महकते शब्दों की
चितेरी --- डॉ. गीता डोगरा
अप्रैल दो हजार सत्रह में जालन्धर से त्रिवेणी साहित्य अकादमी
के दो दिवसीय कार्यक्रम के लिए डलहौज़ी आईं थीं |
डलहौजी के मेहर होटल में रुकीं थीं | मैंने इसी दौरान उनसे
साहित्यिक साक्षात्कार के लिए निवेदन किया तो उन्होंने मेरे निवेदन को स्वीकार
करते हुए जीवन एवं साहित्य के विविध रंगों पर बखूबी बातचीत की | प्रस्तुत हैं कुछ
विशेष अंश :
मैं [अशोक दर्द ] : डॉक्टर साहब अपने जन्म व जन्मस्थान के बारे
में बताएं ?
डा. गीता डोगरा : मेरा जन्म फिरोजपुर में हुआ | पिता पुलिस
अधिकारी थे | माँ साहित्य पढने वाली थीं , कोलकाता में जन्मी पली बढ़ीं | साहित्य व
संगीत उन्हें परिवार से मिला था | परन्तु मेरे दादा के घर पुरुष देश के प्रति
समर्पित थे | जबकि अधिकाँश औरतें घरेलू |
यहाँ तक मुझे याद है मैंने ग्यारह साल की उम्र में होश संभाला
उन दिनों भारत पाक युद्ध चल रहा था | हम उन दिनों फिरोजपुर में थे | रात को
मोहल्ले वाले रोटी इकट्ठी करते और फौजी भाइयों को बार्डर पर भेजते | माँ भी रोज
बीस रोटियाँ फौजियों के लिए भेजती और मैं चुपके से अपने हिस्से की रोटियाँ उनमें
जोड़ देती | तब सोचती देश हमारे लिए जरूरी क्यों है |
माँ मुझे वीरता की कहानियाँ सुनाती तो मैंने खाबों में खुद ही
खुद को राजकुमारी पाया जो लड़ती और हर बार जीतकर घर लौटती | मैं देश प्रेम के
मनघडंत गीत गुनगुनाती |
मैं [ अशोक दर्द ] : आपने लेखन की दुनिया में कब प्रवेश किया ,
कोई किस्सा ?
डा.गीता डोगरा : तेरह साल की उम्र में मैंने बाकायदा लिखना
शुरू किया | तबादलों के मौसम में हम उन दिनों फाजिल्का चले आये थे | होली का दिन
था | गली में हुड़दंग था | तभी मन में कुछ पंक्तियाँ आईं | उन्हें पांच सात बार
दोहराया छोटी सी कविता बनी पर यह एहसास न था कि वह मेरी कविता है | फिर जैसे
सिलसिला शुरू हो गया | कहानी बनी तो मैंने कापी के पन्ने उधेड़े और कहानी लिख दी |
फिर भी इतना डर था कि वो पन्ने मैंने छुपाकर रख दिए | माँ से बहुत डर लगता था |
आठवीं कक्षा तक आते आते मैंने उपन्यास रच डाला |
माँ को स्कूल से शिकायत आई कि मैंने होम वर्क नहीं किया तो माँ
का माथा ठनका और मेरी किताबें कापियां चेक की गईं |फिर क्या था चोरी पकड़ी गई |
उन दिनों गलि मोहल्लों में पुस्तकालय होते थे | लोग साहित्य से
जुड़े थे | शायद तभी समाज की सूरत अच्छी थी | बच्चों के लिए साफ़ सुथरा साहित्य था |
चंदा मामा , नंदन जैसी पत्रिकाएँ हम पढ़ते थे | माँ साहित्य पढ़ती थी तो मैं ही
अक्सर लाइब्रेरी जाती मैं किताब उठाती और पन्ने पलटती | किताब की खुशबु बता देती
कि किताब अच्छी है मैं ले आती माँ हैरान होती मेरे चुनाव पर | हलांकि साहित्य
अच्छा ही होता है |
मैं [अशोक दर्द ] : आप महिला लेखन की चुनौतियों को किस तरह
देखती हैं ?
