कलम लड़ेगी तलवारों से...
कलम लड़ेगी तलवारों से और झोंपड़ दरबारों से ।
ठहरो , वक्त को आने तो दो फूल लड़ेंगे खारों से ।।
जिस दिन जनता समझ जाएगी इनके हर नारे का सच ।
फिर न हासिल होगी सत्ता इनको झूठे नारों से ।।
खाली हाथ बेकारी वाले अपने रूप में आ गए तो ।
दुम दबाकर भागेंगे ये सत्ता के गलियारों से।।
जिस दिन भूखे पेटों ने भी जो कर दी हड़तालें तो ।
ये उतर के सड़क पे आ जाएंगे महंगी महंगी कारों से ।।
जन सेवा का नाटक करके लूट रहे जो जनता को।
इक दिन खुद घिर जाएंगे छल के इन किरदारों से ।।
शेरों की तासीर है इसकी जनता है यह जनता है ।
भेड़ बनाकर मत हांकवाना यूं अपने हरकारों से ।।
सोच रहे ये हक है अपना निर्धन फिरें उठाये जो ।
इक दिन धोखा खा बैठेंगे सच मे इन्ही कहारों से ।।
सत्ता पाकर निर्धन का हक खाया तो फिर रखना याद ।
रोज रोज फिर नहीं लदेंगे यूं फूलों के हारो से ।।
एक वतन में इंडिया भारत नहीं चलेगा नहीं चलेगा ।
दर्द ये वंचित हो जाएंगे सदा के लिए नज़ारों से ।।
गीत मुहब्बत के
गीत मोहब्बत के ग़मों में गाना तुम |
दर्द छुपकर महफ़िल में मुस्काना तुम |
दुनिया कैसे उंगली पे नचाती है |
अपने दिल के राज जरा बतलाना तुम ||
यह मत सोच कि सुनकर दुनिया रो देगी |
यारों से भी दिल के राज छुपाना तुम ||
आ बैठेंगे दिल की शाखों पे बिछुड़े |
मीठी यादों का दाना उनको पाना तुम ||
होकर दिल बेकाबू गजलें कह देगा |
थोड़ा-थोड़ा दिल को बस उकसाना तुम ||
पर्वत झुक कर कदमों पे आ जायेंगे |
हिम्मत से बस थोड़े कदम उठाना तुम ||
बंजर में भी सोना बस उग आएगा |
कोई दरिया खेतों तक पहुँचाना तुम ||
प्यार मोहब्बत रिश्ते आज बिकाऊ हैं |
सोच –समझ कर दिल को जरा लगाना तुम ||
मन का सारा अँधियारा मिट जायेगा |
रहबर के चरणों में शीश नवाना तुम ||
दौड़े आयेंगे वो खुद लाज बचाने को |
दिल की गहराईयों से उन्हें बुलाना तुम ||
जीवन उत्सव ...
रोज सुबह सूरज निकलता है
हर शाम ढल जाता है
आज फिर बीते कल में
बदल जाता है ।
इसलिए हर रोज
कुछ हिसाब रखा करो
जिसपे खुशियों के पल
लिख सको
अपने पास ऐसी किताब
रखा करो ।।
झेलते हुए लू-घाम - शीत
अंधेरों उजालों के सीने पर
उकेरते हुए प्रगति - गीत
शिखरों पर चढ़ा करो
नित आगे बढ़ा करो ।
दुर्दम्य आकांक्षाओं का
पीछा छोड़ कर
संतोष के बिखरे टुकड़े जोड़कर
सपने गढ़ा करो
नश्वर इस संसार की
क्षणभंगुरता पढ़ा करो ।
झरते हुए फूल गिरते हुए पत्ते
वसंत के आने की
आहट होते हैं
कभी इन्हें देखकर
शोकगीत मत गाया करो
ऐसे मौसम में
वसंतोत्सव की तैयारी में
जुट जाया करो ।
निराशाओं के गहरे भंवर भी
आशाओं के दीप से
उजियाया करो
गम सारे भुलाकर
हंसा करो मुस्कुराया करो ।
बादलों संग उड़ा करो
हवाओं संग गुनगुनाया करो
एक तरफ फैंक कर सब झमेले
लुत्फ़ मेले का उठाया करो ।
सब यहीं छूट जाएगा
यह सोचकर मन समझाया करो
जीवन एक उत्सव है
इसे उत्सव की तरह मनाया करो ...।।
2
तुम्हारा ख्याल और ये मौसम..
मन के बगीचे में जब जब भी
मैं कविताएं लिखने जाता हूं
सारे मौसम मेरे अगल-बगल
मुझे कविताएं लिखते हुए निहारा करते हैं
तुम्हारा ख्याल आते ही
बसंत फूलों की बारात लेकर आ जाता है
तुम्हारे मिलन के वे लम्हे
ज़हन में खुशबू से भर उठते हैं
मैं खुद को तन मन से महका महका महसूसने लगता हूं
फिर ख्याल आता बसंत चला जाता
उफ्फ गर्मी बदन तपने लगता
धुआं धुआं ख्वाब और मैं तन्हा तन्हा
भीतर ही भीतर जलने लगता
देखते ही देखते बरसात की बूंदे
ज़हन से होती हुईं
आंखों की तहों से बाहर अश्क बनकर
टपकने लगतीं
आंसुओं की नमकीन बरसात में ।
धुआं धुआं ख़्वाबों की चिंगारियां
आंसुओं से लिपटकर
विलीन होने लगतीं
अश्क धुआं और चिंगारियां मेरी कविता को
और धार देने लगते ।
चेहरे पर उभरी रंगत मौसमों की मार से
फीकी होने लगती तो
पतझड़ अपने लाव लश्कर के साथ
बगल में खड़ा मुझे चेताता डराता
खड़ खड़ गिरते हुए पीले पत्ते मुझे बेचैन करते ।
मेरी कविता में से भी वासंती रंग
उड़ने लगता
तुम्हारी याद फिर एक बार
युगों की यात्रा के लिए मुझे
उकसाने लगती ।
फिर पहाड़ों पर बर्फ गिरने लगती
मैं देखता सारे मौसम मेरी कविता को पढ़ते
और मैं बैठा बैठा
खुद बर्फ होने लगता हूं ।
जब भी मैं कविता लिखने
ज़हन के बगीचे में जाता हूं
सारे मौसम मेरे अगल बगल मुझे
कविताएं लिखते हुए निहारा करते हैं ।।
अशोक दर्द गांव घाट डाकघर शेरपर तहसील डलहौजी जिला चंबा हिमाचल प्रदेश
वाह, बहुत सुंदर।
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