चकमक से भी दीया जलाया जा सकता है।
अश्कों से भी दर्द सुनाया जा सकता
है।।
दौलत नहीं जरूरी प्रेम जताने को ।
शब्दों से भी ताज बनाया जा सकता है ।।
जिस्म नहीं जरूरी प्यार निभाने को ।
रूह से भी तो प्यार निभाया जा सकता है
।।
उम्र नहीं है बचपन की तो कोई बात नहीं ।
बच्चों सा तो दिल बहलाया जा सकता है
।।
रीत रहा है जीवन बेशक अंजुरी के पानी
सा।
करके नेकी इसे सजाया जा सकता है।।
बेशक दुनिया में तेरा कोई मीत नहीं ।
मुर्शिद को भी यार बनाया जा सकता है
।।
डर लगता है ...
दिल
की बात बताने से भी डर लगता है |
अब
तो अपनों के घर जाने से भी डर लगता है ||
न
जाने कब कोई शातिर यार के भीतर उग आये |
अब
तो प्रीत निभाने से भी डर लगता है ||
कोई
शिकारी न जाने कहां घात लगाये बैठा हो |
अब
तो पेड़ तले सुस्ताने से भी डर लगता है ||
बहुत
गवाह हैं अब तो यहाँ अंधेरों के |
अब
तो दीप जलाने से भी डर लगता है ||
न
जाने अपनों के भीतर कोई पराया बैठा हो |
अब
तो अपना दर्द सुनाने से भी डर लगता है ||
हर
टहनी पे विष के कांटे हैं उग आये |
अब
तो नीड़ बनाने से भी डर लगता है ||
गिरगिट
की तरह रंग बदलती इस दुनिया में |
अब
तो प्यार निभाने से भी डर लगता है ||
किस
के भीतर कौन छपा है क्या जाने |
अब
तो प्रेम जताने से भी डर लगता है |
रिक्वेस्ट
में दोस्त है या कोई हैकर है |
अब तो कन्फर्म
दबाने से भी डर लगता है ||
जिस दिन बाड़ ,
खेत को खाना छोड़ देगी ,
उस दिन हरेक आंगन मेँ
सोने की चिड़िया चहचहाएगी ।
जिस दिन जनता
अपनी पीठ थोड़ी वक्र कर लेगी,
उस दिन , कोई भी छुटभैया,
उसकी पीठ पर नारे नहीँ लाद पाएगा ।
जिस दिन नदिया जान जाएगी कि
सागर से मिलकर
उसका पानी खारा हो जाएगा,
उस दिन कोई नदिया ,
सागर से मिलने नहीँ जाएगी ।
जिस दिन जनता
मुखौटोँ का सच जान जाएगी,
उस दिन कई बहुरुपियोँ की दुकानेँ
खुद-ब-खुद बंद हो जाएंगी ।।
...
यादों की गठरी ...
यादों
की गठरी खोली तो |
याद
आये कितने ही मंजर ||
बोल
उठे कितने ही लम्हे |
बैठे
थे खामोश जो अंदर ||
लगा
हिलोरें लेने तब फिर
मन
के भीतर एक समन्दर ||
चुभते
हैं वो शूल अभी भी |
जैसे
भीतर पीने खंजर ||
सत्ता
का रोजगार है वरना |
कब
लड़ते हैं मस्जिद मंदिर ||
वतर्मान
की दशा देखकर |
बेबस
हैं बापू के बन्दर ||
पेड़ परिंदे और आदमी
हमने
स्वार्थ की पूर्ती के लिए
पेड़
काट काट कर बस्तियां बसा लीं
और
जमीन पर सडकें बना लीं
बाघ
भालू हिरन चीते छुपें तो कहां छुपें
उनकी
बस्तियां उजाड़ कर
आदमी
अपनी बस्तियां बसाता गया
और
खुद ही नये नये शब्द रच डाले
विकास
तरक्की उन्नति
बेघर
जानवर आश्रय की तलाश में बस्तियों की ओर
मुड़ने
लगे
तेंदुए
बस्तियों में आकर आदमी को धमकाने लगे
बन्दर
खेतों में उद्धम मचाने लगे
बीज
तक खा जाने लगे
इस
अधूरी तरक्की ने न जाने कितने परिंदे
निगल
लिए
कितनी
दुर्लभ प्रजातियाँ विकास की भेंट चढ़ गईं
पेड़
की पीठ पर न जाने
कितनी
ही कविताएँ लिख रहे हैं मुझ जैसे लोग
न
जाने कितनी ही विकास की कहानियां बताकर
आदमी
के स्वार्थ की यह अंधी भूख की कहानियाँ
लिखी
जा रही हैं वर्तमान की पीठ पर
जबकि
समय रह रह कर चेता रहा है कि
डगमगाते
संतुलन को बचा लो भविष्य के लिए
पेड़
लगा कर - परिंदे बचाकर
अंधे
स्वार्थ की कहानियाँ मिटाकर ...||
हारना मत
बेशक नंगे पाँव हैं तुम्हारे
रस्ते में बिछे हैं कांटे और
तुम्हारे जख्म रिसने लगें
कभी भी हारना मत |
चलते रहना मुस्कुराते हुए
दर्द जमाने से छिपाते हुए
विरोधयों को जलते हुए
कभी भी हारना मत |
जले पर नमक छिडकना
किसी की पीड़ा पे हंसना
जमाने की फितरत है
कभी भी हारना मत |
संघर्ष के गीत लिखना
कदमों में उड़ान रखना
हौंसलों में जान रखना
कभी हारना मत |
दामन में बहारें आएँगी
मंजिलें महक जायेंगीं
यह अडिग विशवास रखना
कभी हारना मत ||
चार आंखें
ये आँखें
चार क्या हुई फसाना हो गया ।
प्यार का दुश्मन मेरे जमाना हो गया ।।
प्यार का दुश्मन मेरे जमाना हो गया ।।
महफ़िलों
में उनका जिक्र क्या कर दिया ।
यार भी कहने लगे दीवाना हो गया ।।
यार भी कहने लगे दीवाना हो गया ।।
उनके कदम
जो साथ साथ चलने लगे ।
मंजिलो का सफर फिर सुहाना हो गया ।।
मंजिलो का सफर फिर सुहाना हो गया ।।
मीत बनके
गम जो मेरे साथ था चला ।
उनके मिलते ही यह गम बेगाना हो गया ।।
उनके मिलते ही यह गम बेगाना हो गया ।।
उनका
प्यार क्या मिला बहार आ गई ।
फिर से जैसे जीने का बहाना हो गया ।।
फिर से जैसे जीने का बहाना हो गया ।।
गीत
प्यार का
फिर अमर हो गया ।
कुबान शमां पे जो वो परवाना हो गया ।।
कुबान शमां पे जो वो परवाना हो गया ।।
उनके
प्यार में जो
चार लफ्ज़ लिख दिए ।
दर्द खनकता हुआ तराना हो गया ।।
अशोक दर्द
दर्द खनकता हुआ तराना हो गया ।।
अशोक दर्द
सत्ता के गलियारों में ....
असली
कम और नकली ज्यादा है इनके किरदारों में |
न
मानो तो देख लो तुम भी सत्ता के बाजारों में ||
बेबस
की लाचारी पर भी ये सियासत करते हैं |
लाचारों
की पीड़ा भी है वोटों के हथियारों में ||
सच
को झूठ झूठ को सच ये साबित कर देते हैं |
सजिस्ज
साजिश खेली जाये नित इनके गलियारों में ||
अपने
अपने कुनबे के यहाँ अपने अपने स्वार्थ हैं |
कुर्सी
की यहाँ जंग छिड़ी है सत्ता के सरदारों में ||
हर
किरदार में बदल मुखौटा रूप नया नित धरते हैं |
छुपी
हुई है अम्ली बारिश इनकी प्रेम – फुहारों ||
इनके
पास हुनर बहुत हैं जनता को बहलाने के |
सब्ज
बाग़ की करें खेतियाँ अपने अपने नारों में ||
निर्धन
के संग खाने पीने का ये ढोंग रचाते हैं |
ठाठ
देखना इनके जब ये होते हैं सरकारों में ||
न
जाने कब बदल लें झंडा अंधे हो निज स्वार्थ में |
न
जाने कब बन जाएँ दुश्मन आज खड़े जो यारों में ||
यूं न उम्र गुजारा करना इंतजार में।
हर आशिक को नहीं मिलती है मंजिल प्यार
में ।।
उग आए गर फूल चांदी के सूखे चेहरे पे
।
सोच समझ कर भीगें फिर रिमझिमी फुहार
में।।
दिल का तोहफा सोच समझ कर किसी को देना
तुम ।
चुभन भयंकर होती है बिछुड़न के खार में
।
एहसास की बातों को यूं ही एहसास में रखना तुम ।
कह दोगे तो हो जाओगे बदनाम बेकार में
।।
खिजां का मौसम हंसकर यूं गुजार लिया
करना ।
समय आएगा फूल खिलेंगे फिर बहार में ।।
मन की मुरादें दुनिया से नहीं
पूरी होती हैं ।।
जो कुछ मांगो सब मिलता है उसके दरबार में ।।
कलम के सिपाहियों न तुम हथियारों से
डरना ।
कलम से ज्यादा ताकत नहीं होती हथियार
में।।
बेशक सब कुछ इस दुनिया में मिल भी
जाये तो ।
फिर भी दिल तो रह जाता है बिछुड़े यार
में ।।
सीख लो आशिक हो तो आंखों की भाषा भी
पढ़ना ।
कभी कभी हां होती है प्रिय के इन्कार में ।।
मैं वही दीवार हूं जिससे लिपटकर
तू.कभी रोया था ।
वही तकिया हूं जिसे तूने रात भर
अश्कों से भिगोया था।।
मैं वही पड़ाव हूं मेरे
हमदम मेरे हमराही ।
जहां तू थक कर आया था और नींद भरकर
सोया था ।।
मैं वही किताब हूं ऐ मेरे महबूब शायर
।
जिसे पढ़कर तू भी कभी शायर हो गया था
।।
मैं वही दरिया हूं मेरे हमउम्र हमसफर ।
गवाह जमाना है जहां तू भी कभी नहाया
धोया था ।।
मैं वही फूल हूं खुशबू से महकता हुआ दर्द ए दिल ।
जिसे सूंघकर तू कभी मदहोश हो गया था
।।
सब भूल गया तो भी कोई गम नहीं ए दोस्त ।
मैं वही ख्वाब हूँ जिसमें तू भी कभी
खोया था ।।
तुम न मिलते तो
जब तुम मिले तो
शायद इसे किस्मत ही कह सकते हैं
बरसों बाद जीवन में फिर से बहार का एक
ठंडा झोंका गुजर सा गया ।
मैं फिर उन लम्हों में खो-खो जाता हूं
जिन्हें न जाने वक्त की चादर ने
कितनी ही तहों के भीतर छुपा लिया था।
कुछ सुलगते लम्हे थे
तो कुछ महकते
जैसे ताजा-ताजा फूल खिले हों ।
मैं उस स्कूल के दरवाजे को रोज
उसी तरह झुककर लांघता हूं
जिस तरह रोज तुम्हारे भेजे मैसेज
पढ़ता हूं ।