डा गीता डोगरा : लेखिकाओं की दुनिया को अलग से विचार करने की
जरूरत इसलिए है क्योंकि पुरुष ने उसे हर कदम अपनी दुनिया से अलग होकर सोचा | पुरुष
लेखकों ने पहले नारीवादी और नयी लेखिकाओं के महत्व को पूरी तरह से नहीं जाना | और
न ही उसके महत्व को समझा | यहाँ तक कि स्त्री विमर्श का साहित्य जैसे लेखन के बारे
में एक वरिष्ठ आलोचक का यह कहना कि “ यह कुछ दिनों के लिए है , नया
नया जोश है अधिक दिन नहीं चलेगा | भला
कहां तक तर्कसंगत है | जबकि कृष्णा सोबती छठे
दशक से लिखती आ रही हैं |अभी तक लिख रही हैं | अमृता प्रीतम को यह पुरुष
समाज कहां पचा पाया ?
यही न अमृता जी प्रेम कर बैठी | प्रेम किया तो उनका रचना संसार
कितना अद्भुत है | स्त्री को प्रेम स्वीकार नहीं क्या ?
चुनौतियां – ये चुनौतियां स्त्रियाँ ही क्यों फेस कर रही हैं |
हलांकि अब ऐसा नहीं है फिर भी कई मोर्चों
पर यह सब झेलना ही पड़ता है | साहित्य के माध्यम से स्त्री ने स्त्री जगत को जागरूक
किया है | बेशक यह परम्परा मुंशी प्रेम चंद के समय से है फिर भी औरत ने सामाजिक
धारणाओं को परे धकेलने का साहस किया |
उनमें बाल विवाह , विधवा विवाह को लेकर कहानियां लिखी गईं | पुरुष लेखकों ने
आलोचना की पर वहीँ समाज ने स्वीकृति की मोहर भी लगाई | जब क्रांति की लहर आ जाये
तब अकेला पुरुष लेखक क्या करेगा ? वैसे मेरे ख्याल में चुनौती वाली बात नहीं है |
महिलाएं इतना लिख रही हैं कि ये चुनौतियां पुरुष लेखकों के आगे हैं | मेरे समक्ष
ऐसे लेखक हैं जिन्हें विषय ही नहीं सूझते तो वे बिना स्वस्थ विषय लिए अपने ही
कार्यालय की राजनीति को लपेटते नजर आते हैं | चुनौतियों का बिना मुकाबला किये
स्त्री लेखन आगे आया और ख्याति पाई | हालाँकि पुरुष लेखक भी अच्छा साहित्य समाज को
दे रहे हैं | मेरे ख्याल से स्त्री लेखन व पुरुष लेखन में प्रतिस्पर्धा नहीं होनी
चाहिए |
मैं [ अशोक दर्द ] : आपकी पहली रचना छपने की ख़ुशी कैसी थी ? इस
ख़ुशी को आपने सबसे पहले किसके साथ बांटा था ?
डा गीता डोगरा : मेरी पहली रचना सन उन्नीस सौ पचहतर में पंजाब
केसरी में छपी | जब पढ़ी तो सच में लगा कि मैं कुछ हूँ | मेरी माँ तो मुझसे भी
ज्यादा उत्साहित थी | वे हाल बाजार [अमृतसर ]गईं और सात अखबारें खरीद लाई |
क्योंकि इतने ही मिले | हर दस मिनट बाद मैं अपनी कविता पढ़ लेती | मेरी माँ ही मेरी
प्रेरणा थी | मेरी एक दोस्त थी उषा | उसे स्कूल जाकर अख़बार दिखाई | वह भी खुश थी ,
जितनी मैं | परन्तु बाद में वह बिछुड़ गई | उसके लिए भी
मैंने कविता लिखी - ‘उषा तुम बहुत याद आती हो’ | मेरे काव्य संग्रह में भी दर्ज है
|
मैं [ अशोक दर्द ] : समकालीन लेखकों में आपके प्रिय लेखक ? नयी
पीढ़ी के लेखन से आप कितना संतुष्ट हैं ?
