Thursday, May 14, 2020


खूबसूरत नगर की खूबसूरत शख्सियत – गायक पीयूष राज

छलछलाती रही के किनारे बसा चंबा हिमाचल प्रदेश का एक खूबसूरत नगर है | यहाँ की स्वर्णिम संस्कृति , अलौकिक प्रकृति अपने आप में अद्वितीय है | नैसर्गिक सुन्दरता से ओत प्रोत इस शहर में कई विभूतियों ने जन्म लिया है | जिन्होंने अपनी प्रतिभा के बूते पहाड़ की  खुशबु से दुनिया को परिचित करवाया है | इन्हीं प्रतिभाओं में एक प्रतिभा हैं पीयूष राज | जिन्होंने अपनी लोक गायकी से सफर शुरू करते हुए गजल गायन तक एक अदबी मुकाम हासिल किया है | प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के ख़ास प्रसंग –
अशोक दर्द – पीयूष जी सबसे पहले आप –पाठकों को अपने माता पिता व जन्म स्थान के बारे बताएं ?
पीयूष राज – मेरा जन्म चंबा शहर के मोहल्ला चमेसनी में सन उन्नीस सौ इकसठ में हुआ |मेरे पिता जी का नाम श्री जगत राम व माताजी का नाम श्रीमती कमला देवी है | मेरे दादा बीरबल जी शहर के नामचीन व्यक्ति थे |
अशोक दर्द – आपकी शिक्षा कहाँ – कहाँ हुई ?
पीयूष राज – चंबा के आलावा मेरी छठी से दसवीं तक की पढाई सलूनी तहसील के हाई स्कूल किहार में हुई | मैंने वहीं से दसवीं पास की | मेरे पिताजी मेडिकल विभाग में वहां फ़ूड इंस्पेक्टर थे | इस कारण मैं किहार में पढ़ा |
अशोक दर्द –उसके बाद की शिक्षा ?
पीयूष राज – उसके बाद ग्रेजुएशन डिग्री कॉलेज चंबा से की |
अशोक दर्द – संगीत का सफ़र कब शुरू हुआ इसकी कोई कहानी है ?
पीयूष राज – जी | इस सफ़र की एक लम्बी कहानी है संघर्ष व मनोरंजन से भरी हुई | कहानी बचपन से शुरू करता हूँ | मैं तीन चार साल का रहा हूँगा | बड़े बजुर्ग बताते हैं कि मैं खाली  डिब्बा हाथ में लेकर बजाता  व गाता रहता था | फिर जब प्राइमरी स्कूल में दाखिल हुआ तो वहां की बाल सभा में मुझसे गवाया जाता था | घर में कोई मेहमान आता तो उसके सामने भी मुझसे गवाया जाता | गीत सुनकर मेहमान मुझे शाबाशी देते | धीरे धीरे मैं गीत संगीत के साथ बड़ा हो रहा था | उन दिनों चंबा शहर में किसी के घर कोई छोटा बड़ा फंक्शन होता तो वहां गाने वालों को बुलाया जाता जिसे लोग महफ़िल का नाम देते थे | देर रात तक ये महफ़िलें सजातीं , गाना बजाना चलता और उन महफ़िलों में मुझे भी गाने का मौका मिलता | आज जैसे विवाह शादियों में लेडीज संगीत का रिवाज है उस समय  हमारे शहर में महफ़िलों का रिवाज था | अब तो यह परम्परा ख़त्म हो गई है |
जब मैं छठी कक्षा में हाई स्कूल किहार में दाखिल हुआ तो वहां लोग लाहौर रेडिओ स्टेशन सुनते थे | यहाँ मैंने मेंहदी हसन की  गजलें सुननी शुरू कीं | बाद में  मैंने रफ़ी , मुकेश व किशोर जी को गंभीरता से सुनना शुरू किया | दसवीं करने के बाद मैं चंबा आ गया तथा प्रेप में चंबा डिग्री कॉलेज में दाखिल हो गया | घर वाले मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे इसलिए साइंस रखवा दी | परन्तु मेरे दिमाग में तो गायकी का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था | यहीं कॉलेज में मैंने गम्भीरता से इन सब की गजलें सुनीं | परीक्षा से पहले एक दिन मन में आया कि यदि बड़े सिंगर बनना है तो किसी बड़े शहर में जाना पड़ेगा | मैंने कई ऐसे कलाकारों के बारे पढ़ा था कि वे कैसे घर से भाग कर दिल्ली मुंबई आदि बड़े शहरों में पहुंचे और बड़े कलाकार बन गये | मेरे किशोर मन पर ये बातें प्रभाव दिखने लगीं थीं | यह जानूं इतना हावी हुआ कि मैंने एक दिन घरवालों के नाम एक लम्बा चौड़ा पत्र लिखा और एक सौ बीस रुपये जो घरवालों ने परीक्षा फार्म भरने के लिए दिए थे जेब में दाल घर से भाग निकला |
