Wednesday, January 9, 2019

sakshatkaar aadrniya subhash neerav ji ke saath



देश के नामचीन हिन्दी कथाकार, कवि व अनुवादक सुभाष नीरव से अशोक दर्द द्वारा लिया गया साक्षात्कार


अशोक दर्द : सर पहला प्रश्न। आप अपने जन्म-स्थान परिवार के बारे में बताएँ।
सुभाष नीरव  : मेरा जन्म आज़ादी के छह-साढ़े वर्ष बाद एक गरीब पंजाबी परिवार में हुआ जो सन् 1947 के भारत-पाक विभाजन में अपना सब कुछ गंवा कर, तन और मन पर गहरे जख़्म लेकर, पाकिस्तान से भारत आया था और आश्रय तथा रोजी रोटी की तलाश में पश्चिम उत्तर प्रदेश के एक बहुत छोटे से उपनगर मुराद नगर- में बसा था। इस लुटे-पिटे परिवार में मेरे माता-पिता, दादा, नानी और चाचा थे। उन दिनों मुराद नगर स्थित आर्डनेंस फैक्टरी में श्रमिकों की भर्ती हो रही थी और मेरे पिता को यहाँ एक श्रमिक के रूप में नौकरी मिल गई थी, साथ में रहने को छोटा-सा क्वार्टर भी। क्वार्टर क्या था, खपरैल की छत और मिट्टी के फर्श वाला एक बड़ा कमरा और एक छोटा-सा दीवार से ढका बरामदा। कहा जाता है, आज़ादी से पहले यहाँ अंग्रेजों के घोड़े बांधे जाते थे। पर लुटे-पिटे मेरे परिवार को इससिर-लुकाईका ही बहुत बड़ा सहारा था। भारत में आकर उन्होंने पाकिस्तान में छूट गई अपनी ज़मीन-जायदाद का कोई क्लेम नहीं भरा था, जो मिल गया था, उसी सें संतोष कर लिया और अपने कड़वे अतीत के काले दिनों के साथ-साथ तन-मन पर झेले ज़ख़्मों को भूलने की कोशिश करने लगे थे। मेरी तीन बहनें हैं और दो भाई। एक बहन मुझसे बड़ी है, बाकी सभी भाई बहन मुझसे छोटे हैं।

अशोक दर्द : आपकी शिक्षा में किस किस विद्याल और महाविद्याल्य का योगदान रहा।
सुभाष नीरव : प्राइमरी आदर्श बाल विद्यालयसे की और फिर मुराद नगर स्थित सरकारी स्कूल आर्डनेंस फैक्टरी हाई स्कूलसे हाई स्कूल किया, इंटरमीडिएट मोदी इंटर कालेज, मोदी नगरसे और बी प्राइवेट तौर पर मेरठ यूनीवर्सिटी से।