मेरी बदली की खबर से जब सब
बच्चे रोने लगे थे और फिर
मैं भी रोया था
आज भी उस दृश्य से गुजरता हूं तो
मेरी आंखों से भी टप-टप आंसू
न जाने कैसे बहने लगते हैं ।
एक बार फिर मैं आप सब में खो जाता हूं
तुम्हारे वे सब नन्हे नन्हे चेहरे
मेरी नजरों में आज भी वैसे ही हैं
बेशक आज तुम बड़े हो गए हो मेरी तरह।
आज भी मेरी नजरों में
वे सब बच्चे वे सब घर-गांव
और धारें उसी तरह
पलकों पर ठहरी हुई हैं ।
जैसी मैं उन्हें आखरी बार छोड़कर आया
था
ज्यों की त्यों सारी तस्वीरें
मेरे मानस पटल पर आज भी अंकित हैं।
लिस्ट लंबी है उस पड़ाव पर मिले
खूबसूरत लोगों की खूबसूरत यादों की
जिन्हें मैंने सीने की अलमारियों में
अपनी दौलत की तरह
आज भी संभाल कर रखा हुआ है ।
आज भी कभी-कभी उस दौलत को
मन की दीवारें फांद कर
सीने की अलमारियां खोल कर देख ही लेता
हूं ।
तुम सब खुश रहें यही दुआ है
हम फकीरों का क्या नदिया से बिछुड़े
नीरों का क्या ..।
जब तक धड़कन है दिल में
दुआ है ये प्यार के रास्ते कभी खत्म न
हों
सीने में तुम्हारी मोहब्बत की रोशनी
जलती रहे
ताउम्र...।
तुम न मिलते तो
यह मन कभी बच्चा नहीं हो पाता
तुम मिले तो एक बार फिर उजड़े
हुए चमन में
बहार आ गई और
मन बच्चों का तरह यादों में फिर रो
पड़ा...।।
कुछ तो जबाब दो (कविता)
जब बस्तियों में आग
सुलग रही थी तो तुम
क्या सोच कर प्रेम- कविताएं
लिख रहे थे।
जब हवाएं गर्म लू लेकर
बह रही थीं तो
तुम क्या सोच कर
दुआ दुआ बांच रहे थे ।
क्या तुम्हारे दुआ-दुआ
बांटने से
ये लू भरी हवाएं
एकदम शीतल हो जाएंगी
या सुलगती बस्तियां
तुम्हारी प्रेम-कविताओं से
फिर ठंडी हो जाएगीं ।
तुम्हारे तगमे
लौटा देने से
बच्चों के टूटे खिलौने
फिर वापस मिल जाएंगे ।
तुम वक्त के खिलाफ
साजिश कर रहे हो
या वक्त की साजिश में शामिल हो ।
मेरे प्रिय कवि
कुछ तो जवाब दो
वरना तुम्हारे शब्द
कहीं तुम्हारे खिलाफ ही
गवाही न दे दें ।
और तुम फिर अपने पक्ष में
कोई दलील न दे पाओ
तुम सच में किस ओर खड़े हो
कुछ तो जवाब दो ।।
में रोज डूब जाता हूँ (कविता)
एक अंधेरी सुरंग में तलाशते हुए
कुछ सुनहरे पल
जो अतीत के दरिया में फेंक दिए गए है
इस तरह मानो
कोई अस्थियां गंगा में बहा आया हो
फिर भी न जाने क्यों
एक चाहत सी रहती है जहन में हरदम
जैसे परिंदों को रहती है उड़ान में
घोंसलों की
लहरों को तटों की
कश्तियों को किनारों की
घटाओं को हवाओं की और
सांसों को धड़कन की
और फूलों को तितलियों की
मैं रोज डूबता हूँ रोज उबरता हूँ
एक द्वंद्व की उहापोह के बीच
खुद को तलाशता हुआ
जैसे नदी तलाशती फिरती है
एक अदद सागर को
जबकि मैं भी जानता हूँ कि
कमान से निकले तीर की मानिंद
मेरी खोज का अर्थ कुछ भी नहीं
जानता हूँ यह भी कि
डूबने उबरने और तलाशने का
भी शायद कोई अर्थ न हो ।।
अपनी जड़ों की ओर... (कविता )
लौटना चाहता हूं फिर
अपनी जड़ों की ओर
जैसे परिंदे दूर-दूर उड़ने के बाद
लौट आया करते हैं
अपने घौंसलों में ।
फिर बैठना चाहता हूं
उन पेड़ों की छांव में
जिनकी लहलहाती शाखाओं ने
मुझे धूप का वजूद ही
महसूस नहीं होने दिया ।
दौड़ना चाहता हूं फिर
बच्चों की तरह
उन पगडंडियों पर
जो कदमों की आहट से ही
पहचान लेती थीं ।
गाना चाहता हूं फिर
वही मधुर लोकधुन
जो आपाधापी के चलते
बरसों पहले
होठों से विदा हो चुकी है ।
डूब जाना चाहता हूं फिर
उन उनींदे सपनों मैं
जो जमाने के शोरगुल में
आधे अधूरे ही टूट बिखर गए थे
छन्न करके कांच की तरह ।
पढ़ना चाहता हूं फिर से
वे सारे शब्द इत्मीनान से
जो दौड़ने की जिद्द में
ताक पर ही रखे रह गए थे ।
फिर विचरना चाहता हूं
रंगों की उस दुनिया में
जहां सब रंग मिलकर
एक हो जाया करते थे ।
लौट जाना चाहता हूं फिर
उन झरनों के किनारे
जहां तन का पोर पोर
भीग जाया करता था ।
सब बंधनों से मुक्त हो
लौट जाना चाहता हूं फिर
अपनी जड़ों की ओर.....।।
जिंदगी एक जंग है यारा जीने तक यह
जारी रख ।
हर एक दुख से लड़ने की अपनी सदा
तैयारी रख ।।
नकाबा के भीतर चेहरे पढ़ने गुनने तू
भी सीख ।
खुली नजर से दुनिया देख बेशक सोच
प्यारी रख ।।
स्वार्थ की इस दुनिया में यारा सदा ही
कौन निभाता है ।
उसके हवाले छोड़ दे सब कुछ मन पर दर्द
न भारी रख ।।
मुस्काते चेहरों पर रीझ न जाना यारा
तुझे समझाता हूं ।
संभल संभल कर रहना इनसे बेशक बरसों
यारी रख ।।
तन्हा राही सफर यह तन्हा तन्हा ही आना
और जाना है।
मोहमाया से दूर रहा कर बेशक दिल
संसारी रख ।।
प्यार मोहब्बत के बदले में प्यार मिले
न गर तो सुन ।
अपना फर्ज निभाते रहना और दिल में
वफादारी रख ।।
बेशक बाहर कांटे बहुत हैं फिर भी एक
तू काम यह कर ।
फूल प्यार के रहें महकते भीतर एक
क्यारी रख।।
लड़कियां (कविता)
धान की पनीरी की तरह
पहले बीजी जाती हैं लड़कियां
थोड़ा सा कद बढ़ जाये
थोड़ा सा रंग निखर आये
तो उखाड़ कर दूसरी जगह
रोप दी जाती हैं लड़कियां
कभी खेत बंजर तो कभी उर्वर
आते हैं हिस्से
परन्तु फिर भी जड़ें पकड़ ही लेती हैं
जमीन को अपना लेती हैं खुशी से
पानी भरपूर मिले या फिर उमस भरी धूप
सब सहकर मुस्कुरा लेती हैं
समय के साथ जब
सुनहरी बालियों से लहलहा उठती हैं
तब खुद पे इतरा
उठती हैं
उमस भरी धूप का दर्द भूलकर
फिर फसल देने के बाद
शेष बच जाती हैं
जैसे धान की बालियां उतार लेने के बाद
पराली
जमाना बरसों से इसी तरह
बीज- रोप रहा है धान की बालियां और
लड़कियां देख भोग रही हैं यह लम्बी
यात्रा
बस मूकदर्शक सी बनकर
किसे अपना कहे रोपने वाले को या
फसल लेने वाले को
असमंजस आज भी उतना ही है
जितना कल था ।।
कॉरपोरेट के मजदूर
बड़े
बड़े शहरों की गगनचुंबी अट्टालिकाओं
के भीतर कंम्यूटर की स्क्रीन पर
तेजी से उंगलियां चलाते
ये कारपोरेट के मजदूर ही
तो हैं जो डिग्रियों से लदे होने के बावजूद भी अधभूखे रह जाते हैं ।
इनका दर्द जानते हुए भी
सरकार अनजान बनी रहती है
और कारपोरेट के मालिक भी जैसे
दोनों ने
कोई सांठगांठ कर ली है ।
बेहतर भविष्य के लिए बरसों स्वाह करने
के बाबजूद भी कम वेतन और
अनिश्चितता की तलवार हमेशा उपर लटकती ही
रहती है इनके
न जाने कब मालिक कह दे कि कल मत आना
या फिर मालिक रातों रात अपना कारोबार
बेचकर
चलता बने।
कुछ भी निश्चित नहीं न
जाने कब खाली हाथ
भूखे पेट की व्यथा बन जाएं
शिक्षा के लिए ऋण की मोटी रकम
और परेशान बापू की तस्वीर
रह रहकर उभर आती है मानसपटल पर ।
शहरों की आपाधापी में न जाने
सुखद भविष्य की तस्वीर लिये कितने ही
युवा
भूखे पेट सो जाते हैं यहां
भरपेट खाने से भी डर लगता है इन्हें
कहीं वेतन से ज्यादा ही न खा लें
इसलिए हर रोज थोड़ी भूख छोड़ देनी पड़ती है
इन्हें
कल के लिए ।
परन्तु सरकारी आंकड़ों में न
इनकी भूख
दर्ज है और न इनकी व्यथा
हां रोजगार के आंकड़ों में
मोटे मोटे अक्षरों में छपी सरकारी इबारतें
सरकारी फाइलों और मंचीय भाषणों की शोभा
जरूर बढ़ा देती हैं ।
युवाओं के देश में युवाओं की
यह दयनीय दशा जरूर विचलित करती है
भविष्य की खूबसूरत तस्वीर के लिए
खूबसूरत सपनों के लिए युवाओं की यह दशा
जरूर खलल डालती है और
व्यथित करती है ....... ।।
नई खबर फिर कोई गांव से लाई
जाए।
कहानी प्यार की शहर को सुनाई
जाए ।।
अब भी यहां मुहब्बतों के बाग़
बाकी है ।
यह सच्चाई जमाने को बताई जाए ।
सुविधाओं को भेज दो गांव में
सत्ता वालो ।
आबरू इस गरीब की बचाई जाए ।।
गांव की मिट्टी मेंअब भी प्यार
उगता है ।
खबर जमाने को यह सुनाई जाए ।।
ये जो आंकड़ों की खेती करते हैं
शहर में ।
हकीकत गरीबी की उनको दिखाई जाए
।।
सब नदियां अब शहर की ओर बहने
लगी हैं।
कोई नदी शहर से गांव की ओर बहाई
जाए।।
कितना ये जमाना बदल गया आजकल ।
दोस्ती का पैमाना बदल गया आजकल
।।
फोन पे निभा लेते हैं सब
रिश्तेदारियां।