मैं शिमला आकाशवाणी में जाना चाहता था | बस सुबह चार बजे चंबा से शिमला के लिए चलती थी | मैं बस में बैठकर शिमला पहुँच गया | पूछ्ते - पूछते आकाशवाणी पहुँच गया | मैंने पहली बार शिमला देखा था | मेरे लिए यह बहुत बड़ा शहर था | यह सन उन्नीस सौ अठत्तर की बात है | वहां पहुँच कर मैं अंदर ताक झांक कर ही रहा था की वायलनिस्ट जिनका नाम बाद में पता चला श्री राम है ने मुझे देखा तो भगा दिया |मैं बाहर आकर पेड़ के पास एक चाय वाला होता था वहां खड़ा हो गया और कोई साधन तलाशने लगा ताकि मैं आकाशवाणी में प्रवेश कर सकूं | तभी के. डी. कालिया जो चंबा पांगी कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे आते दिखे | मैं उनके पास पहुँच गया | उन्होंने पूछ कि कहां से आये हो तो मैंने उन्हें बताया कि मैं चंबा से आया हूँ और आकाशवाणी में गाना चाहता हूँ | तो वे बोले – मुझे पन्द्र साल हो गये धक्के खाते और तू आते ही आकाशवाणी में गाना चाहता है | उन्होंने मुझे बताया कि पहले फार्म भरना पड़ता है फिर यहाँ आकाशवाणी का टेस्ट पास करना पड़ता है फिर कहीं गाने का मौका मिलता है | मैंने उनसे फार्म ले देने का आग्रह किया | खैर उन्होंने मुझे फार्म उपलब्ध करवा दिया |
उधर मेरे फोटो थानों में लग गये थे | घर वालों ने गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवा दी थी | भराड़ी में पुलिस ने मुझे पहचान लिया और फिर अपने पास रख लिया |कोई सिपाही चंबा से था वह जब छुट्टी घर आया तो मुझे उसने मेरे घर पहुंचा दिया | घरवालों का खूब रोना – धोना भी हुआ | मैं वापिस आ गया था इसलिए सब खुश थे | अब पिताजी ने मुझे फ्रीहैण्ड दे दिया | मैंने फिर कालेज में प्रवेश ले लिया ,अब मैंने साइंस नहीं अपितु म्यूजिक रख लिया था | यह मेरी रूचि का विषय जो था | म्यूजिक का चार साल का कोर्स मैंने एक साल में पूरा कर लिया | इस दौरान मैंने यूथ फेस्टिवल में भाग लिया और फरिस्त प्राइज हासिल किया | अब निरंतर मेरा संगीत ऊंचाई की ओर अग्रसर था | कॉलेज की पढाई के दौरान ही मुझे सीखने का चस्का लग गया था और यह सुविधा चंबा जैसे छोटे शहर में नहीं थी |
अशोक दर्द – संगीत के सफ़र का अगला पड़ाव कहाँ था ?
पीयूष राज – सन उन्नीस सौ तिरयासी में ग्रेज्युएशन के बाद मैं दिल्ली आ गया | इस सफ़र में पिताजी ने भरपूर साथ दिया | मंडी हाउस के पास बंगाली मार्किट में मैंने किराये पर कमरा ले लिया | मंडी हाउस कलाकारों का गढ़ था |  कई नामचीन हस्तियाँ यहाँ आया जाया करती थीं | इसी दौरान भारतीय कला केंद्र में तबला वादक मिट्ठन लाल जी से मुलाकात हो गई | यह वह शख्स थे जिन्होंने बेगम अख्तर के साथ तबला बजाया करते थे | इन्होंने मुझे ग्वालियर घराने के एल के  पंडित जी से मिलवाया और फिर इनकी शागिर्दगी में मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला | मेरे दादा गुरु पंडित कृष्ण राव पंडित  ग्वालियर राज्य के राज्य गायक थे और उस समय के पदम् भूषण थे |
अशोक दर्द – आपकी पहली रिकॉर्डिंग कब हुई ?
पीयूष राज – सन उन्नीस सौ बयासी तिरयासी में ही मैंने मिन्जर के गाने ऋतुरंग नाम से कैसेट में गाये | पूरे हिमाचल में यह पहली हिमाचली कैसेट थी | उस ज़माने में इस कैसेट ने इतनी धूम मचाई कि पांच हजार कैसेट्स बिकीं | यह अपने आप में एक रिकॉर्ड था |