अशोक दर्द : विद्यार्थी जीवन की अविस्मरणीय स्मृतियाँ आप पाठकों से साझा करना चाहेंगे ?
सुभाष नीरव  :  स्मृतियाँ तो प्राइमरी शिक्षा से लेकर कालेज की शिक्षा तक बहुत हैं। प्राइमरी से ही शुरू करता हूँ। कक्षा पाँच में कमलजीत नाम की हमारी कक्षाध्यापिका थीं। उनका नाम मुझे इसलिए अभी तक याद है क्योंकि मेरी बड़ी बहन का नाम कमलेश था और घर में सभी उसे कमला या कमली कहकर बुलाते थे। यह नई कक्षाध्यापिका इतनी सुन्दर थीं कि मैं हर समय छिपछिप कर उनके चेहरे की ओर देखा करता था। गोल गोरे-चिट्टे चेहरे पर पतली-सी नाक और बिल्लोरी आँखें देखकर मैं नौ-दस साल का बालक अपनी सुध-बुध खो देता था। फिर मेरे मन में उनके करीब अधिक से अधिक खड़ा होने, उनसे बात करने की इच्छा तीव्र होने लग पड़ी। इसके लिए मैं बहाने ढूँढ़ने लगा। और एक दिन उन्होंने मेरी चोरी पकड़ ली।
      तू मेरी ओर क्या घूरता रहता है ?”
      यह सवाल सुनकर मैं सहम गया था।
टीचर ने मेरा उत्तर पाकर मुझे अपने पास खड़ा कर लिया तो मैं इतना घबरा उठा कि मेरा चेहरा रुआंसा हो उठा। उसने मुझे अपनी बांहों में लेकर प्यार से पूछा, “मैं तुझे अच्छी लगती हूँ?” मैंने सिर हिलाकरहाँमें उत्तर दिया।
अच्छा ! बता तो कैसी लगती हूँ ?”
मेरे चाचा को फिल्में देखने का बहुत शौक था। कस्बे में टैंट वाला एक टाकीज़ था- जय टाकीज़। हर शुक्रवार को नई फिल्म लगती थी। एक रिक्शा जो बड़े-बड़े रंगीन पोस्टरों से ढका होता, पूरे फैक्टरी एस्टेट में घूमता था। रिक्शावाला लाउड-स्पीकर पर लच्छेदार भाषा में फिल्म की मशहूरी करता था। हम बच्चे उसके पीछे पीछे दूर तक दौड़ते थे। पोस्टरों पर हीरो-हीरोइनों के रंगीन या श्याम-श्वेत चित्र हमें खूब लुभाते थे। जब भी कोई नई फिल्म लगती, चाचा फैक्ट्री से आकर, खाना खाने के बाद साइकिल उठा अपने दोस्तों के संग रात का आखिरी शो देखने चल पड़ते। कभी कभी मुझे भी साइकिल पर बिठाकर ले जाते। उन दिनों शम्मी कपूर और आशा पारीख की कई फिल्में मैंने चाचा के संग देखी थीं।
टीचर का प्रश्न सुनकर मेरे मुँह से अचानक निकल गया, “आशा पारीख !       
मेरे उत्तर पर वह एक ज़ोरदार ठहाका लगाकर हँस पड़ी और मेरे चेहरे पर हल्की-सी चपत लगा कर बोली, “अभी तेरे पढ़ने के दिन हैं बेटा, आशा पारीख को छोड़ और मन लगाकर पढ़ाई कर।
दूसरी अविस्मरणीय घटना हाई स्कूल से जुड़ी है। छ्ठी कक्षा में दाखिला हुआ तो पहली बार कुर्सियाँ और डेस्क देखने को मिले, सिर पर घूमते पंखे और बड़ा-सा श्यामपट। मेरे लिए ये सब अजीब और कौतुहल भरा था क्योंकि प्राइमरी तक मैं जिस विद्यालय में पढ़ा था, वहाँ नीचे ज़मीन पर बैठकर पढ़ना पड़ता था। बिछाने के लिए बोरी या टाट का टुकड़ा भी घर से ले जाना पड़ता था और सिर पर पक्की छत नहीं थी, घासफूस का छप्पर होता था। बारिश में पानी टपकता तो पूरी कक्षा में बैठने की जगह बचती। अक्सर बरसात में बच्चों को घर भेज दिया जाता।  अंग्रेजी पढ़ने की हमारी शुरुआत छ्ठी कक्षा से हुई। आजकल जो बच्चे नर्सरी में ही .बी.सी. रटने लगते हैं, वह हमें छठी कक्षा में पढ़ाना शुरू की गई। अंग्रेजी की रंगीन किताब मुझे बहुत आकर्षित करती थी। मेरे पास सिर्फ़ यही किताब नई थी जो पिता को मजबूरी में खरीदकर मुझे दिलानी पड़ी थी। अन्यथा पिता अपनी आर्थिक तंगी के चलते मुझे नई किताबें खरीदकर देने की बजाय पुरानी सेकेंड हैंड किताबें लेकर देते थे, जिनके वर्के पीले पड़े होते और जो जगह जगह से फटी होतीं। जब मैं अपने सहपाठियों के पास नई किताबें देखता तो मेरा मन उनके चिकने पन्नों को स्पर्श करने को तरसता था। उनके चिकने पन्ने और उनकी खुशबू मुझे अपनी ओर खींचती थी। पर मैं बेबस था।एक दिन हुआ यूं कि मेरी वह अंग्रेजी की किताब गुम हो गई। दो दिन मैंने यह बात छिपाये रखी और मन ही मन बहुत भयभीत रहा। मार पड़ने का डर था। एक दिन मैंने अपने साथ बैठने वाले लड़के के बस्ते में से मौका पाकर उसकी अंग्रेजी की किताब चुरा ली। जीवन में यह मेरी पहली चोरी थी। दिल जोरों से धड़क रहा था। पकड़े जाने का डर था। और मैं तीसरे दिन ही पकड़ा गया। अंग्रेजी की टीचर ने मुझसे जब पूछा कि मैंने यह चोरी क्यों की तो मैंने सबकुछ सच-सच बता दिया। उन्होंने मुझे सजा के तौर पर क्लासरूम से बाहर धूप में दोनों हाथ ऊपर उठाकर खड़ा रखा। मेरा चेहरा लाल हो गया था और टांगे कांपने लगी थीं। क्लास खत्म होने पर क्लास टीचर मुझे अपने संग स्टाफ़ रूम में ले गईं और एक पुरानी अंग्रेजी की किताब मुझे देते हुए बोली, ये ले, इसे संभाल कर रखना। और अब कभी चोरी मत करना।”

