ,
हरदम विचारों का रेवड़ ,
जैसे गडरिया हांका करता है,
अपनी भेड़ों का रेवड़ |    
मेरे विचारों का रेवड़ ,
कभी पहुँच जाता है ,
पर्वतों के पीछे बसी सुरम्य घाटियों में ,
तो कभी ,
घनी कंटीली झाडियों के मध्य से ,
लहुलुहान हुआ गुजरता है ,
कभी,
कलकलाते झरनों के किनारे ,
बड़ी-बड़ी चट्टानों को फलांघता है ,
तो कभी ,
नदियों के किनारे ,
बिछी रेत में ,
पदचिन्ह छोड़ता गुजरता है ,
बिल्कुल भेड़ों के रेवड़ की तरह |
गड़रिये के कुत्ते की तरह ,
मेरा विवेक ,
करता है रखवाली ,
मेरे विचारों के रेवड़ की |
जिस तरह निर्जन वनों से गुजरता रेवड़ ,
सहम जाता है ,
किसी भेडिये या बाघ जैसे हिंसक
जानवर की आवाज से,
ठीक उसी तरह ,
मेरे विचारों का रेवड़ भी,सुना करता है ,
ऐसी हिंसक आवाजें ,सैंकडोहजारों....,
और ,
सहम जाया करता है
गाहे-वगाहे.., चलते-चलते ,
जिस तरह ,
गड़रिये का रेवड़ ,फिर ,
चरकर , थका-मांदा ,
आ जाता है फिर उसी
बाड़े में , रात गुजारने ,
जहां से गया था ,सुबह चरने ,
उसी तरह ,
मेरे विचारों का रेवड़ भी ,
आ जाता है अपने घर ,
घूम-फिर कर ,
आटेचावल और नमक-मिर्च के
बाड़े में.......|||

                                                *अशोक दर्द

Tuesday, January 21, 2014

इक खत मेरे नाम लिखना...


इक खत मेरे नाम लिखना |
कोई दिलकश इसमें पैगाम लिखना ||

 दोस्त पूछेंगे खत किसका आया |
 प्रेषक की जगह अनाम लिखना ||

 कितनी बदली वो बचपन की गलियाँ |
 कितना बदला वो मेरा गाँव लिखना ||

 क्या अब भी बुलाती है हमको |
 पीपल की वो ठंडी छांव लिखना ||

 मेरे बगैर लगता है अब गांव कैसा |
 हाल ए-दिल तमाम लिखना ||

 कैसे गुजर रही है आज उनकी |
जो हुए थे मेरे लिए बदनाम लिखना ||

 खत में पूरा दिन लिखना |                   सुबह लिखना शाम लिखना ||

                                                               अशोक दर्द

दीया मुहब्बत का


राह चलते मुस्कुरा गया कोई |
ठंडें पानी में आग लगा गया कोई ||

कदम रिन्द हुए और बहकने लगे |
आँखों से इतनी पिला गया कोई ||

प्यार का शोला फिर से  सुलग उठा |
भींचकर सीने से लगा गया कोई ||

दिल अवारा बच्चों सा मचलने लगा |
दिल का खिलौना हाथ में पकड़ा गया कोई ||

अंधेरी रात दिल की फिर रौशन हो उठी |
दिया मुहब्बत का दिल में जला गया कोई ||

बन्द आँखों में भी अब वो ही नज़र आयें |
पुतलियों पे अपनी तस्वीर जो बना गया कोई ||
                                       अशोक दर्द  

मेरा बेटा शुभम और बेटी शबनम


हथियार [लघुकथा ]


