Monday, January 23, 2017

                            शब्दों की मार
नगीन के घर गर्मियों में तो मेहमानों का आना-जाना लगा ही रहता है |हर रोज कोई न कोई मेहमान घर में आ ही जाता है | आज भी उसका दोस्त रोहन अपनी पत्नी व बच्चों के साथ उसके घर में रुका था | नगीन का स्वभाव ही था आदमी हों या चाहे कुत्ते-बिल्ले सब के साथ विनम्र रहता, सेवा करता  परिणामस्वरूप उसके बरामदे में शाम के समय कुत्तों का भी जमघट लग जाता | पांच-सात कुत्ते तो रोज उसके बरामदे या छत पर टहलते-सोते | अंधेरा उतरने लगा था दो कुत्ते घूम-फिर कर उसके खुले गेट से बरामदे की तरफ बढ़ रहे थे | उसने बरामदे में बैठे देखा और कुत्तों को सम्बोदित करते हुए बोला- अवा परौह्णयों गेट खुल्ला ई है | अर्थात मेहमानो आ जाओ गेट खुला है | अन्दर बैठे उसके दोस्त ने ये सुना तो शीशे के बीच से पत्नी को बाहर देखने के लिये कहा | पत्नी ने बाहर देखा-आदमी तो कोई नज़र नहीं आया. परन्तु दो कुत्ते बरामदे की तरफ बढ़ते दिखे | पत्नी ने बताया-मेहमान तो कोई नही है , दो कुत्ते बरामदे की तरफ आयें हैं | और बरामदे में टहल रहें हैं | पति-पत्नी ने एक-दूसरे की आँखों में देखा,पत्नी ने मुंह बिचकाया उन्हें लगा ये शब्द हमारे लिये ही व्यंग्य में कहे गये हैं | उस रात उन्हें नींद नहीं आई | उन्हें लगा वे सही  जगह मेहमान बन कर नहीं आये हैं | उधर शब्दों की मार से अनजान नगीन इस सब से अनभिज्ञ दोस्त की सेवा में लगा रहा |
                                                      अशोक दर्द





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