Monday, September 18, 2017








     प्रेम की प्रतिमूर्ति थे डॉक्टर प्रेम भारद्वाज [संस्मरण ]
कुछ लोग संसार में ऐसे होते हैं जिनकी जीवन में आमद खिलखिलाती बहार की तरह होती है और स्मृतियाँ महकती खुशबु की तरह | बेशक वे इस नश्वर शरीर को छोड़ कर परमधाम चले जाएँ परन्तु उनके चाहने वालों को उनके सदैव साथ होने का एहसास बरकरार रहता है | उनकी स्मृतियों के पुष्प सदैव उनके दिल में खिलते रहते हैं उनका प्रेम सदैव जीवन में रंग भरता रहता है ,उनके आदर्श सदैव मार्गदर्शन करते रहते हैं | मेरी मुराद ऐसी ही एक शख्सियत से है जिनकी रहबरी में कई लोगों ने मंजिलें फतह करने की ओर कदम बढाये हैं | उनकी रहबरी में मुझ जैसे व्यक्ति ने भी चंद कदम शब्दों की इस तिलिस्मी दुनिया में बढ़ाये ,उनका नाम है डॉक्टर प्रेम भारद्वाज | यह वह शख्सियत हैं जो स्वयं में एक संस्था थे | शायरी उनके लफ्ज - लफ्ज में समाई थी |
डॉक्टर प्रेम भारद्वाज अपने नाम के अनुरूप प्रेम की एक जीवन्त मिसाल थे | जिससे भी मिलते उसे अपने प्रेम की डोर से बांध लेते | यह उनके व्यक्तित्व का सबसे खूबसूरत पक्ष था | अपने व्यक्तित्व की इसी खूबसूरती के कारण वे लोगों के दिलों पर राज करते थे  | जो भी व्यक्ति उनके सम्पर्क में आता था | उनके व्यक्तित्व का कायल हो जाता था | वे जितने खूबसूरत रचनाकार थे उतने ही खूबसूरत इन्सान भी थे |
उनके साथ जुडी यादों की एक लम्बी श्रृंखला है | मैंने उन्हें सबसे पहले उन्नीस सौ निन्यानवे के पहाड़ी दिवस के कवि सम्मेलन जो बचत भवन चंबा में था वहां देखा था और उनकी रचनाएँ रूबरू सुनी थीं | परन्तु यह एक कवि सम्मेलन में मंच साँझा    करने तक ही सिमित था | उस समय यह शायद भरमौर में एस. डी. एम. थे | जब ये डलहौजी में बतौर एस. डी. एम. थे तो एक दिन बनीखेत में बी. आर. सी. कार्यालय में हमारी मीटिंग लेने आये थे ,मैं डी. पी. ई. पी. में उन दिनों बतौर सी. आर. सी. सी. की प्रतिनियुक्ति पर था | शिक्षा के कई बिन्दुओं पर उन्होंने बड़ी व्यवहारिक बातें बताईं | [ यह तो बाद में पता चला कि वे एच. ए. एस. में आने से पहले शिक्षक रह चुके थे ] मुझे ठीक से याद नहीं जब मैंने अपना परिचय दिया तो मेरे नाम को सुनते ही झट से बोले लिखते हो ,नाम तो पढ़ा है | मैंने हाँ कही तो बोले मीटिंग के बाद मिलना , मैं भी इसी बीमारी का मरीज हूँ | खैर मीटिंग के बाद मैं उनसे मिला | लेखन पर थोड़ी बहुत बातचीत हुई और उन्होंने कहा कि डलहौज़ी आये तो मुझसे मिलना | मैं उन दिनों नवोदित था जबकि वे हिमाचल के स्थापित एवं मूर्धन्य रचनाकार थे |
   एक दिन मैं डलहौजी गया तो उनके दफ्तर पहुँच गया | फिर वे मुझे अपने आवास पे ले आये वहां उन्होंने अपनी दो किताबे अपने हस्ताक्षरों के साथ  ‘एक मौसम ख़राब है” और दूसरी  ‘लोक कथा मानस”  दीं जो आज तक मैंने अमूल्य पूँजी की तरह संभाल कर रखीं हैं | उसके बाद हमारी मित्रता गुरु शिष्य की तरह समझ लो या अनुज अग्रज की तरह समझ लो , बढ़ती गई | कई कवि सम्मेलनों में हम साथ साथ रहे |