डा गीता डोगरा : लेखक सभी अपनी अपनी जगह अच्छा ही लिखते हैं |
मुझे पुराने लेखकों में रविन्द्र कालिया , मोहन राकेश , कृष्णा सोबती , चित्र
मोदगिल , शरद सिंह , नयों में सुभाष नीरव की कहानियां , सुदर्शन वशिष्ठ , आदि कई
नाम हैं | हरेक के पास अपनी विधा है | सैली बलजीत राष्ट्रीय फलक पर हैं |
सूर्यबाला सुधा अरोड़ा , अमरेन्द्र मिश्र , लखनऊ के राजेन्द्र परदेसी , इतनी
किताबें हैं कि आप तय नहीं कर पाते कि कौन
श्रेष्ठ है ?
मैं [अशोक दर्द ] : आपकी पसंदीदा विधा कौन सी है , अपने रचना
संसार पर भी प्रकाश डालें ?
डा गीता डोगरा : मैंने पहले जो लिखा वह कविता थी | बेशक बाद में
बहुत कहानियाँ लिखीं | रूचि अब भी कविता में है | कितना अद्भुत है न मन की व्यथा
आप कुछ पंक्तियों में कवर कर लेते हैं | कविता एक सहज अनुभूति है | एक तथ्य यह भी
है कि कविता हरेक प्राणी में है बशर्ते कि आपकी दृष्टि कितनी गहरी है , संवेदना
कैसी है | जिसे साहित्य का माहौल मिले , रचनात्मकता के पीछे तो एक दिव्य शक्ति
होती है | जो साहित्य नहीं रचते वे एक अच्छे पाठक तो हो सकते हैं |पर यह कितनों के
हिस्से आता है |
मैं [ अशोक दर्द ] : आपकी कहानियों का मुख्य स्वर क्या है
,आपकी कहानियों के पात्र समाज के किस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं ?
डा गीता डोगरा : मेरी कहानियाँ अपने आस पास की कहानियाँ हैं | लगभग
तीस कहानियां मैंने लिखीं | आतंकवाद के खिलाफ भी , अत्याचार के खिलाफ की भी , और
उस समाज की भी जिसे कोई डर नहीं | वह मनमानियां करता है | स्त्री के साथ भी
,परिवार से भी नहीं जुड़ता | मैंने प्रेम कहानियाँ भी लिखीं जो गीतों भरी कहानियाँ
बनीं आकाशवाणी पर | उनसे भी बेहद प्रसिद्धि मिली | ये कहानियां खबरों , मैगजीनों व
संग्रहों में छपीं |
फिर बोल्ड कहानियों का युग आया तो मेरी भी कलम चली | उनमें एक
सच्चाई है | चूंकि में पत्रकारिता में रही तो वे पात्र मैंने पुलिस फाइलों से
निकाले | पात्र तो हमें आसपास से ही मिलते
हैं घटनाएँ भी ,कुछ कल्पना का पुट भी रहता है |
मैं [अशोक दर्द ] : इस लम्बे साहित्यिक जीवन में कितना रचा
कितना छूट गया ?
डा
गीता डोगरा : साहित्य में मैंने अभी कुछ किया ही कहां है | जो पीछे छूट गया उसका
मलाल रहेगा | माँ जब तक साथ रही तब तक तो ठीक था | शादी के बाद जिस घर आई वहां न
साहित्य था न माहौल |
मैं
एक दिन छपी कहानियां और किताबें , लिखी पांडुलिपियाँ ले ससुराल आ गई | उन्हें लगा
कूड़ा - कबाड़ा सो एक दिन मेरी अनुपस्थिति में वे रद्दी में बेच दीं | न मेरे कमरे
में कोई किताब बची न कोई कागज | मेरे मन पर क्या बीती आप अंदाजा लगा सकते हैं | फिर साहित्य तो न लिख सकी हाँ पत्रकारिता
के क्षेत्र में काम करने के लिये अच्छे
इंटरव्यू व फीचर जमकर लिखे |
साहित्य में अब तक एक उपन्यास , छः काव्य संग्रह
, व बाकि दूसरी पुस्तकें हैं | पर मैं
संतुष्ट नहीं | मेरी आत्मकथा अधूरी है | एक उपन्यास का काम चल रहा है |
मैं
[अशोक दर्द ] : एक लेखिका जब पत्रकारिता में गई तो कैसा रहा ?