न मिलने का बहाना बदल गया आजकल
।।
उलझन भरे दौर का नमूना तो देखिए
।
यारों का भी याराना बदल गया
आजकल।।
हर ओर देखिए भूख सर उठाये है
खड़ी ।
कल का मौसम सुहाना बदल गया आजकल
।
नए दौर का मिज़ाज तो देखिए साहब
।
लैला संग मजनूं दीवाना बदल
गयाआजकल
आंखों में आंसुओं का उमड़ता
सैलाब ले चले ।
यादों का सीने में छुपाकर आफताब
ले चले
गुजारे
हसीन पल जिंदगी का सरमाया है मेरी
बांध कर संग अपने ये पल हम जनाब
ले चल।
पढ़ते रहेंगे हम जिंदगी के इस
हसीन सफर में
संगअपनेजो तुम्हारी यादों की
किताब ले चले
उम्र भर संभाल कर रखेगें दिल की
तिजोरी में
हम इस महफ़िल से जो रंग और शबाब
ले चले
दाने पानी का खेल है या किरदार की जरूरत
कुछ सुलगते सवाल और कुछ जबाब ले चले
महका करेगी मेरी हर बज़्म इसकी
खुशबू से ।
तुम्हारी यादों का संग अपने जो
गुलाब ले चले
हम बच्चों के बस्तों में ढूंढते
रहेंगे पूरा होने तक
कुछ आधे अधूरे जो संग अपने ख्वाब ले चले
नज्में
लिखना गाया करना
तल
तक कविवर जाया करना ढूंढ के मोती लाया करना |
नज्में
लिखना गाया करना जग को सच समझाया करना ||
इतिहास
की निर्मम भूलों पर विकृतियों के तीक्ष्ण शूलों पर |
हिलती
समय की चूलों पर लू झुलसाए फूलों पर ||
कविवर
आँखें मूँद न लेना अपनी दृष्टि दौड़ाया करना | नज्में ...||
दंगों
और फसादों पर पसर रहे अवसादों पर |
सियासत
के झूठे वादों पर मुंसिफ और प्यादों पर ||
सब
कुछ लिखना देखा भोगा अपना फ़र्ज निफाया करना |नज्में ..||
अनसुलझे
संवादों पर सत्ता के लगे स्वादों पर |
वादों
और विवादों पर रूढ़िवादी लबादों पर ||
गूढ़
विवेचन करना प्यारे अपनी कलम चलाया करना | नज्में ...||
भटकाते
अंधेरों पर मलिन स्वार्थ के ढेरों पर |
मृगतृष्णा
के फेरों पर ऊबे हुए सवेरों पर ||
कैसे
पार पाओगे प्यारे अपनी राय बताया करना | नज्में ...||
दुराचारों
व्यभिचारों पर राह भटकाते नारों पर |
जात
धर्म के खारों पर सिसक रहे उजियारों पर ||
कोई
जागे या न जागे तुम आवाज लगाया करना | नज्में ...||
आस्तीं
के साँपों पर सत्ता के माई बापों पर |
कण
कण व्याप्त पापों पर जग के सकल संतापों पर ||
नई
जमीनें तोड़ा करना शब्द – सुमन उगाया करना | नज्में ...||
लुटे
हुए जज्बातों पर अपनों के भीतरघातों पर |
अंधियारी
काली रातों पर तेजाबी बरसातों पर ||
घबराकर
तुम भाग न जाना कोई हल सुझाया करना | नज्में ...||
किसने
– किसने चांदी कूटा कितना पाया कितना छूटा |
वेश
बदलकर किसने लूटा कितना जोड़ा कितना टूटा ||
तेरे
जिम्में है ये सब कविवर सारा गणित लगाया करना | नज्में ...||
समय
से मुठभेड़
तुम
चाहते हो कि हरेक आंगन तक
गुनगुनी
धूप पहुंचे ताकि
कोई
ठिठुरती सर्दी में न कंपकंपाये
तुम
चाहते हो कि हरेक दर्पण बिना धूल के हो
ताकि
पारदर्शिता में कोई बाधा न आये
तुम
चाहते हो कि हरेक शाख पे मौसम बराबर
बना
रहे ताकिवसंत में भी कोई शाख पतझड़ में डूब
मातम
न मनाये
तुम
चाहते हो कि हरेक नदी में पानी अठखेलियाँ
करता
रहे ताकि मछलियाँ कभी बेमौत न मरें
तुम
चाहते हो कि हरेक बाजार में जिन्दगी का सामान बिके
ताकि
हरेक घर में होली दीवाली रहे
तुम
चाहते हो कि सारे पेड़ फलों फूलों से लदे रहें
ताकि
यह उपवन सदा महका महका रहे
तुम
चाहते हो कि हरेक बदल बरस बरस कर मुड़े
ताकि
कोई पपीहा प्यासा न रहे
तुम
चाहते हो कि हरेक दीवार पे चस्पा इश्तिहार
रौशनी
से सराबोर हो ताकि कहीं भी
अंधेरों
का साम्राज्य न पनप पाए
परन्तु
मेरे प्रिय कवि
तुम्हारे
चाहने भर से शायद कुछ न हो पायेगा
क्योंकि
बहुत से गिद्ध रक्त मांस की पिपासा लिए
तुम्हारी
चाहतों के खिलाफ इक्कठे हो गये हैं
तुम
अकेले किस किस से भिड़ोगे
यह
सोचकर कभी हार मत जाना युद्ध से भाग मत जाना
तुम्हारे
पास हथियार है कलम
उठाओ
कलम और मुठभेड़ करो समय से
आखिरी
सांस तक लड़ो गिद्धों से जीत हार तो बाद की बात है
संभव
है तुम्हारी चाहतें एक दिन पूरी हो जाएं ||
किरदार
में यह अदाकारी रख
किरदार
में यह अदाकारी रख |
भद्र
जनों से यारी रख ||
दुःख
सारे खुद मिट जायेंगे |
बच्चों
सी किलकारी रख ||
बेशक
भूखे रह लेना पर |
कर्जा
न सरकारी रख ||
बची
रहेगी खुद्दारी प्यारे |
खुद
से दूर उधारी रख ||
घर
को ठीक चलाना है तो |
घरवाली
प्रभारी रख ||
उसकी
याद भुलाना मत |
बेशक
दिल संसारी रख ||
पल
पल साथ निभाएंगे वो |
दुआओं
में गिरधारी रख ||
रोज
सुनाएँ झूठे किस्से |
ऐसे
न दरबारी रख ||
छूना
है गर अम्बर तो फिर |
हिम्मत भरी उडारी रख ||
कुछ
पाना कुछ खोना जीवन |
अपना
दिल जुआरी रख ||
भूला
नहीं वो ....
भूला
नहीं वो धूप में झोंका बयार का |
तेरी
हसीं जवानी वो लम्हा प्यार का ||
खिलते
हुए वो फूल ,मंजर वो शोखियाँ |
मुस्कुरा
के हमें देखना हसीं बहार का ||
हरियालियाँ
वो घाटियाँ वो उडती हुई घटा |
आंगन
में मेरे नाचना वो शीतल फुहार का ||
चिड़ियों
का चहचहाना वो आकर मुंडेर पर |
वो
धुप गुनगुनी वो मौसम कवार का ||
इक
पराये गाँव में अपने हुए थे जो |
दिल
आज भी है कायल उनके दीदार का ||
रह
रह के उठती हूक सी पाने को आज भी |
इतना
हसीं था मंजर उस दयार का ||
दिए
लिए खड़ा था जो स्याह रात में |
चूका
न पाया कर्ज कभी उसके उधार का ||
करवटें
बदलते हुए जीवन निकल गया |
सिलवटों
में रह गया दर्द यार का ||
अब तक भूल नहीं पाया मैं होंठ गुलाबी
काला तिल ।
अब भी उनमें खो जाता है यह मेरा मतवाला
दिल ।।
मिल जाती जो तिल भर छांव अगर तुम्हारी
जुल्फों की ।
मुरझाया हुआ फूल इश्क़ का बंजर में भी जाता
खिल ।।
तुम सपनों में आ जाते तो हम भी ताज बना
लेते ।
बिछुड़न की इस तड़पन को फिर एक आसरा जाता
मिल।।
बशर जो हरदम यादों में रहता है एक अधूरे
सपने सा ।
दिल के छालों को गम अब भी रह रह कर है
जाता छिल ।।
यादों में है प्यार मुकम्मल पर जीवन में साथ
नहीं ।
दुनिया की महफिल में मेरे वही होंठ है
जाता सिल ।।
हुस्न ओ इश्क के चले थे किस्से बेशक बात
पुरानी है ।
दीवाना परवाना बनकर शमां पे था मंडराता
दिल ।।
नहीं बदलते हैं सारे ही ख्वाब हकीकत
में ।
वही होते हैं पूरे जो होते हैं किस्मत
में ।।
रंग लहू और पानी का होता है जुदा जुदा
।
अपनों को कभी भूल न जाना यारा शोहरत
में।।
इक दिन धोखा खा ही जाते हैं वो दुनिया
में ।
चालाकी होती है यारों जिनकी फितरत में
।।
इतिहास रहेगा सदियों तक उसका ही
दुनिया में ।
नेकनामियां रखेगा जो अपनी अस्मत में
।।
ईमान सम्मान न खोना तुम कभी झंझावातों में ।
बेशक जीना पड़ जाए तुम्हें यारा गुरबत
में ।।
बेदाग निकल जाते हैं वो दुनिया के
रास्ते से ।
बशर जो रहते हैं अच्छे यारों की सोहबत
में ।।
धन दौलत से भी प्यारी एक चीज बताता हूं ।
मांग लेना तुम अच्छे दोस्त खुदा से बरकत में ।।
कलम लड़ेगी तलवारों से और झोंपड़
दरबारों से ।
ठहरो , वक्त को आने तो दो फूल लड़ेंगे खारों से ।।
जिस दिन जनता समझ जाएगी इनके हरनारे
कासच
न दौलत न शोहरत हासिल होगी फिर कभी
नारों से ।
खाली हाथ बेकारी वाले अपने रूप में आ
गए तो ।
दुम दबाकर भागेंगे ये सत्ता के गलियारों
से।
जिस दिन भूखे पेटों ने भी जो कर दी
हड़तालें तो ।
ये उतर के सड़क पे आ जाएंगे महंगी
महंगी कारों से ।
जन सेवा का नाटक करके लूट रहे जो जनता
को।
इक दिन खुद घिर जाएंगे छल के इन किरदारों
से ।।
शेरों की तासीर है इसकी जनता है यह जनता है
।
भेड़ बनाकर मत हांकवाना यूं अपने
हरकारों से ।।
सोच रहे ये हक है अपना निर्धन
फिरें उठाये जो ।
इक दिन धोखा खा बैठेंगे सच मे इन्ही कहारों
से ।।
सत्ता पाकर निर्धन का हक खाया तो फिर
रखना याद ।
रोज रोज फिर नहीं लदेंगे यूं फूलों के
हारो से ।।
एक वतन में इंडिया भारत नहीं चलेगा
नहीं चलेगा ।
दर्द ये वंचित हो जाएंगे सदा के लिए नज़ारों
से ।।
नैसर्गिकता बची रहे .....