एक बार की बात है डलहौज़ी के पंजपुला में स्वतन्त्रता दिवस के उपलक्ष्य में कवि सम्मेलन था | कांगड़ा से पवनेन्द्र पवन जी व डा कुशल कटोच आदि कवि आ रहे थे | परन्तु बारिश इतनी हुई कि रस्ते बंद हो जाने के कारण उन्हें रस्ते से वापिस जाना पड़ा | पंजपुला के कैफे में डलहौजी के कई गणमान्य लोग मौजूद थे | मैंने डा साहब से धीरे से कहा – कवि तो हम तीन ही हैं | तो वे तपाक से बोले – कवि तो एक भी बड़ा होता है हम तो तीन हैं | खैर जब महफिल जमी तो यह सब सच्च साबित हो गया | उन्होंने पूरी महफ़िल को इस तरह बांधे रखा कि यह एक यादगार सम्मेलन हो गया | बाद में कुछ लोग बतौर टूरिस्ट जो लुधियाना से आये थे वे भी हमारे साथ जुड़ गये उनमें मुकेश आलम जैसे लोग आज तक जुड़े हुए हैं |
डलहौज़ी में साहित्यिक मंच का गठन करवाने में उनकी ही प्रेरणा थी | एयर कमाडोर अशोक महाजन जी व बलदेव मोहन खोसला जी की सरपरस्ती में इस मंच ने कई प्रतिभाओं को तराशा भी | कलम की स्थापना के बाद डा साहब की  छत्रछाया में कई बड़े बड़े सफल आयोजन करवाए गये | हरेक आयोजन में नगरपालिका अध्यक्ष मनोज चढ्ढा , डलहौज़ी पब्लिक स्कूल के मालिक डा जे एस ढिल्लन व बलदेव मोहन खोसला इत्यादि कई गणमान्य लोग सदैव मित्रवत साथ रहते थे | उनके द्वारा स्थापित यह मंच आज भी उनके आदर्शों का पालन करता हुआ सदैव साहित्य संवर्धन एवं सामाजिक कार्यों में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहा है |
डलहौजी में रहते हुए डा साहब ने दो काव्य संग्रहों मौसम मौसम व कई रूप रंग की रचना की | कई रूप रंग हिमाचली में गजल संग्रह है जबकि मौसम मौसम हिंदी गज़ल संग्रह है | इनका लोकार्पण भी यहीं हुआ और परिचर्चा भी |
 एक बार राष्ट्रिय पाण्डुलिपि मिशन की एक वर्कशॉप के लिए मैं चामुंडा में था तो मैंने उन्हें एक दिन फोन कर दिया | बड़े खुश होकर बोले कहाँ हो दर्द जी ? मैंने बताये कि मैं चामुंडा में हूँ तो बोले आ जाओ नगरोटा बगवां | दूसरे दिन मैं उनसे मिलने एक और मित्र के साथ वहां चला गया | वहां पहुँच कर फोन किया तो बोले मैं स्कूल में हूँ आप यहीं चले आओ और उन्होंने स्कूल का पता बताया | स्कूल बाजार में ही था | मैंने गेट पर जाकर फोन किया तो बोले रुको मैं आता हूँ | फिर वे उठकर बाहर आ गये | अपनों की तरह गले मिले और हमें एक रेहड़ी पर ले गये वहां तीन कप चाय का आर्डर दिया | वहीं खड़े होकर हमारे साथ चाय पी | इतने सरल व इतने आत्मीय कि सामने वाले को पता ही नहीं चलता कि आप जिस व्यक्ति से मिल रहे हैं  वह कितने  बड़े रचनाकार व कितने बड़े पद पर हैं | यही उनके व्यक्तित्व की खूबसूरती थी | फिर उन्होंने अंदर चलने के लिए कहा - बोले मुझे आयोजक ढूंढ रहे होंगे कि मुख्यातिथि कहाँ चला गया - चलो अंदर बैठते हैं | परन्तु मैंने कहा - सर आपसे मिलने की तमन्ना थी वो तो पूरी हो गई अब हमें जाने दीजिये | फिर हम उनसे विदा लेकर चले आये और वे अंदर चले गये |