डा
गीता डोगरा : सम्पादक बनने का बहुत जनून था | जिस भी अख़बार में जाती संपादक की
कुर्सी को देखते ही दिल में उसे पाने कि चाहत हिलोरे लेने लगती | मेरे दोस्तों ने
कहा रेडियो या टी वी ज्वाइन कर लो | पर मुझे तो संपादक ही बनना था | पत्रकारिता के
क्षेत्र में काम करने के लिए एक विशेष पढ़ाई भी चाहिए सो दिल्ली से पत्रकारिता का
कोर्स किया | पंजाब केसरी में कई साल तक पत्रकार रही | फीचर किये राजनितिक
इंटरव्यू लिए | जो स्टेट लेवल तक राजनितिक गलियारे में चर्चा में रहे | फिर उतम
हिन्दू , वीर प्रताप , में पत्रकार व साहित्य सम्पादक रही लगा बाजी मार ली | फिल्ड
पत्रकारिता में मैं पहली महिला पत्रकार थी | आतंकवाद के दिनों में मैं पंजाब के
राज्य आ गई थी और कालम लिखती थी तैं कि दर्द नी आया | यह उन औरतों से बातचीत थी
जिनके परिवारों को आतंकवादी उनके सामने मार गये थे |
और
वे तैं मेरे सामने बैठतीं तो उनकी आखें क्रन्दन करतीं कुछ के आंसू सूखते न थे | और कई ऑंखें खुश्क हो चुकीं थीं | वह मंजर
मुझे भूलता न था और कई रातें मैं सो नहीं पाती | फिर एक दिन कहानी लिखी कहर | तब
लगा कि कोई ऋण उतार दिया | पत्रकारिता का यह वीभत्स रूप था |
मैं
[ अशोक दर्द ] : एक महिला को गृहस्थी , पत्रकारिता व साहित्य को एक साथ जीने में
कहीं मुश्किलें तो नहीं आईं ? क्या सब कुछ स्मूथ चलता रहा ?
डा
गीता डोगरा : पारिवारिक जिम्मेदारियों की एक लम्बी लिस्ट थी | घर की बड़ी बहू थी
मैं | उम्र छब्बीस साल | ससुर चल बसे | आर्मी आफिसर थे वे | तीन भाई बहन पढ़ रहे थे
| मेरे पति बेहद नम्र व अच्छे इंसान थे | आप
समझ सकते हैं कि हम दोनों ने मिल कर तय
किया कि मिलकर यह जिम्मेदारी पूरी करनी है, की भी | दिक्कत नहीं आई क्योंकि हम में
जबर्दस्त अंडरस्टैंडिंग थी | फिर अपना
परिवार बना | बस हो गई थी पत्रकारिता में रहते | खूब काम किया और नाम भी कमाया |
संतुलन तब बनता है जब पति पत्नी मिलकर चलें | लिखना - पढना अक्सर ऑफिस टेबल पर ही
कर लेती थी | धीरे – धीरे साहित्य लिखना व पढ़ना भी घर पर हुआ | सुबह आज भी जल्दी
उठती हूँ | वही समय मेरा होता है सिर्फ मेरा |
मैं
[ अशोक दर्द ] : आपके शब्दों से अमृता प्रीतम के शब्दों सी खुशबु आती है कहीं उनके
लेखन का प्रभाव है क्या ?
