खूबसूरत नगर की खूबसूरत शख्सियत – गायक
पीयूष राज
छलछलाती रही के किनारे बसा चंबा हिमाचल
प्रदेश का एक खूबसूरत नगर है | यहाँ की स्वर्णिम संस्कृति , अलौकिक प्रकृति अपने
आप में अद्वितीय है | नैसर्गिक सुन्दरता से ओत प्रोत इस शहर में कई विभूतियों ने
जन्म लिया है | जिन्होंने अपनी प्रतिभा के बूते पहाड़ की खुशबु से दुनिया को परिचित करवाया है | इन्हीं
प्रतिभाओं में एक प्रतिभा हैं पीयूष राज | जिन्होंने अपनी लोक गायकी से सफर शुरू
करते हुए गजल गायन तक एक अदबी मुकाम हासिल किया है | प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत
के ख़ास प्रसंग –
अशोक दर्द – पीयूष जी सबसे पहले आप –पाठकों
को अपने माता पिता व जन्म स्थान के बारे बताएं ?
पीयूष राज – मेरा जन्म चंबा शहर के
मोहल्ला चमेसनी में सन उन्नीस सौ इकसठ में हुआ |मेरे पिता जी का नाम श्री जगत राम
व माताजी का नाम श्रीमती कमला देवी है | मेरे दादा बीरबल जी शहर के नामचीन व्यक्ति
थे |
अशोक दर्द – आपकी शिक्षा कहाँ – कहाँ
हुई ?
पीयूष राज – चंबा के आलावा मेरी छठी से
दसवीं तक की पढाई सलूनी तहसील के हाई स्कूल किहार में हुई | मैंने वहीं से दसवीं
पास की | मेरे पिताजी मेडिकल विभाग में वहां फ़ूड इंस्पेक्टर थे | इस कारण मैं
किहार में पढ़ा |
अशोक दर्द –उसके बाद की शिक्षा ?
पीयूष राज – उसके बाद ग्रेजुएशन डिग्री
कॉलेज चंबा से की |
अशोक दर्द – संगीत का सफ़र कब शुरू हुआ
इसकी कोई कहानी है ?
पीयूष राज – जी | इस सफ़र की एक लम्बी
कहानी है संघर्ष व मनोरंजन से भरी हुई | कहानी बचपन से शुरू करता हूँ | मैं तीन
चार साल का रहा हूँगा | बड़े बजुर्ग बताते हैं कि मैं खाली डिब्बा हाथ में लेकर बजाता व गाता रहता था | फिर जब प्राइमरी स्कूल में
दाखिल हुआ तो वहां की बाल सभा में मुझसे गवाया जाता था | घर में कोई मेहमान आता तो
उसके सामने भी मुझसे गवाया जाता | गीत सुनकर मेहमान मुझे शाबाशी देते | धीरे धीरे
मैं गीत संगीत के साथ बड़ा हो रहा था | उन दिनों चंबा शहर में किसी के घर कोई छोटा
बड़ा फंक्शन होता तो वहां गाने वालों को बुलाया जाता जिसे लोग महफ़िल का नाम देते थे
| देर रात तक ये महफ़िलें सजातीं , गाना बजाना चलता और उन महफ़िलों में मुझे भी गाने
का मौका मिलता | आज जैसे विवाह शादियों में लेडीज संगीत का रिवाज है उस समय हमारे शहर में महफ़िलों का रिवाज था | अब तो यह
परम्परा ख़त्म हो गई है |
जब मैं छठी कक्षा में हाई स्कूल किहार
में दाखिल हुआ तो वहां लोग लाहौर रेडिओ स्टेशन सुनते थे | यहाँ मैंने मेंहदी हसन
की गजलें सुननी शुरू कीं | बाद में मैंने रफ़ी , मुकेश व किशोर जी को गंभीरता से
सुनना शुरू किया | दसवीं करने के बाद मैं चंबा आ गया तथा प्रेप में चंबा डिग्री
कॉलेज में दाखिल हो गया | घर वाले मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे इसलिए साइंस रखवा दी
| परन्तु मेरे दिमाग में तो गायकी का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था | यहीं कॉलेज में
मैंने गम्भीरता से इन सब की गजलें सुनीं | परीक्षा से पहले एक दिन मन में आया कि
यदि बड़े सिंगर बनना है तो किसी बड़े शहर में जाना पड़ेगा | मैंने कई ऐसे कलाकारों के
बारे पढ़ा था कि वे कैसे घर से भाग कर दिल्ली मुंबई आदि बड़े शहरों में पहुंचे और
बड़े कलाकार बन गये | मेरे किशोर मन पर ये बातें प्रभाव दिखने लगीं थीं | यह जानूं
इतना हावी हुआ कि मैंने एक दिन घरवालों के नाम एक लम्बा चौड़ा पत्र लिखा और एक सौ
बीस रुपये जो घरवालों ने परीक्षा फार्म भरने के लिए दिए थे जेब में दाल घर से भाग
निकला |
मैं शिमला आकाशवाणी में जाना चाहता था
| बस सुबह चार बजे चंबा से शिमला के लिए चलती थी | मैं बस में बैठकर शिमला पहुँच
गया | पूछ्ते - पूछते आकाशवाणी पहुँच गया | मैंने पहली बार शिमला देखा था | मेरे
लिए यह बहुत बड़ा शहर था | यह सन उन्नीस सौ अठत्तर की बात है | वहां पहुँच कर मैं
अंदर ताक झांक कर ही रहा था की वायलनिस्ट जिनका नाम बाद में पता चला श्री राम है
ने मुझे देखा तो भगा दिया |मैं बाहर आकर पेड़ के पास एक चाय वाला होता था वहां खड़ा
हो गया और कोई साधन तलाशने लगा ताकि मैं आकाशवाणी में प्रवेश कर सकूं | तभी के.