बहुत समय के बाद पालमपुर के कंडवाड़ी स्थित आश्रम में होली के अवसर पे आयोजित कवि सम्मेलन में उनसे मुलाकात हुई | उन दिनों वे अस्वस्थ चल रहे थे और बहुत ही कमजोर हो गये थे परन्तु जिजीविषा व हंसने मुस्कुराने का स्वभाव वैसा ही | मैंने पैर छुए तो बोले कैसे हो दर्द जी ? उनकी सेहत देखकर मेरा मन भर्रा आया मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी भावनाओं पे काबू किया | थोड़ी सी बातचीत हुई फिर कवि सम्मेलन शुरू हो गया  और फिर शाम को  सभी अपने अपने गन्तव्य की ओर चल दिए |
मई माह में लोक सभा के चुनाव थे मेरी ड्यूटी चरह विधान सभा के चांजू में लगी थी | चुनाव के बाद हम वापिस भंजराडू आ रहे थे तो रात के लगभग दस बजे होंगे मुझे कांगड़ा से साहित्यकार मित्र  देवराज संजू का फोन आया उसने यह बुरी खबर दी तो आँखों से आंसुओं की बूँदें टपक पड़ीं | मैंने खुद को ऐसे पाया जैसे कोई यतीम हो जाता है | प्रेम के प्रेम से मैं ही नहीं कई मित्र महरूम हो गये थे |
      डा प्रेम भारद्वाज जमीन से जुड़े रचनाकार थे | उनकी रचनात्मकता सदैव पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी | उनको याद करते हुए इरावती साहित्य कला मंच बनीखेत ने दो बरस पहले एक अन्तर्राज्यीय कवि सम्मेलन करवाया और उनकी सहधर्मिणी को सम्मानित किया | हमारी ओर से यह उनके लिए श्रधान्जली थी | उनकी  याद में लिखी एक कविता .....,
आज भी गूंजती है मन्दिर में घंटियों की मधुर झंकार
बहती है आज भी मधुर शीतल सुरभित बयार         
आज भी झूमते हैं मस्ती में डलहौजी के बान तोष और देवदार
हरीतिमा ओढ़े आज भी निहारती है धौलाधार
आज भी परिंदे भरते है उन्मुक्त गगन में ऊँची उड़ान
झर झर झरते झरने आज भी छेड़ते हैं सुरमयी तान
आज भी वन उपवन में नन्हीं कोंपले खिलती हैं
गलियाँ गाँव की आज भी धूप छाँव से मिलती हैं 
आज भी वो बरगद मुझे दुलारता है
गाँव का पनघट आज भी रह रह कर पुकारता है
आज भी सजती है गाँव की चौपाल
बांसुरी पर मधुर धुनें छेड़ते हैं ग्वाल |
आज भी दिए जलते हैं मजारों पे
बर्फ गिरती पिघलती है पे
आज भी फूल इतराते इठलाते हैं बहारों पे
आज भी वाह वाह निकलती है तुम्हारे लिखे अशारों पे
सब कुछ है आज भी इस गाँव में
बस एक तुम नहीं
और हमारा सर नहीं तुम्हारे आंचल की छाँव में ||

                                  अशोक दर्द  बनीखेत जिला चंबा  






                      एक अध्यापक का विद्यार्थियों की सुखद स्मृतियों में जिन्दा रहना ....... [संस्मरण ]  




 बचपन का स्मरण आते ही कई स्मृतियाँ  इस तरह सामने आकर खड़ी हो जाती हैं मानो  अभी-अभी की हों  
