शब्दों की मार
नगीन के घर गर्मियों में तो मेहमानों का आना-जाना लगा ही रहता है |हर रोज कोई
न कोई मेहमान घर में आ ही जाता है | आज भी उसका दोस्त रोहन अपनी पत्नी व बच्चों के
साथ उसके घर में रुका था | नगीन का स्वभाव ही था आदमी हों या चाहे कुत्ते-बिल्ले
सब के साथ विनम्र रहता, सेवा करता
परिणामस्वरूप उसके बरामदे में शाम के समय कुत्तों का भी जमघट लग जाता |
पांच-सात कुत्ते तो रोज उसके बरामदे या छत पर टहलते-सोते | अंधेरा उतरने लगा था दो
कुत्ते घूम-फिर कर उसके खुले गेट से बरामदे की तरफ बढ़ रहे थे | उसने बरामदे में
बैठे देखा और कुत्तों को सम्बोदित करते हुए बोला- ‘अवा परौह्णयों गेट खुल्ला ई
है’ | अर्थात मेहमानो आ जाओ गेट खुला है | अन्दर बैठे उसके दोस्त ने ये सुना तो
शीशे के बीच से पत्नी को बाहर देखने के लिये कहा | पत्नी ने बाहर देखा-आदमी तो कोई
नज़र नहीं आया. परन्तु दो कुत्ते बरामदे की तरफ बढ़ते दिखे | पत्नी ने बताया-मेहमान
तो कोई नही है , दो कुत्ते बरामदे की तरफ आयें हैं | और बरामदे में टहल रहें हैं | पति-पत्नी ने एक-दूसरे की आँखों में
देखा,पत्नी ने मुंह बिचकाया उन्हें लगा ये शब्द हमारे लिये ही व्यंग्य में कहे गये
हैं | उस रात उन्हें नींद नहीं आई | उन्हें लगा वे सही जगह मेहमान बन कर नहीं आये हैं | उधर शब्दों की
मार से अनजान नगीन इस सब से अनभिज्ञ दोस्त की सेवा में लगा रहा |
अशोक दर्द
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