डी. कालिया जो चंबा पांगी कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे आते दिखे | मैं उनके पास
पहुँच गया | उन्होंने पूछ कि कहां से आये हो तो मैंने उन्हें बताया कि मैं चंबा से
आया हूँ और आकाशवाणी में गाना चाहता हूँ | तो वे बोले – मुझे पन्द्र साल हो गये
धक्के खाते और तू आते ही आकाशवाणी में गाना चाहता है | उन्होंने मुझे बताया कि
पहले फार्म भरना पड़ता है फिर यहाँ आकाशवाणी का टेस्ट पास करना पड़ता है फिर कहीं
गाने का मौका मिलता है | मैंने उनसे फार्म ले देने का आग्रह किया | खैर उन्होंने
मुझे फार्म उपलब्ध करवा दिया |
उधर मेरे फोटो थानों में लग गये थे |
घर वालों ने गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवा दी थी | भराड़ी में पुलिस ने मुझे पहचान
लिया और फिर अपने पास रख लिया |कोई सिपाही चंबा से था वह जब छुट्टी घर आया तो मुझे
उसने मेरे घर पहुंचा दिया | घरवालों का खूब रोना – धोना भी हुआ | मैं वापिस आ गया
था इसलिए सब खुश थे | अब पिताजी ने मुझे फ्रीहैण्ड दे दिया | मैंने फिर कालेज में
प्रवेश ले लिया ,अब मैंने साइंस नहीं अपितु म्यूजिक रख लिया था | यह मेरी रूचि का
विषय जो था | म्यूजिक का चार साल का कोर्स मैंने एक साल में पूरा कर लिया | इस
दौरान मैंने यूथ फेस्टिवल में भाग लिया और फरिस्त प्राइज हासिल किया | अब निरंतर
मेरा संगीत ऊंचाई की ओर अग्रसर था | कॉलेज की पढाई के दौरान ही मुझे सीखने का
चस्का लग गया था और यह सुविधा चंबा जैसे छोटे शहर में नहीं थी |
अशोक दर्द – संगीत के सफ़र का अगला पड़ाव
कहाँ था ?
पीयूष राज – सन उन्नीस सौ तिरयासी में
ग्रेज्युएशन के बाद मैं दिल्ली आ गया | इस सफ़र में पिताजी ने भरपूर साथ दिया |
मंडी हाउस के पास बंगाली मार्किट में मैंने किराये पर कमरा ले लिया | मंडी हाउस
कलाकारों का गढ़ था | कई नामचीन हस्तियाँ
यहाँ आया जाया करती थीं | इसी दौरान भारतीय कला केंद्र में तबला वादक मिट्ठन लाल
जी से मुलाकात हो गई | यह वह शख्स थे जिन्होंने बेगम अख्तर के साथ तबला बजाया करते
थे | इन्होंने मुझे ग्वालियर घराने के एल के
पंडित जी से मिलवाया और फिर इनकी शागिर्दगी में मुझे बहुत कुछ सीखने को
मिला | मेरे दादा गुरु पंडित कृष्ण राव पंडित
ग्वालियर राज्य के राज्य गायक थे और उस समय के पदम् भूषण थे |
अशोक दर्द – आपकी पहली रिकॉर्डिंग कब
हुई ?