स्वार्थ लोलुपता और भौतिकता की
अंधी दौड़ ने बिछा दी है
अपनी चादर इस तरह कि
नैसर्गिक पहाड़ों की हरियाती घासनियों
और कल कल बहते नदियों के हलक
खुद सूखने लगे हैं ।
यह मंजर देख कर कहीं रेत के ढेरों तो
कहीं सीवरेज मैं तब्दील होते
ये दरिया देख
लगता है अपने अस्तित्व के
अंतिम चरण की ओर बढ़ने लगे हैं ।
जंगल जंगल दहकती दावानल
कितने ही जीवों का अस्तित्व मिटाकर
कई अनसुलझे प्रश्न अपने पीछे
राख के ढेरों पर छोड़ती जा रही है ।
धुएं के गुब्बारों में
आदमी का दम घुटने लगा है
आदमी फिर भी देखो
बेखौफ अपने स्वार्थ की पूर्ति में
नैसर्गिकता को मिटाने पर
तुला हुआ है।
अपनी सारी खामियां
सत्ता पर फेंक
चौराहे पर खाली बाल्टियां
बजा बजा कर तमाशा कर रहा है।
सूखे हुए जल स्रोत
जले हुए जंगल
आदमी की स्वार्थ लोलुपता के
जीवंत दस्तावेज हैं।
येआज आदमी को चेताने लगे हैं कि
अपना स्वार्थ थोड़ा काम कर ले
ताकि तुम्हारा अस्तित्व भी बचा रहे
और धरती की नैसर्गिकता भी.....।।
सुन मौला
खुश हो बाग बगीचे माली सुन मौला ।
महकी महकी हो हर डाली सुन मौला ।।
उड़ते हुए परिंदे अम्बर में विचरें ।
आंगन आंगन हो खुशहाली सुन मौला ।।
कभी सियासत कर न पाए विष की खेती ।
कर ना पाए गोदें खाली सुन मौला ।।
भरपेट मिले सबको रोटी इस दुनिया में ।
खाली मिले न कोई थाली सुन मौला ।।
कोई खंजर लहू को कभी न छू पाए ।
होंठों से कभी मिटे न लाली सुन मौला ।।
नफरत के इस दौर में किससे
क्या मांगें ।
इस दुनिया की कर रखवाली सुन मौला ।।
उसने जब छुआ मोहब्बत की नजर मुझको ।
रही न फिर जमाने की कोई खबर मुझको ।।
हुआ असर मोहब्बत का इस
तरह यारो।
धूप में भी छांव भरा लगने लगा सफर मुझको
।।
वही बन बैठा बधिक ऊंची उड़ान का मेरी ।
जिसने दिए थे कभी खूबसूरत पर मुझको ।।
कभी चलता नहीं रहता यह सफर लिखने का ।
यूं ही चाहता रहता वो अगर उम्रभर मुझको
।।
बीच राह के छोड़ गया वो यार प्यारा भी ।
कभी लगता था जो दुनिया में अमर मुझको
।।
सारे
किस्से अब पुराने हो गये |
बुलबुलों
के अब जमाने हो गये ||
उल्लू
मिलकर खा गये हरियालियाँ |
खुश्क
मौसम के बहाने हो गये ||
वोट
को है सारी जनता देश की |
सियासतों
को कुछ घराने हो गये ||
मूक
सारे तर्क उनके हो गये |
भाषणों
के जो दीवाने हो गये ||
रेत
बजरी पेड़ पत्थर स्मग्लरी |
पैसों
के यूं कारखने हो गये ||
स्वार्थ
की अंधी नदी में डूब कर |
प्यार
के सब गुम तराने हो गये ||
खेत
को ही खा रहे है बाड़ जो |
उनके
पहरों में खजाने हो गये ||
नईं नस्लों के लिए
नईं नस्लों के लिए
मक्की की रोटी व
सरसों के साग का स्वाद
बचाए रखना
मधुर लोकगीतों की
स्वरलहरियां
जीवन की पगडंडियों पर
गुनगुनाते रहना
ताकि नई नस्लों के लिए
इनका बजूद बचा रहे
जातरों-नुआलों के नाच
घुंघरूओं की तरह
अपने पावों से बांधे रखना
ताकि पहाड़ की थिरकन
मैदानों के आगोश में दफन न
हो जाए
बांसुरी की स्वरलहरियां
घाटियों के सुपुर्द कर देना
और उन्हें संभालकर रखने के लिए
कह देना
बबरू-चबरू-मंडे-पुटन्डे जैसे पकवानों को
बर्गर-मोमो न निगल जाएं
उनकी सुगंध की पोटली संभाले रखना
स्वर्णिम संस्कृति की हरीतिमा
अपने स्नेह से सींचते रहना
ताकि खुश्क मौसमों की मार से
इसका अस्तित्व मुरझा न पाए
नत्थ-लौंग-बेसर
आभूषणों की चमक बचाए रखना
चोला-डेरा, दोहडू-चोलू की गरिमा
नईं नस्लों को विरासत में दे देना
देव आस्थाएं और विश्वास
जीवन को सम्बल देने के लिए जरुरी हैं
इन्हें संभाले रखना
पहाड़ की सुगन्ध अनमोल थाती है हमारी
इसे एक सीने से दूसरे सीने में
स्थानान्तरित करते रहना
ताकि पहाड़ नई नस्लों के लिए अजनबी न हो जाएं ||
नीचता की हदें लांघ रहे हैं जो
पशुता को भी लांघकर निकल गये हैं आगे उनकी
नीचता को
कभी भी सम्बोधनों में नहीं बाँधा जा सकता
शब्द बौने हो जाते हैं |
गलियों के आवारा कुत्ते भी तो
अपने मोहल्ले के लोगों की गंध पहचानते हैं
वे भी यूं ही उन्हें काटने के लिए नहीं दौड़
पड़ते
यह क्या विडम्बना है मनुष्य , मनुष्यता की गंध
नहीं
पहचान पा रहा है |
आज कितने ही दरिन्दे मनुष्यता के आंगन में
कैक्टस की तरह उग आये हैं
जो मनुष्यता के आंगन को लहूलुहान करने पे उतारू
हैं |
आज समय की मांग है कि
इन कंटीले कैक्टसों से आंगन बचाया जाये
ताकि यह दुनिया जीने के काबिल बनी रहे
आओ मिलजुल कर कैक्टस उखाड़ें और फूलों की
खेतियाँ करें ||
परिवर्तन
शहरों की आपाधापी और स्वार्थीपने को
गाँव से शहर गये युवा जैसे जैसे
पीठ पर ढोकर गाँव ला रहे हैं
गाँव की नैसर्गिक सौम्यता और मासूम सुगंध
खुद ब खुद ठीक उसी तरह विदा हो रही है
जैसे तेज धूप में कपड़ों से रंग |
शहर की तरह गाड़ियों और कंक्रीट के ढेर
लगने के बाद स्थिति यह है कि
सौहार्द और भाईचारा कुछ कंक्रीट में दब गया है
तो
कुछ गाड़ियों के धुंए में उड़ने लगा है |
छलछलाते पनघट नलों पर आश्रित हो गये हैं
अब पनिहारिनें वहां बतियाने नहीं जातीं
कच्ची
दीवारों पर आई दरारों को पहले
लीप-पोतकर मिटा दिया जाता था
अब जैसे जैसे दीवारें पक्की होती गई हैं वैसे
वैसे
दरारें भी बड़ी होने लगी हैं |
मेरे गाँव को यह कैसा खुमार चढ़ने लगा है
अपनों से नहीं , आभासी दुनिया से प्यार बढ़ने
लगा है
यह कैसे परिवर्तन का डंका बजने लगा है
अब मेरा गाँव भी शहर बनने लगा है ||
नेकियाँ दिलमें काम भले जिनके |
जमाना संग संग चले उनके ||
जिनका कोई भी दोष नहीं था |
बस्तियों में घर जले उनके ||
झुक कर जो जो चले जग में |
हार फूलों के गले पड़े उनके ||
रुतबे थे बड़े जमाने में जिनके |
खोट्टे सिक्के भी चले उनके ||
सियासत थी हाथ जिनके |
सूखे बाग़ भी फूले फले उनके ||
जो चले थे जग में रौशनी लेकर |
दर्द अँधेरा रहा तले उनके ||
आंसूओं को न तुम यूं बहाया करो |
मुस्कुराया करो मुस्कुराया करो ||
जिनसे तुमको मुहब्बत है दर्दे दिल |
बेसबब न उन्हें आजमाया करो ||
पाना चाहो अगर रिश्तों में पुख्तगी |
आया जाया करो आया जाया करो ||
अपने हाथों से जिनको बनाया कभी |
ऐसे महलों को खुद ही न ढाया करो ||
मीठी बातों से जो भी रिझाएँ तुम्हें |
बातें दिल की न उनको सुनाया करो ||
अपनी लौ से है जिनको जलाया कभी |
ऐसे दीयों को खुद न बुझाया करो ||
कुछ न कुछ तो रही होंगी मजबूरियां |
इल्जाम ए वफा न लगाया करो ||
चिड़िया का धर्म
चिड़िया का दायित्व ही नहीं
धर्म होता है
तिनका – तिनका जोड़कर
नीड़ का निर्माण करना
नवसृजन के लिए
अंडे सेतना चूजे निकलना
चोंच भर दाना – पानी जुटाना
फिर बड़े होते चूजों को
धीरे – धीरे उड़ना सिखाना
उड़ना सीख जाने के बाद
खुले आकाश में उन्मुक्त हो
उड़ने के लिए छोड़ देना
और खुद निर्मोही हो उन्हें
उड़ते हुए नवसृजन करते हुए
देखना
यही चिड़िया का धर्म है ||
गीत मुहब्बत के
गीत मोहब्बत के ग़मों में गाना तुम |
दर्द छुपकर महफ़िल में मुस्काना तुम |
दुनिया कैसे उंगली पे नचाती है |
अपने दिल के राज जरा बतलाना तुम ||
यह मत सोच कि सुनकर दुनिया रो देगी |
यारों से भी दिल के राज छुपाना तुम ||
आ बैठेंगे दिल की शाखों पे बिछुड़े |
मीठी यादों का दाना उनको पाना तुम ||
होकर दिल बेकाबू गजलें कह देगा |
थोड़ा-थोड़ा दिल को बस उकसाना तुम ||
पर्वत झुक कर कदमों पे आ जायेंगे |
हिम्मत से बस थोड़े कदम उठाना तुम ||
बंजर में भी सोना बस उग आएगा |
कोई दरिया खेतों तक पहुँचाना तुम ||
प्यार मोहब्बत रिश्ते आज बिकाऊ हैं |
सोच –समझ कर दिल को जरा लगाना तुम ||
मन का सारा अँधियारा मिट जायेगा |
रहबर के चरणों में शीश नवाना तुम ||
दौड़े आयेंगे वो खुद लाज बचाने को |
दिल की गहराईयों से उन्हें बुलाना तुम ||
भूला नहीं वो ....