| बरसों बीतने के बाद भी ये स्मृतियाँ अवचेतन में सोई पड़ी रहती है | अच्छी स्मृतियों  की सुगंध जहाँ तन-मन को महका देती है वहीँ कठिन स्मृतियों  की दुर्गंधित टीस अन्दर तक चीरती चली जाती है | दोनों स्थितियों में प्रेम व आक्रोश स्वत: जाग उठते हैं |
              इन्हीं स्मृतियों के ताने-बाने में झाँक कर देखूं तो मुझे बचपन के वो दिन उद्वेलित करने लगते हैं जब एक अध्यापक ने मुझे पीट-पीट कर इतना प्रताड़ित किया कि मैंने स्कूल तक छोड़ दिया था | यह किस्सा सातवीं कक्षा का है | यह तो मेरा सौभाग्य रहा कि उसी स्कूल में लगे दूसरे अध्यापक ने मेरी पीड़ा को समझा और मुझे पुन: स्कूल तक पहुंचा दिया  और फिर मैं पढ़-लिख गया | अन्यथा आज अध्यापक होने के स्थान पर कहीं ईंटे ढो रहा होता या बजरी कूट रहा होता |
                   आपको बताता चलूँ कि मेरे घर में उस जमाने में कोई भी पढ़ा-लिखा नहीं था | अम्मा-बापू दोनों अंगूठा छाप थे  | बड़ा भाई पांचवीं तक पढ़कर चौदह वर्ष की उम्र में मजदूरी करने लग पड़ा था | घर में मैं ही इकलौता पांचवीं से आगे बढ़ा था ; यह बात पूरे परिवार के लिए गौरव की बात भी थी | मैं पढ़ने में भी अच्छा था | इसलिए कुछ अध्यापक मुझे बहुत प्यार करते थे | जो मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते थे, वे थे उस स्कूल में शास्त्री जी  थे | ये बिलासपुर  के झंडूत्ता से थे  | वह मेरे प्रिय अध्यापक थे | उनको  मैं अपना आदर्श मानता था |
        राजकीय माध्यमिक पाठशाला निगाली मेरे गाँव घट्ट से लगभग 2.5 कि. मी. दूर होगी | सुबह जब घर से स्कूल जाते तो सारा रास्ता उतराई थी और जब शाम को स्कूल से घर आते तो घर तक चढ़ाई वाला रास्ता था  | टेढ़ा-मेढ़ा संकरा रास्ता | एक नाला जिसे स्थानीय बोली में ‘ध्रेड्डा दा नाल’ कहा जाता है; इस तरह से टेढ़ा-मेढ़ा था की उसी एक नाले को पांच बार पार करना पड़ता | नाले में इतना घना जंगल था की कोई चिड़िया भी फड़फड़ाती तो डर लगता |  दिन में भी अँधेरा रहता इतने घने पेड़ थे | मेरी उम्र उस समय कोई बारह वर्ष की थी | मैं अपने गाँव से अकेला ही जाता था | जो दूसरे गाँव से जाते थे उनमें से मेरे सहपाठी हंस राज और प्रीतम छठी में फेल होने के कारण स्कूल छोड़ चुके थे | टप्पर गाँव से एक लड़का चमन भी वहां छठी में दाखिल हुआ था, परन्तु वह अपनी मर्जी से आता जाता था | मैं तैयार होकर उसके घर पहुँच जाता तो वह कई बार सोया होता | घर वाले उसे उठाकर हाथ मुंह धुलाकर व रोटी  खिलाकर उसे बड़ी मुश्किल से तैयार करके स्कूल भेजते | मेरा स्वार्थ यह होता था कि मुझे अकेले नाले में डर लगता था, उसके साथ होने से मुझे डर नहीं लगता था  | इसलिए उसके घर चला जाता था | परन्तु उसके चक्कर में कई बार मैं भी लेट हो जाता | साल के शुरू के कुछ दिन स्कूल  जाने के बाद उसने भी स्कूल छोड़ दिया |