फिर दो तीन साल बाद सन उन्नीस सौ पचासी छियासी में हिमाचली लोक गीत कैसेट आई | जिसके दो गाने कर्मुआ छैला व दियां मेरा बिजलु दराट इतने मशहूर हुए कि मुझे पूरे हिमाचल में घर घर पहचान मिली | फिर एच एम् वी कंपनी ने मेरी प्रतिभा को देखते हुए तीन साल के लिए अनुबंधित कर लिया | इस बैनर के तले एक कैसेट निकली शिव कैलासों के वासी
बहुत बुरे हिन् लोक , किट्ठे बी दो घुट पींदे इत्य्यादी गीत भी खूब चले | इस कैसेट का संगीत मशहूर संगीतकार चरणजीत आहूजा ने दिया था | फिर हिमाचली फिल्म रान्झू फुलमु में भी चार गीत गाये जो फिल्म दूर दर्शन पर चली | इसी बीच मैंने फोक गाना छोड़ दिया और गजलों की तरफ बढ़ा | सन १९८९ की बात है मुझे गुलशन कुमार जी जो टी सीरीज के मालिक थे दिल्ली में अपने ऑफिस में बिलाय और टी सीरीज में गाने की पेशकश की परन्तु एच एम् वी के साथ अनुबंध के कारण यह चांस मिस हो गया और फिर इस दौर में फिर कई गायक उभरे |
मेरे गाये गीतों में अम्मा पुछदी सुण दिये मेरिये बड़ा मशहूर हुआ |मोहित चौहान ने भी इस गीत को गाया | परन्तु मुझे निराशा हुई न शब्दों का ध्यान रखा गया न फोक वैल्यू का |
अशोक दर्द – मैंने सुना है आपने फिल्मों में भी गया है |
पीयूष राज – जी चूड़ा एक प्रथा में गया है | कैलाश खेर व जसविन्द्र नरूला ने भी इस फिल्म में गया है | शायद जनवरी में यह फिल्म रिलीज होगी | इसमें मैंने गजल गई है |
अशोक दर्द --- हिमाचली फोक को घर घर पहुँचाने के लिए अपने हिमाचल से कोई सम्मान ?
पीयूष राज – जी घर घर मेरी आवाज पहुंची , मेरे काम को सराहा गया मेरे लिए यह अपने आप में सबसे बड़ा सम्मान है | इसके साथ हिमतरु ने वर्ष दो हजार सोलह का मुझे हिमतरु लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया , और भी कई संस्थाएं हैं जिनसे सम्मानित होने का सौभाग्य मिला है |
अशोक दर्द --हिमाचली संगीत व संस्कृति में अन्य कोई व्यक्तिगत  योगदान जिसके बारे में मैं पूछ नहीं पाया ?
पीयूष राज – मैंने संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार दिल्ली से हिमाचली म्यूजिक व कल्चर में रिसर्च की है और थीसिस जमा करवा दी है | मैं इंडियन कल्चर फॉर कल्चरल रिसोर्सेज में हिमाचली लोक गायन व गजल के लिए एप्रूव्ड  एकमात्र हिमाचली सिंगर हूँ | यह मेरी और हिमाचल की सांझी उपलब्धि है |
और हाँ एक बात जो मैं बताना भूल गया मैंने उसी जमाने में  आकाशवाणी शिमला में फिर टेस्ट दिया और पास किया  था | आज भी आकाशवाणी में मेरे रिकॉर्ड गीत हैं जो समय समय पर लोगों तक पहुँचते रहते हैं |
अशोक दर्द – आपका ड्रीम सांग ?
पीयूष राज –मैं बचपन में ये गीत- सांय सांय मत कर रविये [स्व. खेम राज गुप्त द्वारा लिखा गीत ]  व युग जियो धारा  रियो गुजरो सुनता  था और सोचता था कि यदि मैं अच्छा सिंगर बना तो इन गीतों को जरूर गाऊंगा ये मेरे ड्रीम सांग थे | इसी वर्ष मेरी यह इच्छा पूरी हुई | मैंने ये गीत इसी  वर्ष २०१७ में गाये | ये मेरे ड्रीम सांग थे |
अशोक दर्द – आपकी इस विरासत का वारिस ?
पीयूष राज – मेरी बेटी दीक्षा पियूष भी बहुत अच्छा गाती है | दो मराठी फिल्मों में गा चुकी है | और भी कई सीरियलों के टाइटल सॉंग उसने गाये हैं | आजकल मुंबई में रहकर संगीत साधना में जुटी है |
अशोक दर्द – उभरते गायकों के लिए कोई सन्देश ?
पीयूष राज ---बस यही कहना चाहूँगा कि फोक की तासीर के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए |यह एक लम्बी साधना है धैर्य से साधनारत रहें | सफलता जरूर मिल जायेगी |
अशोक दर्द --  चंबा कितना याद आता है ?
पीयूष राज ---चंबा मेरी जन्म भूमि है , मेरी साँसों में बसता है तभी तो मेरे अंदर लोक संगीत जिन्दा है |



