भूला
नहीं वो धूप में झोंका बयार का |
तेरी
हसीं जवानी वो लम्हा प्यार का ||
खिलते
हुए वो फूल ,मंजर वो शोखियाँ |
मुस्कुरा
के हमें देखना हसीं बहार का ||
हरियालियाँ
वो घाटियाँ वो उडती हुई घटा |
आंगन
में मेरे नाचना वो शीतल फुहार का ||
चिड़ियों
का चहचहाना वो आकर मुंडेर पर |
वो
धुप गुनगुनी वो मौसम कवार का ||
इक
पराये गाँव में अपने हुए थे जो |
दिल
आज भी है कायल उनके दीदार का ||
रह
रह के उठती हूक सी पाने को आज भी |
इतना
हसीं था मंजर उस दयार का ||
दिए
लिए खड़ा था जो स्याह रात में |
चूका
न पाया कर्ज कभी उसके उधार का ||
करवटें
बदलते हुए जीवन निकल गया |
सिलवटों
में रह गया दर्द यार का ||
जीवन के गीत सुनो
फूलों को छूकर देखो
पंखुड़ियों को सहलाओ
हरी पत्तियों को जी भरकर चूमो
सुगंध को दामन में भरकर
खुशियों के गीत गुनगुनाओ |
झरनों के पानी में
जीवन के गीत सुनो
उड़ते जलधरों संग
नवसृजन के सपने बुनो
खेतों की हरियालियों में डूबकर
नवपल्लवों में मुस्कुराओ |
नीले अम्बर की थाली को
जी भरकर निहारो
सितारों की टोलियों को प्रेम से पुकारो
चांदनी की धवल चादर पे
कुछ क्षण लेटो – सुस्ताओ |
बहारों के रंग बदन पे ओढ़ लो
भंवरों संग बतियाओ
इश्किया खबरें सुनाओ
हवा की शीतलता को मुट्ठियों में भरकर
जुगनुओं संग टिमटिमाओ |
जीवन की सब विभीषिकाओं को
किनारे रखकर
चंद लम्हों में जिन्दगी की सारी
खूबसूरती को
अंजुरी में भरकर पी जाओ
और जी जाओ ....||
चिन्तन का विषय
कई लाईलाज कंटीली झाड़ियाँ
उग आई हैं
मेरे खूबसूरत आंगन की बगिया में
और असमय ही निगलने पर
उतारू है
मेरी बगिया की खूबसूरती को |
पीले पत्ते और
मुरझाये फूल ब्यान कर रहे हैं
बगिया की पीड़ा को |
ये देख मैं मैं भीतर ही भीतर व्यथित
हुआ जा रहा हूँ
सोचता हूँ कुछ तो इलाज होगा इन कंटीली
झाड़ियों का
पीले होते पत्तों व मुरझाते फूलों को बचाने का
ताकि मेरी बगिया की
खूबसूरती बची रहे |
तुम्हें भी समय मिले तो जरूर सोचना दोस्त
मेरी इस बगिया को बचाने के लिए ||
याद आता है ...
जिसे मैं भूल बैठा
था वो मंजर याद आता है |
मेरे कातिल तेरे
हाथों का खंजर याद आता है ||
करते थे यहां हम तुम इबादत प्यार की हमदम |
वो पनघट याद आता है
वो मन्दिर याद आता है ||
तेरी इक याद का
जादू मेरे सिर चढ़ के बोला था |
उठा था फिर जो शहर में तेरे बवंडर याद आता है ||
न पानी था न गहराई
मगर फिर भी मेरे हमदम |
डुबाई थी मेरी
कश्ती समन्दर याद आता है ||
मेरी ऊँगली पकड़कर
जो मुझे था राह में लाया |
कठिन
राहों में अब भी वो कलंदर याद आटा है ||
तेरी चाहत में जब
भी मैं गहरे डूब जाऊं तो |
खाली हाथ जाता वो
सिकन्दर याद आता है ||
मेरा मकसद मेरी कविता
मेरे
शब्दों को तुम कोई अगर न अर्थ दे पाओ |
मेरे
यारो मेरे शब्दों को तुम वापिस लौटा देना ||
मैं
लिखता हूँ किसी मकसद को लेकर रोज ही कविता |
मेरा
मकसद मेरी कविता जमाने को सुना देना ||
कई
नज्में लिखी हैं प्यार की उनको सुनाने को |
अगर
मैं न सुना पाया तो उनको यह बता देना ||
मेरे
बच्चों से यह थाती नहीं गर सम्भल पाई तो |
मेरे
लफ्जों को तुम अपनी किताबों में सजा लेना ||
मुहब्बत
की स्याही से तर कर लिखे हैं ख़त जो मैंने |
अगर
वो पढ़ न पाए तो दरिया में बहा देना ||
परिंदों
चोंच में भर कर मेरे लफ्जों के बीजों को |
खाली
देखकर धरती वहीं पे जा गिरा देना ||
चिनी
हैं हकीमों ने जो दीवारें धर्म - जाति की
|
मेरे लफ्जों की ताकत से दीवारें वो गिरा देना
||
खूबसूरत कविताएँ
कुछ
कविताएँ
बड़ी
खूबसूरत होती हैं
जिनमें
दुनिया के तमाम प्रपंचों के लिए
जगह
नहीं होती
वे
जल्दी ही दिलों की गहराइयों में
उतर
जाती हैं
जैसे
बच्चों की खूबसूरत मीठी तोतली बातें
जिनकी
पहुँच में व्याकरण नहीं होता
जिनकी
भाषा में कोई छद्म नहीं होता
अन्तस्
निर्मलता से परिपूर्ण
एक
अन्तस् से दूसरे अन्तस् तक की
यात्रा
में
कोई अवरोध नहीं होता
सचमुच
अमूल्य होती हैं ऐसी कविताएँ
निश्चय
ही ये कविताएँ भी
खूबसूरत
बच्चों की तरह
सहेजी
जानी चाहिए
इस
खूबसूरत दुनिया की
खूबसूरती
बचाने के लिए ...||
याद रख
दिल की बस्तियां कहां बसी फिर उजड़कर |
पेड़ हरे नहीं होते एकबार जड़ों से उखड़ कर ||
बेशक कोई अमीरी में रहे जाकर परदेस में |
कसक मातृभूमि की खींचती रहेगी पकड़कर ||
प्यार से हर बात का हल निकल आएगा |
मसले हल नहीं होते कभी लड़ झगड़ कर ||
बिछुड़ना पड़ेगा एकदिन अपनों से तय है |
कौन रख पाया ये मुहब्बतें सीने में जकड़कर ||
विज्ञान की बुलंदियों पे पहुंच जा मगर याद रख |
पुरखे आग जलाते रहे हैं कभी पत्थर रगड़ कर ||
सियासत की चालाकी है ये मजहब के झगड़े |
दर्द ईश्वर खुश नहीं होता है कभी लड़ झगड़ कर ||
मुझे
मिले जग में अधूरे कुछ यार मेरे |
जैसे
गजल को तरसते अशआर मेरे ||
गुजार
दी उम्र सारी परदेस में लेकिन |
फिर
भी निगाह में रहे घरबार मेरे ||
मुफलिसी
ने साथ कुछ इस तरह दिया |
सिर
पे खड़ा रहा सदा उधार मेरे ||
पहले
तोड़ दिए सारे पंख मेरे |
फिर
हिस्से में डाल दी उडार मेरे ||
गैरों
ने अपनों की तरह पनाह दी मगर |
काम
आया न कभी परिवार मेरे ||
फूलों
की खेतियों का जब प्रण लिया |
साथ
में खड़ा दिखा तब करतार मेरे ||
अनुबंध
फूलों के किये थे जिसने |
वही
फिर दामन में डाल गया खार मेरे ||
अब
हर कदम सोच कर रखता हूँ |
बच्चे
हो गये हैं समझदार मेरे ||
वक्त
ने उसके हक में गवाही क्या दी |
वो
भूल गया दर्द सब उपकार मेरे ||
बस्ती से कहीं दूर चला जा ...
यहाँ
न तिनके जोड़ परिंदे अपना नीड़ बनाने को |
तेरे
श्रम से क्या लेना है इस बेदर्द जमाने को ||
पत्थर
जैसी दुनिया है यह पत्थर जैसे लोगों की |
इनके
आगे रोना मत तू अपना दर्द सुनाने को ||
बगुलों
कि भरमार बहुत है हंसों कि इस टोली में |
देख
कहीं न मछली बनना इनकी भूख मिटने को ||
बेबस
लाचारों की खुशियाँ इनको कहां सुहाती हैं |
इन्हें
चाहिए बेबस पीड़ा हंसने और हंसाने को ||
बेबस
पंछी सच कहता हूँ इन्हें बहाने मत देना |
इन्हें
चाहिए एक बहाना तेरा नीड़ जलाने को ||
बस्ती
से कहीं दूर चला जा जंगल के किसी कोने में |
नीड़
बना ले रम जा फिर से दुनिया नई बनाने को ||
दर्द
बंजारा सच कहता है .....
जेब
में जैसे बम रखते हैं |
ऐसे
दोस्त हम रखते हैं ||
न
जाने कब फट जाएं ये |
फिर
भी यारो डीएम रखते हैं ||
शहर
की सोहबत ऐसी है कि |
जेब
में पैसे कम रखते हैं ||
यार
हमारे काम आयेंगे |
ऐसी
आशा कम रखते हैं ||
खुद
को सरल बताने वाले |
दिल
में पेचो खम रखते हैं ||
कितने
धोखे खाए जग से |
फिर
भी पास न गम रखते हैं |
मुर्दा
बस्ती में रहकर भी |
अपनी
आँखें नम रखते हैं ||
उन्हें
उजाले देना ईश्वर |
मेरे
राह जो तम रखते हैं ||
खूबी
है या कोई कमी है |
दिल
में कभी न मम रखते हैं ||
दर्द
बंजारा सच कहता है |
फिर
भी लोग भ्रम रखते हैं ||
मौसम
की पहली बारिश में
आओ
झूमें नाचें गायें मौसम की पहली बारिश में |
अलसाए
सब स्वप्न जगाएं मौसम की पहली बारिश में ||
सूखे
का इक मौसम गुजरा न जाने किस तड़पन में |
तन
की मन की प्यास मिटायें मौसम की पहली बारिश में ||
उमड़
घुमड़ कर मेघा गायें बारिश के मधुर तरानों को |
नर्तनरत
घनघोर घटाएं मौसम की पहली बारिश में ||
विरही
मन को प्रीत के ताप ने कितना ही झुलसाया है |
मन
का सारा ताप मिटायें मौसम की पहली बारिश में ||
रिमझिम
रिमझिम बूंदों का स्वर इक संगीत जगाता है |
आओ
मन के साज बजाएं मौसम की पहली बारिश में ||
बादल
ने आ धरती के संग जैसे प्रीत निभाई है |
हम
भी ऐसे प्रीत निभाएं मौसम की पहली बारिश में ||
रूठे
हैं जो टूटे हैं प्रिये प्रीत की पावन
माला से |
फिर
से उनको मीत बनाएं मौसम की पहली बारिश में ||
सृष्टि
सारी सृजन में रत् है नव सृजन की बेला में |
सृजन-सरिता
में चलो नहायें मौसम की पहली बारिश में ||
व्यथा का पिटारा ...