               अब मैं निपट अकेला हो गया था  |  मैं नाले में  पहुंचता तो बहुत डरता | कहीं चिड़िया भी फड़फड़ाती तो मैं रोने को हो आता | फिर भी मुझे पढ़ना था | परन्तु  इस डर के कारण मैं भी स्कूल से कई बार अनुपस्थित हो जाता | जब मैं अनुपस्थिति के बाद दूसरे दिन स्कूल जाता तो एक टीचर मेरा ऐसा रिमांड लेते कि कई बार पीठ पर उभरे नीले निशान कई कई दिनों तक नहीं मिटते |  अंत में , एक नाले का डर, दूसरे उस अध्यापक की पिटाई ने मुझे ऐसा डराया कि मैंने स्कूल जाना ही बंद कर दिया और कुछ दिनों बाद मेरा नाम भी  कट गया | नाम कटने का पता मुझे दुसरे गाँव के बच्चों से लगा | पिताजी मुझे स्कूल जाने के लिए कहते तो मैं टस से मस न होता |
       जब पिता जी ने  स्कूल जाने के लिए मुझ पर ज्यादा ही दबाब डाला तो मैंने कहा अगर आपने मुझे  पढ़ाना ही है तो मैं बनीखेत स्कूल में पढूंगा | इस स्कूल में मैं कभी नहीं जाऊँगा | मैं माँ  के साथ खेतों में घास काटने के लिए चला जाता तो  मैने उसे न पढने के लिए राजी कर लिया था | वो कहती जान है तो जहान है; जो नहीं पढ़ते हैं वे भी रोटी खाते हैं | नहीं पढ़ना है  तो मत पढ़ | मैं अन्दर ही अन्दर माँ की ये नर्म बातें सुनकर खुश हो जाता | अब मैं सोचता, मुझे उस अध्यापक से पशुओं की तरह जो मार पड़ती थी, उससे निज़ात मिल जाएगी | परन्तु पिताजी तो मुझे पढ़ाना चाहते थे | जब उन्होंने बड़ा जोर देकर स्कूल जाने को दबाब बनाया  तो मैंने उन्हें अपना सर्टिफिकेट लाने के लिए कहा कि आप मेरा सर्टिफिकेट ले आओ मैं बनीखेत पढ़ने चला जाऊँगा | मेरी जिद्द को देखते हुए वे मेरा सर्टिफिकेट लेने स्कूल चले गए | मुझे याद है उस समय हमारे स्कूल में एक ग्रेजुएट टीचर जिनका नाम के.के. शर्मा था, स्कूल के इंचार्ज थे | जब पिताजी ने उनसे प्रमाण पत्र के लिए कहा तो उन्होंने पिताजी को प्रमाण पत्र देने से इन्कार कर दिया और कहा की एक बार उसे स्कूल तक पहुँचाओ फिर वह यहां नहीं पढ़ना चाहेगा तो हम आपको  प्रमाण-पत्र दे देंगे | बच्चा पढने वाला है | बनीखेत जाकर बिगड़ जायेगा | जब मेरे वहां न पढने की बात का पता शास्त्री जी को लगा तो उन्होंने  पिताजी को कहा की आप घर जाओ मैं शाम को आपके घर आऊँगा और उसे खुद मनाऊंगा |
                       पिताजी जब स्कूल जाकर घर वापिस पहुंचे तो मैंने पूछा की आप मेरा सर्टिफिकेट ले आये...| तो उन्होंने बताया की हैडमास्टर ने सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया और शास्त्री जी (अध्यापक) आज शाम को छुट्टी के बाद हमारे घर तुझसे मिलने आ रहे हैं | अब मुझे सारी आशाएं टूटती हुई दिखने लगीं | मुझे पता था वो मुझे दोबारा स्कूल ले जाएंगे | मैं उन्हें मना नहीं कर पाऊंगा |