सोहन का तबादला दूर गांव के हाई स्कूल में हो गया |शहर की आबो हवा छूटने लगी |पत्नी ने सुझाव दिया,कल हमारे मोहल्ले में नये बने शिक्षा मंत्री प्रधान जी के यहाँ आ रहे हैं | क्यों न माताजी को उनके सामने ला उनसे ,मंत्री जी से तबादला रोकने की प्रार्थना करवाई जाये | शायद बूढ़ी माँ को देख मंत्री जी पिघल जाएँ और तबादला रद्द करवा दें | सोहन को सुझाव अच्छा लगा |वह शाम को ही गाँव रवाना हो गया और बूढ़ी माँ को गाड़ी में बैठा सुबह मंत्री जी के पहुंचने से पहले ही प्रधान जी के घर पहुँच गया |ठीक समय पर अपने लाव लश्कर के साथ मंत्री जी पहुँच गये | लोगों ने अपनी अपनी समस्याओं को लेकर कई प्रार्थना पत्र मंत्री महोदय को दिए | इसी बीच समय पाकर सोहन ने भी अपनी बूढ़ी माँ प्रार्थना पत्र लेकर मंत्री जी के सम्मुख खड़ी कर दी | कंपती-कंपाती बूढ़ी माँ के हाथ के प्रार्थना पत्र को मंत्री जी ने स्वयं लेते हुए कहा बोलो माई क्या सेवा कर सकता हूँ |तब बूढ़ी माँ बोली साहब मेरे बेटे की मेरे खातिर बदली मत करो ,इसके चले जाने से इस बूढ़ी की देखभाल कौन करेगा |शब्द इतने कातर थे कि मंत्री जी अंदर तक पिघल गये |बोले ठीक है माई ,आपके लिए आपके बेटे की बदली रद्द कर दी गई |उन्होंने साथ आये उपनिदेशक महोदय को कैम्प आर्डर बनाने को कहा |कुछ ही देर में तबादला रद्द होने के आर्डर सोहन के हाथ में थे | सोहन और बूढ़ी माँ मंत्री जी का धन्यवाद करते हुए घर आ गये |शाम की गाड़ी में सोहन ने बूढ़ी माँ गांव भेज दी | अब पत्नी भी खुश थी और सोहन भी ,उनका आजमाया हथियार चल गया था ..

                              अशोक दर्द

कुछ कविताएँ


आई बसन्त की रानी
ली मौसम ने अंगडाई फिर से, हुई धरा मस्तानी |
महकी संग हवाएं लेकर, आई बसन्त की रानी ||
नन्हे-नन्हे स्वप्न सजाकर, आई फिर तरुणाई |
नव जीवन की लिए चेतना, बही सुरभित पुरवाई ||
भ्रमरों के गुंजन ने फिर, सरगम नयी सुनाई |
नन्हीं कोंपलें खिली पेड़ों पर, जीवन ने ली अंगडाई ||
महकी संग हवाएं लेकर, आई बसन्त की रानी ||
लगे चहकने और महकने, सारे वन-उपवन |
पंछी और पंखेरू सब का, हो गया सुरभित जीवन ||
कोयल ने छेड़ी कूक, मयूर नाचा छनछन |
रंग-बिरंगी ओढ़ चुनरिया, बनी कुदरत दुल्हन |
गाने लगा गीत बसन्त के, नदियों-झरनों का पानी |
महकी संग हवाएं लेकर, आई बसन्त की रानी ||
खत्म हुआ आतंक शिशिर का, सबने खुशी मनाई |
बन्द हुए संदूकों में फिर, कम्बल और रजाई ||
धरती के कण-कण में फिर, नई उमंगे छाई |
भूल वेदना पतझड़ की ठूठों ने, कोपलों की माला सजाई ||
ऊँचे-ऊँचे हिमशिखरों का, नर्तन कर रहा पानी |
महकी संग हवाएं लेकर, आई बसन्त की रानी ||
पर्वत और ढलानों की फिर, लंबी ख़ामोशी टूटी |
रूत के सूरज से फिर, किरण बसंती फूटी ||
फूलों के मौसम में भ्रमरों ने, फिर से चाँदी कुटी |
इस बसन्ती मौसम की, सबने फिर मोजें लुटीं ||
खत्म हुई बेला ठिठुरन की, आई ऋतू सुहानी |
महकी संग हवाएं लेकर, आई बसन्त की रानी ||