[४]

Monday, May 4, 2020

आलेख

हालात-ए-हाजरा कहो या मंज़रकशी
जो कहूंगा सच सच कहूंगा.......

                लॉक डॉन ....
यहां लॉक डॉन क्या लगा पूरा लोक ही सन्नाटों से भर आया है । लोक की सारी भागदौड़ सिमट सी गई है सब कुछ रुका रुका थमा थमा ।आदमी घरों के अंदर इस तरह कैद है मानो पिंजरे में पंछी । और परिंदे फिर पेड़ों पर चहचहाने लगे हैं। कुछ जानवर तो जंगल छोड़कर बस्तियों में ऐसे घूमने लगे हैं मानो उनके पुरखों का जंगल फिर उनके हाथ आ गया हो ।उधर मुफ्त के सलाहकारों की बाढ़ सी आ गई है । सबके पास देने के लिए अलग-अलग मशवरे हैं अलग-अलग तर्क हैं । यह नहीं होता तो वह होता ....। वह नहीं होता तो यह होता...। बगैरा बगैरा....। 

कुछ सलाहकार तो यहां तक मानते हैं कि सरकार ने उनकी सलाह ली होती तो शायद लॉक डॉउन की जरूरत ही नहीं पड़ती । वे इस सारी समस्या का समाधान चुटकियों में कर देते  । परंतु सरकार ने उनकी इस तीक्ष्ण बुद्धि का इस्तेमाल ही नहीं किया तो बेचारे क्या करें ? शुक्र है जुकर बर्ग का जिसने फेसबुक जैसा माध्यम दिया है अपनी भड़ास निकालने को । इसलिए वे बेचारे अपनी भड़ास फेसबुक पर लिखकर ही निकाल लेते हैं ।

 कुछ लोग तो इतनी हिमाकत पर उतर आते हैं कि समुद्र में पेशाब करने से भी गुरेज नहीं करते। इसे वे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं ।जबकि उन्हें यह भी पता है कि उनके समुद्र में पेशाब करने से समुद्र कभी गंदा नहीं हो पाएगा । फिर भी वे पूरी निष्ठाएवं प्रतिबद्धता के साथ अपने काम में डटे हुए हैं  और इस काम को करते हुए गौरव का अनुभव भी करते हैं ,और फूले भी नहीं समाते हैं । 