डा
गीता डोगरा : मुझ पे अमृता जी का प्रभाव सचमुच है | बहुत शुरू में उनका उपन्यास
पढ़ा देव | कायल हो गई | फिर जिन दिनों पत्रकारिता करने दिल्ली गई तो मेरे सम्पर्क
में सारिका , पराग के लोग थे | रमेश बत्रा
, महावीर , डा जगदीश ,चंद्रिकेश कादम्बनी से | सभी दोस्त थे | मैंने अमृता जी से
मिलने की इच्छा जाहिर की तो वे सब भड़क उठे | इतना शेष कि वह अच्छी औरत नहीं बिना
शादी इमरोज के साथ रहती है | इन बातों ने
मेरा हौसला और बढ़ा दिया | पर दिल्ली मेरे लिए अंजान था | मैंने अमृतसर से अपने
पत्रकार साथी राकेश भाटिया को बुलाया और अमृता जी को फोन कर समय ले लिया |
अमृता
जी सचमुच खूबसूरती की मिसाल थीं | उसके बाद मुलाकातें बढ़तीं गईं | उनका साहित्य भी
मेरी रगों में रच बस गया | अब अंदाजा लगा लीजिये कि शब्दों में ऐसी उर्जा कहां से
आई |अमृता जी मुझे कच्चे बरगी कुड़ी कहती थीं | जब शादी हुई तो मैंने लगभग तीन साल
बाद फोन किया तो उन्होंने तपाक से कहा – कित्थे मर गई सी | उन लफ्जों में इतना
प्यार था मैं आज तक नहीं भूली हूँ |
मैं
[ अशोक दर्द ] : आतंकवाद के दौर में आपने खूब लिखा , एक पत्रकार के नाते आपकी
लेखनी को रौंदेने का प्रयास तो नहीं हुआ ?
डा
गीता डोगरा : आतंकवाद के दिनों में जैसे कि पहले बताया पंजाब केसरी में कालम लिखती थी | मेरे साथ - साथ घनश्याम पंडित भी लिखते थे | एक हफ्ता उनका
कालम छपता था एक हफ्ता मेरा | कुछ महीने तो ठीक चला पर बाद में आफिस में फोन आने
शुरू हो गये | घनश्याम जी के घर पे रात को पत्थर भी मारे गये | वे बुरी तरह घबरा
गये |क्योंकि उनदिनों पंजाब केसरी के सम्पादक व पत्रकार मारे जा रहे थे | दूसरे
दिन मुझे भी फोन आया कि जान प्यारी है या कि कलम ? बंद कर दे बकवास लिखनी |
उसी रत जब मैं आठ बजे डियूटी खत्म कर घर जा
रही थी तो तीन लोग मेरे पीछे लग गये | कभी दायें बाएं हो जाते तो बस लगता गये |
चौक पे एक दरवाजा खुला देख मैं उस घर के भीतर छुप गई | बीस मिनट बाद बाहर
झांका तो कोई न था | दूसरे दिन विजय चोपड़ा जी को बताया तो वे बोले कालम तो
बंद नहीं होगा हाँ नाम नहीं जाएँगे |
लेकिन
हममें से जो भी कालम लिखता उसे फोन आ जाता | उन लोगों को हमारी शब्दावली कि पहचान
हो गई थी | उन दिनों नवां जमाना के सम्पादक जगजीत सिंह आनंद पंजाब केसरी कार्यालय
आया करते थे ,और मंचों से कहते कि गीता डोगरा तैं की दर्द नी आया ?
मैं
[ अशोक दर्द ] : अखबारी दुनिया में आपने किस किस अख़बार में अपने शब्दों की खुशबु
बिखेरी और वर्तमान में आप समय की पदचाप को किस तरह देखती हैं ?
डा
गीता डोगरा : अखबारी दुनिया तो पहले ही दिन से साथ हो ली थी | जब छपना शुरू हुए तो
सुप्रभात प्रथम फिर वीर प्रताप , पंजाब केसरी , हिंदी, मिलाप दैनिक ट्रिब्यून ,
लोकमत समाचार | दूसरे राज्यों के बहुत से अख़बार साथ जुड़ गये | वह ज़माना सचमुच
सुंदर था | अखबारें एक पाठशाला का काम करती थीं | जो सम्पादक उस जमाने के थे वे
रचना को पढ़ते थे , सुधारते थे , रचना की संवेदनशीलता को समझते थे | सम्पादक आज भी
अच्छे हैं ,सूझवान हैं पर नये लेखक की रचना सुधारने का कष्ट न कर उसे रद्दी की
टोकरी का रास्ता दिखा देते हैं |
मैंने
साहित्य सम्पादक के रूप में कई अख़बारों में काम किया है | पंजाब केसरी में फीचर
राइटर थी | बहुत कुछ सीखा | वीर प्रताप में मुझे साहित्य सम्पादक की पोस्ट मिली तो
सच जाने मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा | हाँ उससे पहले मैं उतम हिन्दू में पार्ट टाइम
साहित्य का एक पन्ना बनाती रही | यह अनुभव भी मेरे काम आया |
तब
वीर प्रताप में वीरेंदर जी थे | उनसे तो मुझे सीख का खजाना मिला | उन दिनों मेरा
कालम जिन्दगी कतरा - कतरा एक फेमस कालम था | वीर प्रताप उनदिनों गिर रहा था और इस
बात से चन्द्र मोहन सम्पादक बेहद परेशान थे | मेरा साहित्य सम्पादक बना रहना
सर्कुलेशन पर निर्भर था और उस कालम ने भरपाई की | बाद में मैं दैनिक जागरण में चली
गई वहां मैं सोलह साल वरिष्ठ सम्पादक रही |
मैं
[अशोक दर्द ] : महिला लेखन में बोल्डनेस की परिभाषा क्या है ?