                                         अशोक दर्द





व्यथा का पिटारा
जब भी ,
होता है मेरा गांव जाना तो ,                              
‘कर्मू’ मेरा पड़ोसी, बचपन का सखा ,
खोल देता है अपनी मुसीबतों का
पिटारा ,
मेरे आगे...,
बोलता है, अशोक बाबू !
जमाना बड़ा खराब आ गया,
परिवार बिखर गया है ,
सभी इधर-उधर जा बसे हैं ,
गावं की तरफ...,
देखते नहीं ;
मजदूरी से पेट नहीं पलता ,
मंहगाई जान निकालने लगी है ;
खेतों में फसल नहीं होती ,
पशु-पक्षी बीज ही चुनकर खा जाते हैं ;
‘घासनियाँ’ उदास हो गयी हैं ;
दीवारें और छतें साथ-साथ
होते हुए भी बतियाती नहीं ,
सुख-दुःख बांटती नहीं..,
जब पूछता हूँ उसके बच्चों बारे
तो..’
बोलता बिटिया दस कर के
घर बैठाई थी ,
क्योंकि आगे पढ़ाने की हिम्मत नहीं थी ,
फिर..,
ई.जी.एस. में टीचर लग गई थी ,
कुछ बरसों से ,
अब सरकार ने स्कूल कर दिया है ,
बेटी बेरोजगार हो गई
अब वह कई दिनों से
सुबह-सुबह घर से चली जाती है
धरने पर बैठने ,
और भी कई बच्चें हैं
उसकी नियति के...,
बेरोजगारी का दंश झेलते
सब दे रहे हैं  धरने
बैठें हैं अनशन पर
मगर.., उनकी कोई नहीं सुनता ;
लड़का बी.ए. ,बी.एड. है ,
वह भी वही कुछ कर रहा है
जो बिटिया शीनू कर रही है ;
धरना...हड़ताल...अनशन ;
मैं भी कई दिनों से
ठेकेदार के आगे-पीछे फिर रहा हूँ ,
कई महीनों की मजदूरी फंसी है
पैसे ही नहीं देता ,
बोलता है घाटा पड़ गया है ;
दो साल से ‘सांड’ भैंस
पाल रहा हूँ ,
जरुर कोई चेला ‘टकर’ गया है ,
घर वाली बीमार रहती है ,
दवाईयों के लिए पैसे नहीं होते ,
और भी बहुत कुछ होता है
उसके व्यथा के पिटारे में ,
जिसे मैं सुनना नहीं चाहता या
सुनकर अनसुना कर देता हूँ ,
मैं भी चाहता हूँ ,
अपनी नियति उससे सांझी करूँ ,
मगर...,
मैं उसकी नजरों में गिरना नहीं चाहता
इसलिए ,
दिल की बातें ,
दिल में छुपाए रखता हूँ
झूठे ओढ़े नकाब के अन्दर
ताकि ,
उसकी नजर में ,
मेरी आबरू
बची रहे..|| 
                     अशोक दर्द






“स्वतंत्रता के लिए”
स्वतंत्रता के लिए शीश कटाये, अमर क्रान्तिवीरों ने ,
मगर न अपने शीश झुकाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |                 
सिंचित कर लहू से अपने, इस आर्यवर्त की क्यारी में ,
आज़ादी के पुष्प खिलाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
डिगे न अपने प्रण से, लगा दी निज प्राणों की बाजी ,
तन-मन-धन सर्वस्व लुटाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
मिले प्रलोभन लाखों फिर भी, अविचल होकर डटे रहे ,
जान लुटा कर संस्कृति-संस्कृत-राष्ट्र बचाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
सुविधा-साधन सीमित थे पर, जिगरे से थे बहुत बहुत बड़े ,
दुश्मन क़दमों पर गिराये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
स्वतंत्रता के महायज्ञ में, देकर आहुति निज प्राणों की ,
माँ की कोख के मान बढ़ाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
सिंहो के संग खेलने वाले, श्रगालों से नहीं डरते हैं ,
कह कर जग वाले समझाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
कण-कण राष्ट्र का महक उठा, आजादी की खुशबु से ,
शहादत के जब फूल खिलाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
                                     अशोक दर्द