मित्रो नमस्कार ...आप सब के लिए मेरी ये तीन रचनाएँ
माँ
माँ
! तुम्हीं वह मेघ हो,
जो
पथिक को,
जेठ
की उतप्त धूप में,
झुलसने
से बचाने हेतु,
ढक
लेती हो तप्त सूरज,
तुम्हीं
तो भवतारिणी हो,
जो
अपने आँचल की
नाव
में बैठा कर,
लगाती
हो भवपार;
वह
एहसास भी तो,
तुम्हीं
हो,
जो
अवसाद के क्षणों में भी,
देता
है जीने की प्रेरणा ,
माते
! तुम्ही गंगा-यमुना-सरस्वती हो,
जो
करती हो पाप-मुक्त,
तुम्हीं
मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा हो,
जहाँ
विराजमान रहते हैं
ब्रह्माण्ड
के समस्त देवता;
माँ
! तुम्हीं वात्सल्य का लहराता सागर हो,
जिसकी
लहरों में,
स्पन्दन
है जीवन की चेतना का,
तुम्हीं
विशाल धरा हो,
जहाँ
से उत्पन्न होते हैं,
समस्त
प्राणी;
और;
पोषित-पल्लवित होते हैं
तुम्हारे,
वायु-अन्न-जल से;
माँ
! तुम न होती तो यह;
चहुँ
ओर बिखरा सौदंर्य न होता,
ओर
ये,
सूरज-चाँद-सितारे
निहारा
करते शून्य में,
एक
अर्थहीन द्रष्टि से....... ||
अपाहिज
फूल
खिला,
खिलकर
झर गया,
इसका
मतलब यह नहीं,
कि
पौधा मर गया,
पौधे
! तू फूल गिरने पर,
अफसोस
मत कर;
कौन,
किसके साथ,
है
क़यामत तक गया |
सबको;
मिला है, सबको मिलेगा;
इस
जहाँ में मुक्कदर का लिखा,
कहीं
फूल टूटा तो,
कहीं
काँटा निखर गया,
रागिनी
मुक्कदर की,
बजती
रहेगी कयामत तक,
गया
तो नसीब ही,
कयामत
तक गया;
पहलू
में आये सुख-दुःख,
समेट
लो दामन में,
कोई
यह न जान सका है,
कब,
किसका, दामन बिखर गया;
अपाहिज
है जमाना ‘दर्द’
अपाहिज
हैं जमाने वाले
है
कौन अपनी टांगो से,
अपनी
कब्र तक गया....... ||
आदमी
चन्द
सिक्कों के लिए आदमी कितना बेईमान हो गया |
महल
के लिए झोंपड़ी ढाह दी कितना तंगदिल इंसान हो गया ||
लेकर
मजहब का ठेका उठा ली बंदूकें |
कुछ
भटके लोग साथ चले तो खुद भगवान हो गया ||
बमों
के धमाकों से मिट सकता है अस्तित्व |
इस
बात से आदमी कितना अंजान हो गया ||
लाशों
के ढेर देखकर भी रोती नहीं आँखें जिसकी |
दिल
दिमाग का यह पिंजर कितना बेजान हो गया ||
आजाद
होकर उड़ न सकें परिंदों की तरह दर्द |
सरहदें
बांधना ही आदमी का ईमान हो गया ||
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