अशोक दर्द : कोई ऐसा अध्यापक जिसके व्यक्तित्व से आपको प्रेरणा मिली हो?
सुभाष नीरव  :  छठी कक्षा में हमारे हिंदी के अध्यापक थे - बाल मुकुन्द जी  बहुत विनम्र और सादा जीवन जीने वाले। उनके पढ़ाने का ढंग बड़ा रोचक था। वह पढ़ाते समय बच्चों के संग बच्चा बन जाते थे। सप्ताह में एक दिन वह कुछ पढ़ाते और हर छात्र को वो कहानी सुनाने को कहते थे जो उसने अपने माता-पिता, दादा-दादी अथवा नाना-नानी से सुनी होती थी। इससे वह हमारी वाक-क्षमता और प्रस्तुति के ढंग को परखा करते थे। और बताते थे कि कोई कहानी किस प्रकार अधिक से अधिक रोचक ढंग से सुनाई जा सकती है। एक दिन खाली पीरियड में वह पूरी कक्षा को बड़े से हॉलनुमा कमरे में ले गए। इसमें दीवारों से सटीं चमचमाती लोहे और लकड़ी की अल्मारियाँ थीं जिनमें किताबें बड़े करीने से लगी हुई थीं। बीच में दो बड़े मेज़ थे जिन पर बहुत सारे अख़बार और पत्रिकाएँ पड़ी थीं। पुस्तकालय क्या होता है, यह हमें पहली बार उसी दिन मालूम हुआ था। उन्होंने कहा, “तुम यहाँ खाली घंटे में बच्चों की हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ सकते हो। यही नहीं, हर छात्र महीने में अपनी पसंद की एक किताब भी इशु करवा सकता है। तुम्हें अपनी स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ अच्छा बाल साहित्य भी पढ़ना चाहिए, पर यह ध्यान रखते हुए कि तुम्हारी स्कूल की पढ़ाई में किसी तरह का विघ्न पड़े।यह हमारे लिए हिंदी टीचर का बहुत बड़ा तोहफ़ा था। हम वहाँ खाली पीरियड में नंदन, चंदामामा, पराग पढ़ा करते। लाइब्रेरियन हमें बच्चों की पुस्तकें भी सुझाता और एक एक पुस्तक हमें पढ़ने के लिए इशु भी करता। मैं तो इन किताबों का दीवाना हो गया था। इनमें एक अलग और अद्भुत दुनिया सिमटी हुई थी। बाल-साहित्य की इन्हीं पुस्तकों ने शायद मेरे भीतर उस समय लेखन के बीज बोये होंगे जो बाद में समय पाकर अंकुरित हुए। ऐसे ही एक अध्यापक जो हमें ग्यारहवीं-बारहवीं में हिन्दी पढ़ाते थे, का मुझे पर बहुत प्रभाव पड़ा। हिन्दी लिखते समय हम बहुत सी गलतियाँ करते थे, वह उन गलतियों को शुद्ध करवाते और शुद्ध शब्दों को बीस-बीस बार कापी पर लिखवाते और स्वयं चैक करते। ये दोनों अध्यापक सदैव मेरे प्रेरणास्रोत रहे हैं। अपनी बात को विनम्रतापूर्वक और धैर्य से कैसे कहा जा सकता है, मैंने इन्हीं से सीखा।