जब
भी मेरा गाँव जाना
होता
है तो
करमु
मेरा बचपन का सखा
खोल
देता है अपनी व्यथा का पिटारा
बोलता
है ....
दोस्त
जमाना बड़ा खराब आ गया है
परिवार
बिखर गया है
सभी
इधर उधर जा बसे हैं
अब
गाँव की तरफ देखते नहीं
मजदूरी
से पेट नहीं पलता
खेतों
में फसल का होना न होना बराबर है
महंगाई
जान निकालने लगी है
घासनियां
उदास उदास हो गई हैं
पनिहार
सूखने लगे हैं
दीवारें
और छतें साथ साथ होते हुए भी
अजनबियों
सी होने लगी हैं
जब
पूछता हूँ उसके बच्चों के बारे
तो
बोलता है –
इस
मंहगे युग में
एक
मजदूर के बच्चे कितना पढ़ सकते हैं
बिना
फीस के कौन पढ़ाता है
घरवाली
बीमार रहती है
मेरी
मजदूरी तो उसकी दवाइयों में खर्च हो जाती है
मैं
चुपचाप उसकी बातें सुनता हूँ
उसकी
व्यथा के पिटारे में न जाने
कितना
कुछ अभी भी बाकि है
मैं
भी चाहता हूँ
अपनी
व्यथा उससे सांझी करूं
मगर
मैं उसकी नजरों में बड़ा बना रहना चाहता हूँ
शहर
का झूठा तिलिस्म कायम रखना चाहता हूँ
और नकाब ओढ़े ही वापिस शहर आ जाता हूँ ....||
लोगों को सलाम
खूबसूरत
फूल उगाने में लगे लोगों को सलाम |
इस
बाग़ को सजाने में लगे लोगों को सलाम ||
आपाधापी
के इस अंधे युग में स्वार्थ के इस दौर में |
पृथ्वी
ग्रह को बचाने में लगे लोगों को सलाम ||
चिनी
जा रही हैं जो हर ओर घृणा वैर वैमनस्य की दीवारें |
उन
दीवारों को ढाहने में लगे लोगों को सलाम ||
लिख
कर नज्में गीत कथा कहानियाँ प्रेम सौहार्द की |
दुनिया
को खूबसूरत बनाने में लगे लोगों को सलाम ||
सीना
ताने खड़े हैं जो सरहद पे धूप लू बारिश में |
मातृभूमि
की पासबानी में लगे लोगों को सलाम ||
मिटटी
में मिटटी होकर भूख धूप ताप सहकर भी |
अन्न
का कण कण उपजाने में लगे लोगों को सलाम ||
अँधेरा
भगाने में जुटे हैं जो बरसों से इस धरती का |
उन
ज्ञान पुंज जलाने में लगे लोगों को सलाम ||
दुनिया
भर की दुश्वारियां सीने पे झेल झेल कर |
सच
दुनिया तक पहुँचाने में लगे लोगों को सलाम ||
बेहतर
कल की आस लिए जो लगे हैं दिनरात परीक्षणों में |
विज्ञान
को बुलंदियों तक ले जाने में लगे लोगों को सलाम ||
यार मुसाफिरखाने में
ज्यादा
भी क्या दिल को लगाना यार मुसाफिरखाने में |
ज्यादा
भी क्या बोझ जुटाना यार मुसाफिरखाने में ||
सबसे
हंसकर बतिया लेना यार रैन बसेरे में |
किसने
देखा मुड़कर आना यार मुसाफिरखाने में ||
गठरी
अपनी छोटी रखना सफ़र सहज हो जायेगा |
कभी
लोभ से दिल न लगाना यार मुसाफिरखाने में ||
एक
गया तो दूजा आया देखो रैन बसेरे में |
लगा
हुआ है आना जाना यार मुसाफिरखाने में ||
काम
– क्रोध –मद –लोभ – मोह में जब जब मनवा
डोले तो |
इस
दुनिया का सच समझाना यार मुसाफिरखाने में ||
संघर्षों
की आंच में तपकर सोना कुंदन बनता है |
संघर्षों
से न आँख चुराना यार मुसाफिरखाने में ||
कभी
न ढकना खुद को तुम झूठे तुच्छ आवरणों से |
सच
के सब को गीत सुनाना यार मुसाफिरखाने में ||
शब्द
शब्द तुम लौ लौ लिखना जग की रह उजिया जाए |
न
जाने फिर किसने आना यार मुसाफिरखाने में ||
इश्क मुकाम तक पहुंचे तो अच्छा |
बात अंजाम तक पहुंचे तो अच्छा ||
भीड़ शहर की कम हो जाये |
विकास गाँव तक पहुंचे तो अच्छा ||
मजहब रोजगार हुआ जाये सियासत का |
बात खुदा या राम तक पहुंचे तो अच्छा ||
परिंदा कोई न रह जाये बेघर |
नीड़ में शाम तक पहुंचे तो अच्छा ||
लू में चल चल कर थका राही |
ठंडी छाँव तक पहुंचे तो अच्छा ||
न जाने कब जिन्दगी की शाम आ जाये |
जुबान मुर्शिद के नाम तक पहुंचे तो अच्छा ||
इस दुनिया में जीने को
आँख
में थोडा पानी रखना इस दुनिया में जीने को |
मुंह में मीठी बानी रखना इस दुनिया में जीने को
||
दिल में धीरज धर कर रखना जीवन की पगडण्डी पर |
खाबों का रंग धानी रखना इस दुनिया में जीने को
||
कोई तो होना ही चाहिए कुटिया की रखवाली को |
बेशक कुतिया कानी रखना इस दुनिया में जीने को ||
तन्हा तन्हा सफर प्यारे बोझिल बोझिल लगता है |
इक चेहरा नूरानी रखना इस दुनिया में जीने को ||
इक दिन पूरी हो जाएगी सारी चाहत मंजिल की |
मन में अपने ठानी रखना इस दुनिया में जीने को
||
यह जग निष्ठुर पढ़ना चाहे तेरी राम कहानी को |
झूठी सही कहानी रखना इस दुनिया में जीने को ||
जिस के कंधों पे सर रखकर दर्दे दिल को हल्का कर
लें |
इक ऐसा दिलजानी रखना इस दुनिया में जीने को ||
जमाने को बताना मत वजह हसने व रोने की |
अपनी हर हकीकत की अपने पाने व खोने की ||
बेदर्दी है जमाना यह बताना न कभी इसको |
खबर सुबह व शामों की खबर जगने व सोने की ||
ये माला के हों या मन के ये मनके तोड़ना जाने |
कभी ज़हमत उठाये न ये मनकों को पिरोने की ||
अँधेरी रात में तो करते हैं ये सब कम काले
ये |
उजाले में करें पाखंडता खुद के धर्मी होने की
||
हरेक मसले में ये अपने ही हक़ का ध्यान रखते हैं
|
कहाँ सुनते हैं ये बातें किसी के रोने धोने की
||
यहां पापों की खेती हो दिलों में फूलती फलती |
कभी करना न गलती इनके मन में पुण्य बोने की ||
नहीं होते हैं जोहरी जिस नगर में देखना यारो |
वहां कीमत नहीं मिलती किसी को शुद्ध सोने की ||
भोर की आस
अँधेरी रात में भी भोर की आस रखना तुम |
अँधेरा नित नहीं रहता यही विशवास रखना तुम ||
घृणा की तेज आंधी में कभी न राह भटक जाना |
जलाना प्रेम के दीपक मन में उजास रखना तुम ||
मन में हौसले रखना बड़े सपनों को पाने के |
अपनी उड़ान में ऊँचा सदा आकाश रखना तुम ||
अंधेरों में अमूमन लोग राहें भटक जाते हैं |
किसी मुर्शिद के शब्दों का भीतर प्रकाश रखना
तुम ||
संघर्षों ने जमाने को ख़ुशी के गीत बांटे हैं |
गति क़दमों में रखना और सदा विकास रखना तुम ||
नाटक बोझिल न होगा यार तुमको सच सुनाता हूँ |
किरदार में थोड़ा सा ही बेशक परिहास रखना तुम ||
खिजां के मौसमों में भी दर्द कभी उदास न होना |
चाहतों में हमेशा अपनी इक मधुमास रखना तुम ||
कभी एहसास को अपने ....
कभी एहसास को अपने कभी जज्बात को अपने |
लिखा करना मेरे दिल तू कभी ख्यालात को अपने ||
महफ़िल में बेशक रहना मगर खुद से भी मिल लेना |
खुदी से पूछ लेना फिर सभी सवालात को
अपने ||
लेकर स्वेद की बूँदें बनाना पंख सपनों
के |
बदलना गर तू चाहता है कठिन हालात को
अपने ||
अगर मन हार जाये तो समझना जीत मुश्किल
है |
कभी दिल में न देना तुम जगह डर - मात
को अपने ||
बमों के दौर में मुझको लगे ऐसा मेरे
यारो |
कहीं खुद ही न कर दे खत्म मानव ज़ात को
अपने |
गुजरा है उसी का दिन उसी की सांझ
खुशियों में |
किया जिसने नहीं बर्बाद कभी प्रभात को
अपने ||
दुआओं में हमेशा माँगना जग के लिए
खुशियाँ |
सकूं से भरना चाहो तुम अगर दिन - रात को अपने ||
दुनिया के झमेले में ...
