Sunday, December 31, 2017

दो कवितायेँ


   

                     परिवर्तन

शहरों की आपाधापी और स्वार्थीपने को
गाँव से शहर गये युवा जैसे जैसे
पीठ पर ढोकर गाँव ला रहे हैं
गाँव की नैसर्गिक सौम्यता और मासूम सुगंध
खुद ब खुद ठीक उसी तरह  विदा हो रही है
जैसे तेज धूप में कपड़ों से रंग |

शहर की तरह गाड़ियों और कंक्रीट के ढेर
लगने के बाद स्थिति यह है कि
सौहार्द और भाईचारा कुछ कंक्रीट में दब गया है तो
कुछ गाड़ियों के धुंए में उड़ने लगा है |

छलछलाते पनघट नलों पर आश्रित हो गये हैं  
अब पनिहारिनें वहां बतियाने नहीं जातीं
कच्ची  दीवारों पर आई दरारों को पहले
लीप-पोतकर मिटा दिया जाता था
अब जैसे जैसे दीवारें पक्की होती गई हैं वैसे वैसे
दरारें भी बड़ी होने लगी हैं  |


मेरे गाँव को यह कैसा खुमार चढ़ने लगा है
अपनों से नहीं , आभासी दुनिया से प्यार बढ़ने लगा है
यह कैसे परिवर्तन का डंका बजने लगा है
अब मेरा गाँव भी शहर बनने लगा है     ||

अशोक दर्द  










            



नेकियाँ दिलमें काम भले जिनके |
जमाना संग संग चले उनके ||

जिनका कोई भी दोष नहीं था |
बस्तियों में घर जले उनके ||

झुक कर जो जो चले जग में |
हार फूलों के गले पड़े उनके ||

रुतबे थे बड़े जमाने में जिनके |
खोट्टे सिक्के भी चले उनके ||

सियासत थी हाथ जिनके |
सूखे बाग़ भी फूले फले उनके ||

जो चले थे जग में रौशनी लेकर |
दर्द अँधेरा रहा तले उनके ||

                              अशोक दर्द 





























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