    जब शाम के समय हम खेत में मक्की काट रहे थे तो दूर से रास्ते में वो मुझे आते दिखे | मैंने उन्हें पहचान लिया सफेद कुर्ता-पजामा, पतले लम्बे व्यक्तित्व के मालिक | मैं यूँ भी, पिता जी के कहने के बाद कि वो शाम को हमारे घर आ रहे हैं ; रास्ते को बार-बार देखे जा रहा था कि कब आते हैं...| आखिर मेरा इन्तजार ख़त्म हो गया था | मैंने उन्हें पहचान लिया वो शास्त्री जी ही थे  | अब मुझे डर लगने लगा था | मेरे दृढ़ निर्णय की दीवार एकाएक मुझे ढहती हुई लगने लगी थी | मुझे अन्दर ही अन्दर कंपकपी लगने लगी थी |
                      उन्होंने आकर मुझे मेरे स्कूल छोड़ने का कारण पूछा तो मैंने सारी बातें (अध्यापक के रोज पीटने व नाले में डरने ) उन्हें बता दीं | उन्होंने मुझे समझाया कि अब मैं उस अध्यापक को कह दूंगा कि वह तुम्हें न पीटे | फिर वे उस दिन हमारे घर ही रहे | यहां मैं बताता चलूँ कि उन दिनों वे एक ही समय भोजन करते थे वह भी खुद बनाकर ,  बाहर का पानी तक नहीं पीते थे | (बरसों बाद आज भी उनकी यही चर्या है) उन्होंने हमारे घर में खाना तो दूर पानी तक न पिया | दूसरे दिन सुबह वे मुझे स्कूल साथ लेकर ही गये | मेरा पुन: नाम दर्ज हो गया और मेरी पढ़ाई भी शुरू हो गई | अब उस क्रूर अध्यापक ने मुझे पीटना भी बंद कर दिया | शायद उन्होंने उसे समझा दिया था | फिर बाद में उन्होंने अपना क्वार्टर ही मेरे गाँव के पास वाले गाँव में रख लिया | स्कूल के पास रखे क्वार्टर को छोड़कर इतने दूर आने-जाने की उन्हें क्या जरुरत थी | आज मुझे समझ आता है ये सब मेरे लिए ही था |  आज मैं उनके आशीर्वाद से फल-फूल रहा हूँ ; मैं आज भी सोचता हूँ कि मैं उनका एहसान कैसे चुकाऊंगा ,  न तो मेरे पास इतनी शक्ति है , न ही सामर्थ्य | मैं आज जो कुछ हूँ उसी विभूति की बदौलत हूँ | और हाँ आज भी मैं जब-जब भी अतीत की स्मृतियों में डूबता हूँ, उस दुष्ट अध्यापक की तस्वीर मेरे मानस पटल पर उभर आती है | मेरे अंदर क्षोभ की ज्वाला धधक उठती है | बरसों बीतने के बाद भी  मैं उसके बुरे व्यवहार को भूल नहीं पाया हूँ |  यदि शास्त्री जी जैसा अध्यापक मेरी जिन्दगी में न आता  तो  उस शख्स ने तो मेरा जीवन ही बर्बाद  कर दिया था | यूं तो वह शख्स भी मेरा अध्यापक था, परन्तु उसके लिए मेरे दिल में  आज भी  कहीं जगह नहीं है | जबकि शास्त्री जी को मैं अपनी हरेक उपलब्धि पे अन्दर ही अन्दर स्मरण कर लेता हूँ | वे मेरे दिल में धड़कते हैं, सांसों में बसते हैं | उन्हें मैं अपनी हर उपलब्धि सौंपकर स्मरण कर लेता हूँ | एक अध्यापक के नाते आज मैं सोचता हूँ कितना सुखकर होता है अप ने विद्यार्थियों की सुखद स्मृतियों में जिन्दा रहना , जैसे मेरे भीतर शास्त्री जी जिन्दा हैं ||

                                                                                                                                     अशोक दर्द 



























  



















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