जो
फंसे रहे उम्र भर जग के झमेले में |
वो
खाक मजा लेंगे दुनिया के मेले में ||
ख्वाहिशों
की गठरी जिसने भी उठा ली सर पे |
पीसा
जायेगा एक दिन भीड़ के रेले में ||
जिसने
भी सुख बाहर खोजा वो हार गया |
भीतर
खोजा तो जीत गया वो खेले में ||
अगर
सुख शांति चाहिए तो याद रखना |
कभी
खुद से भी मिल लेना अकेले में ||
मिटटी
तो मिटटी है सोना नहीं होगी |
कभी
दिल मत लगाना मिटटी के ढेले में ||
गवा
कर उम्र वो पछतायेगा एक दिन |
मिठास
खोज रहा है जो करेले में ||
जीवन
की नश्वरता याद रखना तुम |
कभी
जुटना मत बैल की तरह जग के ठेले में ||
बेशक
अम्बर पे उड़ लो अपने पर फैलाकर |
जमीन
ही आखिर पनाह देगी गोद में बैठकर ||
मेरे
शहर को जौहरी दे मेरे मौला मेरे मालिक |
कांच
बेचने में लगे हैं कुछ लोग हीरा बताकर ||
जमीन
की महक का गवाह तो फूल होते हैं |
यह
सच नादां लोगों को कौन बताये समझा कर ||
ये
पद ये रुतबे सदा साथ नहीं रहते हैं दोस्तों |
घर
तक मत ले जाना इन्हें कभी सर पे उठाकर ||
जिंदगानी
तौफ़ीक है खुदा की , शुक्रिया कर |
वही
रखेगा तुझे सदा गर्म हवाओं से बचाकर ||
ये
अल्फाज़ ही रहेंगे जिन्दा कद्रदां लोगों में |
दर्द
बाँट लिया कर उनका मीठे बोल सुना कर ||
अग्निगीत
तुम लिखो उनके खिलाफ अग्निगीत
जिन्हें देश को गलियाँ बकने के बदले
जनता की गाढ़ी कमाई की बरियानी
खिलाई जाती है
देश तोड़ने की धमकियां देने के बावजूद भी
कोठी कार और सुरक्षा मुहैया करवाई जाती है
तुम लिखो उनके खिलाफ अग्निगीत
जिनके खुद के बच्चे तो विदेशों में पढ़ते हैं
और दूसरों के मासूम हाथों से किताबें छुड़ा
हथियार पकड़ा रहे हैं
तुम लिखो उनके खिलाफ अग्निगीत
जो मुल्क की उड़ान में बधिकों की भूमिका
निभा रहे हैं
और उगती हुई कोंपलें तोड़ने में लगे हैं
और फैलते हुए परों को मरोड़ने में लगे हैं
तुम लिखो उनके खिलाफ अग्निगीत
जिनकी हवाई यात्राएं आम आदमी की
पीठ पर होती हैं
तुम लिखो उनके खिलाफ अग्निगीत
जो रिश्तों की उर्वरा जमीन को बंजर बनाने पर
तुले हुए हैं
और जलते हुए दीये बुझाने और
फूलों को खंजर बनाने पर तुले हुए हैं
तुम लिखो उनके खिलाफ अग्निगीत
जो प्रेम की अनुपम बगिया उजाड़ कर
नागफनियाँ उगाने में व्यस्त हैं
और सूरज के खिलाफ अंधेरों संग साजिशें रचने के
अभ्यस्त हैं
तुम लिखो उनके खिलाफ अग्निगीत
अपनी कलम की सार्थकता के लिए और
विडम्बनाओं के खात्मे के लिए ......||
बेचारा कमजोर
माला टांग दी गई थी छत पर
‘नुआला’ हो गया था शुरू
‘बन्दे’ गा रहे थे एंचलियां
एक ‘भेड्डू’ ला खड़ा कर दिया था
माला के सामने
पैना दराट लिए एक आदमी तैयार था
उसे काटने के लिए
एक ने पकड़ी थी टांगें भेड्डू की
दराट वाला आदमी इंतज़ार में था
सही स्थिति के
ताकि एक ही वार में कट जाए
भेड्डू का सिर
फिर सही स्थिति आई ...,
खप्प की आवाज हुई
निर्दोष भेड्डू का सिर जमीन पर गिरा
लहू से कमरा लाल हो उठा
यह आवाज बरछियों की तरह
मेरे कानों को चीरती गई
मैं बेचैन हो उठा
सोचा, दुनिया हमेशा कमजोर को दबाती है
तभी तो निर्जीभ-निर्दोष भेड्डू की बलि
दी जाती है
कमजोर को दबाने के लिए
गढे. जाते हैं कई तर्क
दी जाती है परंपराओं की दुहाई
परन्तु बलवान से सब डरते हैं
इसलिए शेर की बलि का रिवाज नहीं है
क्योंकि वह ताकतवर जो है
सदियों से यही हो रहा है
कमजोर को ही बनाया जाता है
‘बलि का भेड्डू’ अथवा बकरा
जब तक कमजोर स्वयं नहीं उठा
चलता रहेगा कमजोर को दबाने का
यह नखरा...||
खण्डहर ने कहा था .....
खण्डहर की बगल से गुजरा तो
खण्डहर ने कहा था ठहर जा
मेरी दास्ताँ सुनता जा
मैं भी कभी तुम्हारी तरह जवान था
शहर का आलिशान मकान था
मेरी दीवारों पर प्यार की इबारतें लिखी होतीं
थीं
मेरे अंदर भी लोग जागते –सोते थे
उठते –बैठते थे ,हंसते –रोते थे
मेरे आँगन में भी रंग –बिरंगे फूल खिलते थे
तितलियाँ और भंवरे मिलते बिछुड़ते थे
मैं मद में अपने रूप –सौंदर्य पर इतराता – इठलाता था
और दीन – हीन जर्जर झोंपडियों का मजाक उड़ाता था
आज मैं खुद दीन – हीन हूँ जर्जर खण्डहर यौवनहीन हूँ
मेरा झूठा दंभ चिंदी – चिंदी होकर बिखर गया है
ढह मेरी अकड़ का शिखर गया है
अब मुझे अपना अतीत याद आता है
और अपनी हालत पे मुझे खुद तरस आता है
इसलिए दोस्त सुन मैं तुझे समझाताहूँ
बात मतलब की बताता हूँ
कभी अपने –रूप यौवन पे मत इतराना – इठलाना
अपने पद – मद में होश मत गंवाना
वरना मेरी तरह पड़ेगा तुझे भी पछताना
क्योंकि........
वक्त बड़ा बलवान होता है
एक दिन वो जरूर खण्डहर होता है
जिस भी महल को खुद पे बड़ा गुमान होता है ||
फेरी वाले की कवितायेँ
बहुत सुंदर कवितायेँ लिखता था फेरीवाला
वह अक्सर रखता था पेन और कापी अपनी गठरी के
भीतर
जिसके ऊपर लिखी होतीं थीं उसकी कवितायेँ
उन पगडंडियों की ,उन रास्तों की
जिन पर वह अक्सर चला करता था उन औरतों की
कवितायेँ
जिन्हें वह अपने कपड़े बेचा करता था
उन दोस्तों की जिनके घर वहरातों को अक्सर रुका करता था
उन बच्चों की जो उसे साईं-साईं कहा करते थे
उसकी कवितायेँ रोजनामचा थीं उसके संघर्ष की
उसकी जिजीविषा की
बटोर लेता था वह अपने वक्त कवि सम्मेलनों में
सारी तालियाँ
इस सबके बावजूद भी नहीं लिखा गया उसका नाम
कविता के इतिहास में क्योंकि ..
नहीं जुड़ा था वह किसी खेमे से नहीं था उसका कोई
गाड-फादर
जो उसका इतिहास लिखते
नहीं लगता था कविता के मठाधीशों को उसका रुतबा
इतिहास लिखने के काबिल
[क्योंकि वह तो फेरी लगाता था ]
नहीं लगते थे उन्हें उसके शब्द कोई खास [रुतबे
के गणित के अनुसार लोग शब्दों का
वजन लगाते हैं ]
नहीं लगती थी उन्हें फेरीवाले की कल्पना और
दृष्टी कालजयी
[फिर क्योंकर लिखा जाता उसका इतिहास ]
इसलिए उसकी जिजीविषा नहीं लिखी गई
उसका कविता –संघर्ष नहीं लिखा गया और उसका इतिहास
भी
और एक दिन वह गुमनाम मर गया [क्योंकि स्वर्ग तो
बड़े लोग सिधारा करते हैं ]
उसकी कविताओं की कापियां गठरी से निकाल न जाने कहाँ फैंक दी गईं रद्दी में
[क्योंकि उसका कोई चेला नहीं था ]
फेरी
वाले की कवितायेँ उसके साथ मर गईं मैं सोचता हूँ .....................
और व्यथित होता हूँ इस तरह न जाने कितने ही
फेरी वाले रोज कवितायेँ लिखते हैं
संघर्ष की –जिजीविषा की और दर्द की पगडंडियों की –रास्तों की ...............
मगर न जाने क्यों ......
उनकी कविताओं में कविता के इतिहास लेखकों को
नहीं दीखता कविता का सौंदर्य –बोधनहीं दीखते कविताई सरोकार इतिहास में दर्ज करने के काबिल
न जाने क्यों ........,
न जाने क्यों ...||
आंखों में आंसुओं का उमड़ता
सैलाब ले चले ।
यादों का सीने में छुपाकर आफताब
ले चले
गुजारे
हसीन पल जिंदगी का सरमाया है मेरी
बांध कर संग अपने ये पल हम जनाब
ले चल।
पढ़ते रहेंगे हम जिंदगी के इस
हसीन सफर में
संगअपनेजो तुम्हारी यादों की
किताब ले चले
उम्र भर संभाल कर रखेगें दिल की
तिजोरी में
हम इस महफ़िल से जो रंग और शबाब
ले चले
दाने पानी का खेल है या किरदार की जरूरत
कुछ सुलगते सवाल और कुछ जबाब ले चले
महका करेगी मेरी हर बज़्म इसकी
खुशबू से ।
तुम्हारी यादों का संग अपने जो
गुलाब ले चले
हम बच्चों के बस्तों में ढूंढते
रहेंगे पूरा होने तक
कुछ आधे अधूरे जो संग अपने ख्वाब ले चले
नई खबर फिर कोई गांव से लाई
जाए।
कहानी प्यार की शहर को सुनाई
जाए ।।
अब भी यहां मुहब्बतों के बाग़
बाकी है ।
यह सच्चाई जमाने को बताई जाए ।
सुविधाओं को भेज दो गांव में
सत्ता वालो ।
आबरू इस गरीब की बचाई जाए ।।
गांव की मिट्टी मेंअब भी प्यार
उगता है ।
खबर जमाने को यह सुनाई जाए ।।
ये जो आंकड़ों की खेती करते हैं
शहर में ।
हकीकत गरीबी की उनको दिखाई जाए
।।
सब नदियां अब शहर की ओर बहने
लगी हैं।
कोई नदी शहर से गांव की ओर बहाई
जाए।।
मेरी उदासी का सबब
मैं रोज देखता हूँ
स्कूल के प्रांगण से नाले के पार
टैंटों के आस – पास खेलते
नंग – धड़ंग मैले – कुचैले बच्चे
और फटी मैली साड़ियों में लिपटी औरतें
आपस में झगड़ती – उलझती गालियाँ बकती
मर्दों को देखता हूँ रोज
नये – नये रूप धरकर कंधे पर बैग लटकाए
कभी ज्योतिषी तो कभी हकीम के रूप में टैंटों से
निकलते
फिर मिलता हूँ बाजार में भी
उन नंग – धड़ंग मैले – कुचैले बच्चों से
जब वे मांग रहे होते हैं भीख
हर रोज किसी नयी तरकीब के साथ
शायद वे जानते हैं धंधे का हुनर
तकनीकी तौर पर
बिडम्बना है यह कि
पेट तक ही सीमित हो गई है उनकी दुनिया
वे नहीं जानते सामने के मेरे स्कूल में
एक बच्चे की कितनी फीस है
वे यह भी नहीं जानते कि
स्विस बैंक में किसके खाते में कितना पैसा है
वे नहीं जानते कि देश को आजाद हुए कितने वर्ष
हो गये हैं
वे सिर्फ जानते हैं पेट को कितनी रोटियां चाहिए
वे जानते हैं तो सिर्फ
अपने धंधे की टेक्नीकल बारीकियां
जिनसे कुछ रोटियां ईजाद हो जाती हैं
मैं रोज उन्हें देखता हूँ और रोज उदास हो जाता
हूँ
स्कूल के पास ,नाले के पार
स्कूल से दूर इन बच्चों को
क्योंकि .........