डा
गीता डोगरा : बोल्ड कहानी नाम चर्चा में आया तो मैंने सोचा इसके लक्षण क्या
हैं ? फिर लगा कि बोल्ड साहित्य पढ़ा जाये
| मेरे साथियों ने बताया कि कृष्णा सोबती का लघु उपन्यास मित्रो मरजानी पढ़ो | तो
समझा कि बेबाक अपनी बात कह देना जिसमें आम प्रयोग किये जाने वाले मर्दाना संवाद भी
हो सकते हैं जिन्हें समाज इजाजत नहीं देता कि ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाये |
मैं
[अशोक दर्द ] : आपकी रचनाएँ विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी लगी हैं , इस उपलब्धि को आप किस तरह देखती हैं ?
डा
गीता डोगरा : जी सचमुच ख़ुशी होती है जब स्टूडेंट आकर उत्साहित होकर मिलते हैं तो
एक तसल्ली होती है कि लिखना सार्थक हुआ | वह ख़ुशी सबसे बड़ी उपलब्धि है | मेरी
पुस्तकों पर चार एम् फिल , हो चुकी हैं | कविताओं पर पी एच डी गुरुनानक देव
विश्वविद्यालय , कुरुक्षेत्र ,व शिमला से |
मैं [अशोक दर्द ] : ऐसी कोई जरूरी बात जो मैं आपसे पूछ नहीं
पाया ?
डा गीता डोगरा : हाँ , मेरी विधा हिंदी कविता कहानी तो है ही
साथ ही दूरदर्शन पर नाटक देना | सन उन्नीस सौ अस्सी इक्यासी में मैंने गुल चौहान की कहानी वापसी पर एक टेली
फिल्म लिखी ,गूंगी जिन्दगी | मैंने उसे दूरदर्शन मुंबई भेजा | स्क्रिप्ट पास हुई
और वह फिल्म बनी जिसमें कलाकार सुधीर पाण्डेय , रत्ना भूषण [भारत भूषण की पत्नी ]
शिवराज व अन्य हस्तियाँ थीं | यह टेली फिल्म मुंबई ही नहीं बल्कि दूरदर्शन के तमाम
चैनलों पर चली | उसके बाद तीन नाटक
जालन्धर दूरदर्शन के लिए लिखे वे भी टेलीकास्ट हुए |
मैं [अशोक दर्द ] : अंत में नये रचनाकारों को कोई संदेश ?
डा गीता डोगरा : मैंने सम्पादक रहते हुए कई नये रचनाकारों को
उभारा | अब थोड़ी सी आहत हूँ इस बात पर कि नये लेखक साहित्यकार बनना तो चाहते हैं
परन्तु सबसे पहले वे यह जानकारी लेते हैं कि पुरस्कार कहां कैसे मिलेंगे | लिखने
की तपस्या छोड़ वे इस ओर भागते हैं | कुछ
लेखक हैं जो मेहनत कर रहे हैं |नये रचनाकारों को चाहिए कि वे साहित्य पढ़ने की आदत
डालें | जो मेहनत पुराने लेखकों ने की है उससे सीखें | पुरस्कार खुद आपके पास चले
आयेंगे ||
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