अशोक दर्द  :  लेखन की इस जादुई दुनिया में आपका आगमन कैसे हुआ था? कोई प्रसंग।
सुभाष नीरव  :  मोदी इंटर कालेज में एक बड़ी और स्तरीय लायब्रेरी थी। मैं ट्रेन से अप-डाउन किया करता था। सुबह सवा सात बजे की ट्रेन लेकर मैं मोदीनगर पहुंचता था। मुरादनगर से इस कालेज में आने वाले हम तीन-चार ही छात्र थे। आखिरी क्लास साढ़े बारह बजे छूटती थी और इसी समय वापसी की एक ट्रेन हुआ करती थी। कालेज रेल की पटरी के बिल्कुल बगल में स्थित है और मोदीनगर स्टेशन से कुछ ही दूरी पर है। कभी कभी यह ट्रेन कुछ लेट हो जाती तो हमें मिल जाया करती। प्राय: यह ट्रेन छूट जाया करती और मेरे साथी बस से चले जाते। मैं एक बेहद गरीब घर से था और मेरे पास बस की टिकट के पैसे नहीं होते थे। मुझे मजबूरन चार बजे वाली ट्रेन का इंतज़ार करना पड़ता जो प्राय: लेट ही हुआ करती। ऐसी स्थिति में मैं कालेज की लायब्रेरी में बैठ कर होम वर्क करता या वहाँ रखी साहित्यिक पत्रिकाएं पढ़ा करता। धर्मयुग, कल्पना, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादिम्बनी, रीडर डायजेस्ट, निहारिका, सरिता, मुक्ता आदि पत्रिकाएं वहाँ आती थीं। मेरा मन इन्हें पढ़ने में खूब रमता। सन 1972 में इंटर किया तो पिता ने आगे पढ़ाने से इन्कार कर दिया और मुझसे उम्मीद लगाकर बैठ गए कि मैं कोई नौकरी करके उनका हाथ बटाऊंगा। करीब ढाई साल मैंने भयंकर बेकारी झेली और मानसिक रूप से बहुत परेशान रहा। आत्महत्या तक करने का विचार आया। ईश्वर की कृपा कहो कि मुराद नगर फैक्टरी एस्टेट में नये नये रीक्रेएशन कल्ब में एक छोटा-सा पुस्तकालय खुला और एक मित्र के पिता ने मुझे उसका सदस्य बनवा दिया। एक सरदार जी जो कविता भी लिखा करते थे और मुरादनगर फैक्टरी की ओर से हर वर्ष आयोजित किए जाने वाले अखिल भारतीय कवि सम्मेलन मेंसरस्वती वंदनाकरके कवि सम्मेलन का शुभारंभ किया करते थे, उस छोटे से पुस्तकालय के इंचार्ज थे। मैं बेरोजगार था, पिता फैक्टरी में लेबर और परिवार बड़ा। किताब तो क्या अखबार तक खरीद कर पढ़ने की औकात नहीं थी। ऐसे में यह पुस्तकालय मेरे लिए वरदान साबित हुआ। इन्हीं दिनों मैं छोटी-मोटी तुकबंदी करने लगा था और रोमांटिक-सी कहानियाँ लिखने लगा था। इस तरह आप कह सकते हैं कि मैं लेखन की ओर उन्मुख हुआ।