मैं इन के लिए कुछ नहीं कर पाता हूँ .....||
जेब में जैसे बम रखते हैं ।
ऐसे दोस्त हम रखते हैं ।।
न जाने कब फट जाएंगे ।
फिर भी यारों दम रखते हैं ।।
शहर की सोहबत ऐसी है कि ।
जेब में पैसे कम रखते हैं ।।
यार हमारे काम आएंगे ।
ऐसी आशा कम रखते हैं ।।
वो भी अपने यार हैं यारों ।
जो दिल में पेचो खम रखते हैं ।।
कितने धोखे खाए जग से ।
फिर भी पास न गम रखते हैं ।।
उन्हें उजाले देना ईश्वर ।
मेरे राह जो तम रखते हैं ।।
मुर्दा बस्ती में रहकर भी हम ।
अपनी आंखें नम रखते हैं ।।
दर्द बंजारा सच कहता है ।
फिर भी लोग भरम रखते हैं ।।
शब्दों की भूलभुलैया (कविता )
चेहरों से निकले
शब्दों की भूल भुलैया में
कभी भूल मत जाना
हर एक शब्द का
एक ही अर्थ नहीं होता
खूबसूरत फोटो होठों से
निकले हुए शब्द भी
खूबसूरत होठों की तरह
लालिमा लिए हों जरूरी नहीं
रंगहीन चेहरे के शब्द
हमेशा रंगहीन ही नहीं होते
कई बार आदमी
रंगहीन चेहरे के भरम में
खूबसूरत सतरंगी शब्दों से
वंचित रह जाता है
टेढ़े मेढ़े वक्र चेहरों के
शब्द
हमेशा वक्र नहीं होते
उनकी सपाटता सहजता सरलता
महसूसने के लिए
पारखी होना लाजमी है
वरना सहजता सरलता सपाटता का
वक्र चेहरों के भीतर ही
दम घुट जाता है
शब्दों की भूलभुलैया में
एक बार उलझ गए तो
उम्र भर नेति नेति उच्चारते
रहना पड़ सकता है
आधी अधूरी मंजिलों की सीढ़ियों पर
बढ़ते हुए
लक्ष्य भेदन की चाहत में
मरते हुए सपनों को गोद में रखकर
रोना पड़ सकता है
समय के दुर्दम्य चक्रव्यूह में फंसकर
सब कुछ शब्दों की भूलभुलैया मैं
छोड़कर
खाली हाथ मलते हुए
निरर्थकता को गोद में भरकर
हमेशा के लिए यहां से
विदा होना पड़ सकता है ...।।
कुदरत ने कहा...(कविता)
रात नीले आसमान ने मुस्कुराकर कहा
कितना निर्मल हो गया हूं मैं
आदमी ने मुझे धूल धुएं से
इतना कुरूप कर दिया था कि
मुझसे ही मेरा असली चेहरा
पहचाना नहीं जाता था ।
मेरी गोद में टिमटिमाते सितारे
न जाने कहां खो गए थे
बरसों हो गए थे इन्हें धरती को देखे
हुए
धुंध की बदरंग चादर इन्हें धरती को
देखने ही नहीं देती थी ।
आज बरसों बाद इन्होंने फिर
धरती को निहारा है
और धरती ने मेरे आंचल में सजे संवरे
चांद सितारों को दूर से ही सही
आशीष दी है ।
मेरे विस्तृत आंचल को नीलिमा ओढ़े हुए
यूं लगता है जैसे
कोई नवयौवनाश्रृंगार करके
बालकनी में आ खड़ी हुई हो
अपने आंगन से सारा कूड़ा कचरा
आज बुहारा है
खुद को संवारा है निखारा है ।
चिड़ियों की चुलबुल बरसों से जो
कोलाहल के बीच दब सी गई थी
आज फिर चुलबुल से
टहनियां चहकने लगी है , महकने लगी है ।
फिर कह रही हूं आदमी को
दुनिया को जीत लेने की जिद्द का
परिणाम देखा तुम ने
भस्मासुर ने किस तरह नाच नचाया है ।
त्रासदी की यह तस्वीर सदी की
कितनी भयानक तस्वीर है
कितना बेबस है आदमी आज
कल तक जो बात बात पर
अपने शस्त्रों अस्त्रों को गिना कर
डरावने
सपने दिखाता था
खुद कितना सहमा सहमा सा है।
यह सिर्फ चेतावनी है आदमी सुन तेरे लिए
संभल जाने का एक और अवसर वरना
भस्मासुर पैदा करेगा तो
विनाश करने के लिए वो तेरे ही
पीछे दौड़ेगा
जैसे आज दौड़ रहा है ।।
महफूज रखना मुश्किलों से ए खुदा मेरे
प्यार को ।
मेरी सारी खुशियां तू दे देना मेरे यार
को ।।
उसके दामन में हमेशा फूल ही खिलते
रहें ।।
महकते तू रखना उसके गुलशन ए संसार को ।।
गर दुआओं में असर होता है तो सुन ए खुदा
।
हौसलों के पर सदा देना उसे उडार को ।।
रखना उसको मेरी पलकों पर हमेशा ऐ खुदा ।
विरह मत देना कभी मेरे दिले इकरार को ।।
दुनिया बैठाये लाख पहरे इस मोहब्बत पे
बेशक ।
अपनी निगाह में रखना
मेरे मोहब्बत ओ प्यार को ।।
डगमगाऐ न कभी यह दिल मेरा किसी भरम में
।
पुख्तगी
देना हमेशा तू मेरे एतवार को ।
उसके आंगन के परिंदे चहचहाते रहें सदा ।
मेहर में रखना तू उसके मौसम ए बहार को
।।
शहर की छाया में मिटता गांव.....
(कविता)
शहरों की आपाधापी और स्वार्थीपने को
गांव से शहर गए युवा
जैसे-जैसे पीठ पर ढोकर गांव ला रहे हैं
मासूम गांव की सौम्यता और नैसर्गिकता
खुद-ब-खुद गांव से जैसे विदा हो रही है
शहर की तरह गाड़ियों और कंक्रीट के ढेर
लगने के बाद की स्थिति यह है कि
सौहार्द और भाईचारा अपने हाथों से मुंह
ढक कर
गांव छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं
गांव की लम्बी पगडंडियां यह
बदलाव देखकर चकित सी निहार रही हैं
पुराने दिनों की याद में उदास होकर
अपने बदन से फूलों के जेवर उतार रही हैं
छलछलाते पनघट
सूखने के कगार पर आ पहुंचे हैं
अब पनिहारिने वहां बतियाने नहीं
जाती
अपना सुख दुख एक दूसरे को नहीं सुनातीं
अब तो यहां भी लोग
आभासी दुनिया में प्यार खोजने लगे हैं
और प्यार के रिश्ते जैसे बोझ बनने लगे
हैं
पहले कच्ची दीवारों की दरारें भी नजर
नहीं आती थीं
अब तो पक्की दीवारों के भीतर
भी दरकती दरारें दूर से नजर आने लगी हैं
बदलाव का यह डंका कैसा
बजाने लगा है
गांव भी शहरी दुकानों की तरह
सजने लगा है
शहर की छाया तले
कहीं यह खिलखिलाता गांव ओझल ही न हो जाए
ऐसा लगने लगा है ...।।
हाशिए पर खड़ा आदमी ....( कविता )
हाशिए पर खड़ा आदमी
धूप मे झुलस जाता है मूक होकर
क्योंकि यह सूरज के खिलाफ विद्रोह करना
नहीं जानता
यह हवा के खिलाफ
बगावत नहीं करना चाहता
क्योंकि इसे हवा का न तो रुख भांपना आता
है
और न ही हवा के साथ-साथ चलना
हाशिए पर खड़ा आदमी
इतना भोला है कि
आज भी बरसने और गरजने वाले बादलों में
फर्क नहीं कर पाता और हर बार ठगा जाता
है
यह इतना निहत्था है कि इससे
सभी हथियार छीन लिए गए हैं
ताकि यह कभी सत्ता के खिलाफ
विद्रोह न कर सके
प्रलोभनों की प्रवंचना और यथार्थ की
इबारत के बीच
खिंची महीन रेखा इसे
न तो पढ़नी आती है और न ही बांचनी
इसलिए हर बार इसके हिस्से
भूख लिख दी जाती है
हर चक्रव्यूह इसके आसपास ही रचा जाता है
और हर बार बड़े-बड़े बैनरों नारों के
बीच
इसका ही बध हो जाता है
यह न आंकड़ों का गणित जानता है
न ही भाषणों की प्रवंचना
और हर बार इसी वजह से
नारों की
बयार
में बह जाता है
सदियों से यही सब नियति रही
है
हाशिये पर खड़े आदमी की .....।।
कौन जाने .....(कविता)
यह बस्तियों की
गोद में बैठे दुबके हुए सन्नाटे
कब उठेंगे
कौन जाने ...
दमघोटू हवा के भीतर
कब तक आदमी
यूं ही घुट घुट कर जिएगा
कौन जाने ...
इस भीषण त्रासदी को
लिखने के लिए
कितने हाथ शेष बचेंगे
कौन जाने ...
गंतव्य की ओर
रुकी हुई आदमी की
पद चाप कब फिर से
हरकत में आएगी
कौन जाने....
कौन पड़ेगा नज्में तेरी लिखी हुई मयखाने
पर ।
देखो दुनिया खड़ी हो गई मौत के आज
मुहाने पर ।।
अपनी ही इसको फिक्र नहीं औरों की बात
बेमानी है ।
बार-बार बाहर को दौड़े बशर लाख समझाने
पर ।।
एक भयंकर मंजर जैसे दस्तक देने को आतुर
है ।
और आदमी अड़ा हुआ है खुद ही उसे बुलाने
पर ।।
मानव ने खुद पैदा करके भस्मासुर उकसाया
तो ।
मानव जाति आ गई भस्मासुर के आज निशाने
पर ।।
सावधानी के बूते ही तो दुश्मन यह हराना
है ।
फिर घी के दिए जलाएंगे यह जंग जीत कर
आने पर ।।
शब्दों की शक्ति
खंजर जैसे पीने लफ़्ज न रखना अपने कोष में |
न जाने कब चल जाएँ ये नासमझी व जोश में ||
बरसों के रिश्तों को ये इक पल में काट के रख
देंगे |
और खींच ले जायेंगे बर्बादी के आगोश में ||
शब्दों का तिलिस्म है सारा गीता और कुरआन में |
सूत्रधार थे शब्द यही महाभारत के रणघोष में ||
लेखक के संग पाठक भी तब ही हंसता रोता है |
मीठे लफ़्ज उतारे गर जो कलम से लेखक होश में ||
मीर ओ ग़ालिब बच्चन सबको शब्दों ने बनाया है |
लफ़्ज ही शामिल रहे हैं यारो जयचंदों के दोष में
||
शब्दों की गरिमा व शक्ति जिसने भी पहचानी है |
सावन भादों उसके दामन रहे हैं माघ व पौष में ||
चयन सीख लो शब्दों का उन्नति शिखर पे चढ़ने को |
मौन धार कर पतन से बचना जब आओ आक्रोश में ||
शब्दकोश से अभी हटा दो पीड़ादायक शब्दों को |
फिर देखना डूबा जीवन सुख शांति संतोष में ||
गर शब्दों की महत्ता को तुमने कर स्वीकार लिया
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दुनिया साथ खड़ी पाओगे जीवन के जयघोष में ||
अशोक दर्द