पीयूष राज – सन उन्नीस सौ बयासी
तिरयासी में ही मैंने मिन्जर के गाने ऋतुरंग नाम
से कैसेट में गाये | पूरे हिमाचल में यह पहली हिमाचली कैसेट थी | उस ज़माने में इस
कैसेट ने इतनी धूम मचाई कि पांच हजार कैसेट्स बिकीं | यह अपने आप में एक रिकॉर्ड
था |
फिर दो तीन साल बाद सन उन्नीस सौ पचासी
छियासी में हिमाचली लोक गीत कैसेट आई | जिसके दो गाने कर्मुआ छैला व दियां मेरा
बिजलु दराट इतने मशहूर हुए कि मुझे पूरे हिमाचल में घर घर पहचान मिली | फिर एच एम्
वी कंपनी ने मेरी प्रतिभा को देखते हुए तीन साल के लिए अनुबंधित कर लिया | इस बैनर
के तले एक कैसेट निकली शिव कैलासों के वासी
बहुत बुरे हिन् लोक , किट्ठे बी दो घुट
पींदे इत्य्यादी गीत भी खूब चले | इस कैसेट का संगीत मशहूर संगीतकार चरणजीत आहूजा
ने दिया था | फिर हिमाचली फिल्म रान्झू फुलमु में भी चार गीत गाये जो फिल्म दूर
दर्शन पर चली | इसी बीच मैंने फोक गाना छोड़ दिया और गजलों की तरफ बढ़ा | सन १९८९ की
बात है मुझे गुलशन कुमार जी जो टी सीरीज के मालिक थे दिल्ली में अपने ऑफिस में
बिलाय और टी सीरीज में गाने की पेशकश की परन्तु एच एम् वी के साथ अनुबंध के कारण
यह चांस मिस हो गया और फिर इस दौर में फिर कई गायक उभरे |
मेरे गाये गीतों में अम्मा पुछदी सुण
दिये मेरिये बड़ा मशहूर हुआ |मोहित चौहान ने भी इस गीत को गाया | परन्तु मुझे
निराशा हुई न शब्दों का ध्यान रखा गया न फोक वैल्यू का |
अशोक दर्द – मैंने सुना है आपने
फिल्मों में भी गया है |
पीयूष राज – जी चूड़ा एक प्रथा में गया
है | कैलाश खेर व जसविन्द्र नरूला ने भी इस फिल्म में गया है | शायद जनवरी में यह
फिल्म रिलीज होगी | इसमें मैंने गजल गई है |
अशोक दर्द --- हिमाचली फोक को घर घर
पहुँचाने के लिए अपने हिमाचल से कोई सम्मान ?
पीयूष राज – जी घर घर मेरी आवाज पहुंची
, मेरे काम को सराहा गया मेरे लिए यह अपने आप में सबसे बड़ा सम्मान है | इसके साथ
हिमतरु ने वर्ष दो हजार सोलह का मुझे हिमतरु लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित
किया , और भी कई संस्थाएं हैं जिनसे सम्मानित होने का सौभाग्य मिला है |
अशोक दर्द --हिमाचली संगीत व संस्कृति
में अन्य कोई व्यक्तिगत योगदान जिसके बारे
में मैं पूछ नहीं पाया ?
पीयूष राज – मैंने संस्कृति मंत्रालय
भारत सरकार दिल्ली से हिमाचली म्यूजिक व कल्चर में रिसर्च की है और थीसिस जमा करवा
दी है | मैं इंडियन कल्चर फॉर कल्चरल रिसोर्सेज में हिमाचली लोक गायन व गजल के लिए
एप्रूव्ड एकमात्र हिमाचली सिंगर हूँ | यह
मेरी और हिमाचल की सांझी उपलब्धि है |
और हाँ एक बात जो मैं बताना भूल गया
मैंने उसी जमाने में आकाशवाणी शिमला में
फिर टेस्ट दिया और पास किया था | आज भी
आकाशवाणी में मेरे रिकॉर्ड गीत हैं जो समय समय पर लोगों तक पहुँचते रहते हैं |
अशोक दर्द – आपका ड्रीम सांग ?
पीयूष राज –मैं बचपन में ये गीत- सांय
सांय मत कर रविये [स्व. खेम राज गुप्त द्वारा लिखा गीत ] व युग जियो धारा रियो गुजरो सुनता था और सोचता था कि यदि मैं अच्छा सिंगर बना तो
इन गीतों को जरूर गाऊंगा ये मेरे ड्रीम सांग थे | इसी वर्ष मेरी यह इच्छा पूरी हुई
| मैंने ये गीत इसी वर्ष २०१७ में गाये |
ये मेरे ड्रीम सांग थे |
अशोक दर्द – आपकी इस विरासत का वारिस ?
पीयूष राज – मेरी बेटी दीक्षा पियूष भी
बहुत अच्छा गाती है | दो मराठी फिल्मों में गा चुकी है | और भी कई सीरियलों के
टाइटल सॉंग उसने गाये हैं | आजकल मुंबई में रहकर संगीत साधना में जुटी है |
अशोक दर्द – उभरते गायकों के लिए कोई
सन्देश ?
पीयूष राज ---बस यही कहना चाहूँगा कि
फोक की तासीर के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए |यह एक लम्बी साधना है धैर्य से
साधनारत रहें | सफलता जरूर मिल जायेगी |
अशोक दर्द -- चंबा कितना याद आता है ?
पीयूष राज ---चंबा मेरी जन्म भूमि है ,
मेरी साँसों में बसता है तभी तो मेरे अंदर लोक संगीत जिन्दा है |
[४]