अशोक दर्द  : आपकी पहली रचना कब छपी और उस रचना के छपने की खुशी आपने सबसे पहले किससे साझा की?
सुभाष नीरव : माँ मुझे पिता से छिपाकर कुछ पैसे हर महीने देती थी। उन पैसों से मैं नौकरी के लिए आवेदन पत्र भेजा करता और साथ ही, अपनी अधकचरी कविताओं-कहानियों को सरिता’, मुक्ता’ और अखबारों में भेजने लग पड़ा था, वापसी के टिकट लगे लिफाफे के साथ। रचनाएं लौट आतीं- संपादक का अभिवादन और खेद सहितकी स्लिप के साथ। माँ अनपढ़ थी, डाक में जब कोई चिट्ठी उसके सामने आती तो वह यही समझती कि वह मेरी नौकरी से संबंधित ही कोई चिट्ठी होगी। और एक दिन मुक्ता’ से मेरी एक कविता का स्वीकृति पत्र मिला। मेरे पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। मैं इस खुशी को घर में साझा नहीं कर सकता था। दो चार मित्र थे, उन्हें बताया तो उन्हें कोई खुशी हुई। मैंने वह चिट्ठी जाने कितनी बार पढ़ी होगी। एक अजीब-सा आत्मविश्वास भी जागा। जल्द ही दिल्ली प्रेस से मेरे नाम 60 रुपये का मनीआर्डर भी गया और दो अंक छोड़कर ‘मुक्ता’ में वह कविता रंगीन पृष्ठ पर किसी सुन्दर-सी युवती की तस्वीर के संग छप गई। वह अंक लेने के लिए मुझे मुराद नगर से गाजियाबाद रेलवे स्टेशन जाना पड़ा। अपनी कविता को इतने सुन्दर ढंग से छपा देखर मैं खुशी में जैसे पागल हो उठा था। पर मेरी इस खुशी को साझा करने वाला कोई नहीं था।

अशोक दर्द : क्या वह रचना आपको अब तक याद है ? उसे पाठकों से साझा करना चाहेंगे?
सुभाष नीरव  :  नहीं, अब याद नहीं है। मुक्ता, सरिता में बहुत सारी कविताएं बाद में निरंतर छपीं, कई बरस उन्हें संभाल कर भी रखा, फिर बाद में जब मेरी सोच में परिवर्तन हुआ और मैंने कुछ जिम्मेदाराना लेखन की ओर अपने आप को मोड़ा तो उन सारी बचकानी और रोमानी-सी रचनाओं को नष्ट कर दिया। शायद उस कविता की पहली पंक्तियाँ इस प्रकार की थीं
      दीये की लौसा खुद को जलाना, बड़ा तकलीफ़देह होता है
      मरमर कर जीना, हँसना-हँसाना, बड़ा तकलीफ़देह होता है।
     