कुछ का तो यहां तक मानना है कि यह भीषण त्रासदी सरकार के लिए है , उनके लिए नहीं । इसलिए उन्हें अपनी जान भी सरकारी जान लगती है । इसलिए वे कर्फ्यू तोड़कर बार-बार बाहर जाना अपनी शान समझते हैं । वे ये  जानना चाहते हैं कि उनकी सरकारी जान की सरकार कितनी हिफाजत करती है , सरकार को उनकी जान की कितनी चिंता है और जब सरकार उनकी जान की  हिफाज़त का नमूना देकर वापिस भेजती है तो वे....फिर सरकार को भला बुरा कहते नहीं थकते ।

कुछ  सिरफिरे  एक दूसरे समुदाय को गालियां बककर हीरो बनने की फिराक में जुटे हुए हैं ।  परंतु किसी को गालियां बक कर आज तक कौन हीरो बन पाया है । आखिर वे विलेन ही साबित हो जाते हैं और फिर उन्हें अपना मुंह छुपा कर लोक में जीना पड़ रहा है ।

 सदियां गवाह  हैं जिस गंगा-जमुनी तहजीब की अमृतधारा को सदियां नहीं सुखा पाई तो ये कुकुरमुत्ते क्या सुखा पाएंगे ? सदियां इस बात की साक्षी रही है इस गंगा जमुनी तहजीब की । इसअमृतधारा ने ऐसे कितने ही विलेन  कूड़े की तरह उठाकर कूड़े के ढेर पर फेंके हैं जो नफरत के बूते हीरो बनने की फिराक में रहे हैं । कुछ तस्वीरें जरूर विचलित करती हैं जिन्हें देखकर आंखों में आंसुओं की बूंदें उभर आती हैं ....।।

राजनीति में हर एक शब्द का अपना अलग मुकाम होता है , अलग  अर्थ होता है ।राजनीति में "लेकिन" शब्द आम प्रचलित है जो अधिकतर विपक्ष द्वारा इस्तेमाल किया जाता है । खासकर किसी भी वाक्य के अंत में लेकिन ...शब्द राजनीति में यूं भी जरूरी है । वरना "सर्वसम्मति" शब्द हावी हो जाता है इसलिए हर एक बयान के बाद में "लेकिन" शब्द इस्तेमाल हो ही जाता है । इस बार लॉक डॉन में विपक्ष ने सत्ता के साथ खड़े होते हुए भी "लेकिन " शब्द का प्रयोग हर एक ब्यान  में करके अपनी अहम भूमिका निभाई । 

परंतु "लेकिन"का ब्लूप्रिंट क्या हो सकता है यह नहीं दे पाया। ताकि इस भीषण त्रासदी के समय में उनकी सक्रिय सहयोगात्मक भागीदारी ऐतिहासिक हो जाती । यूं तो भागीदारी ऐतिहासिक ही है परंतु सर्जनात्मकता के अभाव में उसे सवर्ण अक्षरों में लिखा जाए यह तय नहीं है । सारे स्वर्णाक्षर उनकी झोली में आ गए जिन्होंने अपने नन्हे नन्हे हाथों से अपने छोटे-छोटे गुल्लक तोड़कर सारे पैसे पुलिस के हाथों में रख दिए देश को देने के लिए । और मीडिया ने यह सब जब देश को दिखाया तो न जाने यह हाथ कितनों के ही प्रेरणा स्रोत बन गए । 

कहते हैं गांव सिकुड़ता है तो शहर फैलता है और जब शहर फैलता है तो गांव की ओर जाता है ।
शहर की गोद में बैठा गांव उस दिन दिल्ली के आनंद विहार में देखा तो...
शहर ने गांव को इस तरह भगाया मानो अब शहर के भीतर गांव का कोई काम न रहा हो हमने सुना उनका बिजली पानी काट दिया गया सच कुछ भी हो परंतु था बड़ा डरावना और मर्मांतक दृश्य यह  
पलों में गांव के कितने ही सपने शहर की चौखट पर ध्वस्त होते देखे गए तो आंखों में नमकीन पानी की बूंदें तिर आईं।