अशोक दर्द : सर मैंने पढ़ा था कहीं कि आपकी सारी पत्र-पत्रिकाएँ रद्दी वाले को दे दी गई थीं। वह क्या प्रसंग था?
सुभाष नीरव  :  नहीं, यह प्रसंग कुछ और है। जून 1976 में दिल्ली स्थित भारत सरकार के एक मंत्रालय में मेरी नौकरी लग गई थी। नौकरी के लिए मैं ट्रेन से आया-जाया करता था। संडे के दिन दरियागंज में फुटपाथ पर किताबों का एक बड़ा बाज़ार लगता था, जहाँ मैं प्राय: हर दूसरे-तीसरे रविवार को झोला लटकाकर जाया करता। मैंने वहाँ से भारतीय और विदेशी साहित्य की बहुत-सी बेहतरीन किताबें खरीदी थीं। बहुत-सी किताबें मैंने पुस्तक मेलों से खरीदी थीं। पिता को उन दिनों दो कमरे का सरकारी मकान मिला था और एक कमरे में इन किताबों का ढेर बढ़ने लगा था। अब मैं अखबार वाले से साहित्यिक पत्रिकाएं जैसे धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका आदि भी लेने लगा था। इन्हीं दिनों मेरे लिए शादी के रिश्ते आने लगे थे। और आखिर 6 दिसंबर 1982 को मेरी शादी हो गई। घर में जगह बनाने के लिए मेरी सारी किताबों को गत्ते के डिब्बों में भरकर टांट पर रखवा दिया गया। करीब पाँच-छह सौ किताबें और पत्रिकाएं होंगी। सन 1983 में एक दिन जब मैं शाम को घर पहुंचा तो घर के पिछवाड़ें में वे सारी किताबें धूं धूं कर जल रही थीं। पत्नी ने बताया कि इनमें बहुत मोटी दीमक लग गई थी जो नीचे टपकने लगी थी। घर के सोफ़े, कुर्सियों को खतरा हो गया था इसलिए मैंने इन्हें टांट पर से उतरवाकर आग लगवा दी। मेरी आँखों से अविरल आँसू बहने लगे थे। मैं आग के पास बैठ कर जलती किताबों के ढेर में से कुछ किताबों को बचाने की कोशिश करने लगा जिससे मेरी अंगुलियों की पोरें जल गईं। मेरी बहुत बड़ी पूंजी मेरी आँखों के सामने स्वाहा हो रही थी और मैं कुछ नहीं कर पा रहा था। कई दिन तक मैं अवसाद की-सी स्थिति में रहा। खाने को मन करता था, पीने को। किसी से बात करने को। मेरी यह हालत और किताबों के प्रति मेरी यह दीवानगी देखकर पत्नी हत्प्रभ रह गई थी।
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अशोक दर्द  : साहित्यिक यात्रा के विभिन्न पड़ावों को आप किस तरह देखते हैं ?
सुभाष नीरव  : साहित्य यात्रा और इसके विभिन्न पड़ाव बहुत उतार-चढ़ाव के रहे। निराशाओं से भरे भी और उत्साह तथा प्रफुल्लता से ओतप्रोत भी। दोनों स्थितियों में मैंने संयम और विवेक का संतुलन बनाये रखने की कोशिश की और नये पड़ावों की ओर सकारात्मक दृष्टि रखने का प्रयास किया।

अशोक दर्द : इस तिलिस्मी यात्रा की यादगार यादें जो आप पाठको से साझा करना चाहें ?
सुभाष नीरव  : बहुत हैं, पर यहाँ सभी को साझा कर पाना कठिन है।

अशोक दर्द : आप ने अब तक किस किस विधा में कितना लिखा है और आपके लेखन का मुख्य स्वर क्या है, पाठकों को सविस्तार बतायें।
सुभाष नीरव : मेरी मुख्य विधा तो कथा साहित्य ही रही है यानी कहानी और लघुकथा। यूं मैंने कविता और बाल साहित्य में भी काम किया है। इन दिनों उपन्यास विधा की ओर भी मुड़ा हूँ। मेरा पूरा लेखन मनुष्यता और मनुष्य के अंदर की संवेदना को बचाने की जद्दोजहद पर आधारित है। अपने मौलिक लेखन के समानांतर में पिछले चालीस सालों से अनुवाद विधा से भी जुड़ा रहा हूँ। मैंने पंजाबी से हिन्दी में अब तक करीब 600 कहानियों, 200 के करीब लघुकथाओं तथा 200 के आसपास कविताओं का भी अनुवाद किया है। अब तक अनुवाद की 40 से ऊपर किताबें छप चुकी हैं। यह अनुवाद कार्य अपने मौलिक लेखन के साथ साथ आज भी जारी है।

अशोक दर्द  : समकालीन साहित्यिक मित्रों की सूची कितनी लंबी है ? विशेष रूप से आप किस किस को उद्धृत करना चाहेंगे।
सुभाष नीरव  :       बहुत लंबी है। सबका उल्लेख कर पाना यहाँ संभव नहीं है। हाँ कुछ नाम मैं ले सकता हूँ –डॉ रूपसिंह चंदेल, डॉ राजेन्द्र गौतम, अलका सिन्हा, बलराम अग्रवाल, पंजाबी साहित्यकार बलबीर माधोपुरी, नछत्तर और जिन्दर।

अशोक दर्द : उनके लेखन ने आपको कितना प्रभावित किया ?
सुभाष नीरव  : जी उपर्युक्त गिनाये साहित्यिक मित्रो का साहित्यिक लेखन मुझे प्रभावित करता रहा है। आज भी करता है। डॉ. राजेन्द्र गौतम के नवगीत तो मुझे उस समय प्रभावित करते रहे जब मैं लेखन के क्षेत्र में अभी पांव रख ही रहा था, यानी नौसिखिया था। आज भी उनके गीत, उनके सृजन से मैं बहुत प्रभावित होता हूँ, बहुत कुछ सीखने को मिलता है। डॉ. रूप सिंह चंदेल जिनकी साहित्यिक यात्रा मेरे साथ साथ आरंभ हुई थी, अपने उपन्यासों और संस्मरणों से, अलका सिन्हा अपनी कविताओं और कहानियों से, बलराम अग्रवाल अपने समूचे लघुकथा लेखन से, बलबीर माधोपुरी अपनी दलित चेतना से सम्बद्ध कविताओं और आत्मकथा ‘छांग्या रुक्ख’ से, नछत्तर अपनी कहानियों-उपन्यासों से तथा जिन्दर अपनी कहानियों से मुझे हमेशा प्रभावित करते रहे हैं, ईर्ष्या की हद तक। यह ईर्ष्या मेरे अंदर सकारात्मक रूप में पैदा होती रही है जो मेरे अपने लेखन को मज़बूत करती रही है।

अशोक दर्द  : कितना रचा, कितना छूटा, कोई लेखा-जोखा ?
सुभाष नीरव  : सच माने में, रचा तो अभी कुछ भी नहीं है। बहुत कुछ है जो मुझे लिखना है, पर लिख नहीं पा रहा।

अशोक दर्द  : अपने बरसों के इस लेखन से कितना संतुष्ट हैं ?
सुभाष नीरव : जो थोड़ा बहुत लिख सका हूँ, उससे बहुत हद तक संतुष्ट हूँ। शत-प्रतिशत संतुष्टि तो कभी भी किसी को नहीं होती। यह जो थोड़ी बहुत असंतुष्टि है, वही लेखन को और ज्यादा संवारने और उसकी निरंतरता को बनाये रखने में सहायक होती रही है।

अशोक दर्द  : साहित्य में स्थापित होने का कोई गुरु-मंत्र? जो नवोदितों को देना चाहें।
सुभाष नीरव  : अपने अग्रजों, वरिष्ठों, समकालीनों और नवोदितों को खूब खूब पढ़ना। जहाँ कहीं से भी सीखने को, अपने को सुधारने को मिले, उसे पल्लू से बाँध लेना। साथ ही ईमानदारी, संयम और लगन का साथ न छोड़ना और आलोचना से कभी न घबराना ! मेरे तो यही मूल मंत्र रहे हैं जिन्हें आप गुरू मंत्र कह सकते हैं। मुझे लगता है कि साहित्य में स्थापित होने की चिंता लेखक को नहीं करनी चाहिए। यदि उसके लेखन में दम होगा और नई बात होगी तो अपने आप वह पाठकों के हृदय में अपना स्थायी स्थान बना लेगा।

अशोक दर्द  : अंतिम प्रश्न। साहित्य में आप सम्मान को किस तरह से देखते हैं, विस्तार से बताएंगे।
सुभाष नीरव : सम्मान–पुरस्कार लेखक को और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करते हैं। लेखन के प्रति आस्था और विश्वास को और अधिक सुदृढ़ करते हैं। इन पर लेखक को अभिमान नहीं करना चाहिए। लेखकों को सम्मानों-पुरस्कारों के पीछे नहीं दौड़ना चाहिए। होना तो यह चाहिए कि सम्मान-पुरस्कार आपके पीछे दौड़ें। परंतु आजकल हो उलटा रहा है। लेखक लिखते कम हैं और सम्मानों-पुरस्कारों के लिए जोड़-तोड़ ज्यादा करते हैं, यानी उनकी दौड़ यहीं तक होती है। सम्मानों की भूख उन्हें श्रेष्ठ लेखन से दूर कर देती है, एक दिन ऐसा आता है कि वह लेखन से ही दूर हो जाते हैं और ताउम्र सम्मानों –पुरस्कारों के झुनझुने ही बजाते रह जाते हैं।
-----                                             अशोक ‘दर्द’
                                                प्रवास कुटीर बनीखेत चम्बा (हि.प्र.)