 सारे गांव अपनी गृहस्थी सिर पर लादे भूखे प्यासे फिर लौट चले थे ।अपनी जमीन ने उन्हें फिर बुला लिया हो अपनी गोद मैं सिर रखकर रोने के लिए मां की तरह । बेशक अफवाहों का बाजार गर्म था परंतु उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था ।बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं  गुमसुम मूक होकर इनकी मुफलिसी पर नजरें गड़ाए देखे जा रही थीं । और यह धरती के देवता इन्हें रचने वाले स्वयं बेघर होकर कितने असहाय थे । इतिहास इनकी बेबसी जरूर अपनी पंजिका में दर्ज करेगा । 
मुंबई के मालेगांव में भी इस तरह के दृश्यों ने जरूर विचलित किया । 

पत्थरबाज और थूक थू  प्राणी  थैंक्यू के बदले जब थू थू करते दिखे और पत्थर फैंकते तो पीड़ा हुई और भीतर से आत्मा ने कहा इन बिगड़े हुए लोगों को अपने हाल पर क्यों नहीं छोड़ दिया जाता । पर यह तर्क नहीं  था ,महज भावुकता थी ।  इस दौरान देश ने तालियां भी बजाई और थालियां भी और कुछ लोगों को प्रधानमंत्री की यह बात समझ नहीं आई तो उन्होंने जी भर कर गाल भी बजाए और गालियां भी ।खैर यह सब इस दौर का ही तो कमाल है ।लोकतंत्र में अभिव्यक्ति का अधिकार है न सबको ।

कुछ सितारे टूटकर विदा हुए तो जमाना रोया । अपने परिजनों के अंतिम दर्शन भी ना कर पाने की पीड़ा सदैव उन सीनों में कील की तरह चुभती रहेगी जो इस कठिन समय में  मिलने कीआखिरी हसरत भी पूरी न कर पाए ।पूरी दुनिया के दरवाजे जैसे बंद हो गए हैं । किसी ने एक बड़ा ताला जैसे दुनिया के दरवाजे पर लगा दिया हो ।चारों ओर  सन्नाटा  और  अंधेरा ...।पर आस का दीपक फिर भी इस तरह अंधेरे पर जगमगाता रहा और जतलाता रहा कि   अंधेरा नित नहीं रहता ....सुबह जरूर आएगी । और जीत जरूर होगी ....।भयानक अंधेरे के खिलाफ रोशनी अवश्य जीत जाएगी ।
 
इस दौर में साहित्य ने भी खूब बाजी मारी । कच्चा पक्का खूब रचा गया । साहित्य के प्रचार प्रसार में फेसबुक और व्हाट्सएप ने अपनी अहम भूमिका निभाई इसलिए  जुकर वर्ग को भी धन्यवाद देना जरूरी बनता  है , सबके लिए प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाने के लिए ।
 दूसरे चरण के आखिरी दिन आज तक संक्रमण का आंकड़ा  चालीस हजार के आसपास आ पहुंचा है परंतु उम्मीद की किरण  यह भी है कि दस हजार से ऊपर लोगों ने जीत भी दर्ज की है ,जो कोरोना को हराकर घर लौट आए हैं ।करीब बारह सौ लोग जो घर नहीं लौटे  उनके लिए हम सब श्रद्धा सुमन ही अर्पित कर सकते हैं ।

  कोरोना-योद्धाओं को कभी यह एहसास न हो कि वे अकेले हैं । देश का नैतिक दायित्व है की उन पर फूल भी बरसाए और सीने से भी लगाए ।उनके पावों में कांटा चुभने की पीड़ा को भी देश महसूस करें , उनके सुख की सदैव दुआ करे ।।

 कल से लॉक डॉन का तीसरा चरण शुरू हो रहा है यह चौदह दिन और गृहवास के हैं ।भगवान राम ने तो राक्षसों का संहार करने के लिए चौदह साल बनवास में काटे थे । हमने तो सिर्फ चौदह दिन गृहवास के काटने हैं ।आओ खुशी से ये चौदह दिन गृहवास के और  काट लें ताकि यह कोरोना राक्षस हारकर भाग जाए...।।
    
........****इस मंज़रकशी की कुछ दिलचस्प बातें फिर तीसरे चरण के बाद ****।। 
                                                    अशोक दर्द
Attachments area