Tuesday, October 17, 2017

व्यंग्य .....लाला कल्लू और लोकतंत्र

                            लाला कल्लू और लोकतंत्र [कहानी ]
आओ दोस्तों आपको एक कहानी सुनाता हूँ ......, सुनाता क्या दिखाता हूँ | हिमालय की घाटी में बसा है गाँव दारपुर | लगभग पच्चास घर हैं | उसके आस – पास आठ – दस गाँव और हैं | सबकी एक ही पंचायत है दारपुर | दारपुर में लाला कल्लू का पिछले पैंतीस वर्षों से एकछत्र राज है | हर बार वही पंचायत का प्रधान बनता है | यदि कई बार सीट रिजर्व भी आये तो , या तो उसके परिवार से कोई महिला या फिर उसकी  घर दुकान  में काम करने वाले मजदूर आदि को खड़ा कर दिया जाता |  उसकी गाँव के किनारे सडक के पास एक बहुत बड़ी दुकान  है | सुई से कफन तक सब कुछ उसकी दुकान पर मिल जाता है | करियाना हो या सब्जी ,मिठाई हो या शराब सब कुछ उसकी दुकान में उपलब्ध रहता है |
कहते सुना है लाला कल्लू अपने जमाने का आठवीं पास है, वह भी उसने पंजाब में जाकर पढ़ाई की है | उस जमाने में इन पहाड़ों में सिर्फ प्राइमरी स्कूल ही हुआ करते थे | गोरा चिट्टा रंग, नाटा कद बड़ी बड़ी सफेद मूंछें सर पर टोपी सफेद कपड़े पहनकर जब वह गद्दी पर बैठता है  तो गद्दी स्वतः ही सज धज  उठती है  | उसके ठहाकों से आसपास का वातावरण भी ध्वनित  हो उठता है  | लोग उसके आस पास इस तरह मंडराते रहते जैसे गुड पे मक्खियाँ | धर्म से लेकर राजनीति , समाजशास्त्र से लेकर मनोविज्ञान तक हर विषय पर बरसों के अनुभव से वह प्रभावपूर्ण बातें कर लेता है  |  दिन में करियाना सब्जी इत्यादि बेचता है  और रात ढलते ही शराबखाना खुल जाता  है | लोग भीतर बनाये कमरों में शराब पीते हैं  व गप्पबाजी करते हैं | एक कमरा उसने स्पेशल जुआ खेलने वालों के लिए बनाया है  | वहां बैठकर लोग रात रात भर जुआ खेलते हैं | लाला का नौकर दीनू उन्हें सारी सुविधाएँ उपलब्ध करवाता है  | बदले में बत्ती के पैसे अलग से लेता है | जो जुआ जीत जाता  है उससे भी अलग से पैसे लिए जातेहैं || इस तरह लोग तो रोज जुआ हारते जीतते हैं , परन्तु लाला कल्लू तो हमेशा जीतता ही है  | रात में उसे हजारों रुपये की आमदन हो जाती है  | यदि कोई जुआरी हार भी जाता है  तो उसे उधार में पैसे ब्याज पर मिल ही जाते हैं  | इस तरह जुआ खेलने वाले व शराब पीने वाले लोग लाला का गुणगान करते नहीं अघाते | लाला का इन लोगों पर सदा एहसान रहता है |
        उधर ग्रामीण बेचारे लाला कल्लू के उधार के नीचे बरसों से  दबे हुए  हैं | उधार लिए सौदे का वे कभी रेट पूछने का साहस नहीं करते हैं  | लाला अपनी मर्जी से सौदे का रेट लगाता है  | फलत: उसके कर्ज में  गाँव की दूसरी पीढ़ी भी  चल पड़ी है | गाँव में कोई भी काम लाला कल्लू की मर्जी के खिलाफ नहीं हो पाता है  | हरेक काम में कल्लू की भागीदारी रहती है  | अच्छे काम का सेहरा कल्लू प्रधान के सिर बांधा जाता है  | गाँव के छोटे-मोटे झगड़े व काम तो वह दुकान पर ही निपटा देता है  | पुलिस भी उसकी पंचायत की तरफ देखती तक नहीं है | जिसके साथ कल्लू रहता है उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है | जब कभी कोई केस पुलिस तक पहुँचता भी है तो कल्लू खुद जाकर रफा-दफा करवा देता है  |बाहर से गाँव में कोई भी अधिकारी-कर्मचारी आता  है तो लाला कल्लू के ही यहां रुकता है | क्योंकि उसके घर में ही सब वांछित सुविधाएं हैं  | बाकी गाँव वालों के पास टूटे-फूटे कमरों में आखिर कोई क्यों रुके  लाला कल्लू के बाजू बड़े लम्बे हैं | इसलिए उसके सैंकड़ों गुनाहों को हंसकर झेलना लोगों की मजबूरी है  | कुछ पढ़े लिखे युवा ये सब देखते हैं | जुए-शराब के अड्डे उन्हें खलते हैं , पंचायत में आये पैसों के घपले खलते हैं , परन्तु उसे हाथ डालने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पाता है |
    लाला कल्लू ने लोगों की नब्ज पकड़ी हुई है  | एक तरफ वह उन्हें बुराईयों की ओर धकेलता है , कर्ज में दबाता है , उनके हिस्से का सरकारी पैसा हड़प जाता है  | दूसरी ओर उनके हर सुख-दुख में शामिल भी  हो जाता है  | उनकी हर समय मदद करने के लिए तैयार रहता है | लोग उसके इस दयालु व्यवहार के आगे अपने शोषण के सारे दुखड़े भूल जाते हैं  | जब चुनाव आता है , वह विपक्ष की जमानतें तक  जब्त करवा कर जीत जाता है |इस बार भी चुनाव आये तो, इस पंचायत में महिला प्रधान की सीट रिजर्व हो गई थी  | लोगों को लग रहा था कि अबकी बार लाला कल्लू खुद-ब-खुद पंचायत की प्रधानगी छोड़ देंगे | परन्तु उनका यह सोचना व्यर्थ निकला | लाला कल्लू ने अपनी अनपढ़ पत्नी को प्रधान पद की उम्मीदवार घोषित कर दिया | पढ़े लिखे युवाओं को ये सब नागवार लगा तो  उन्होंने गाँव की एक पढ़ी लिखी लड़की जो एम.एस.सी. पास करके अभी-अभी गाँव आई थी  उसे लाला कल्लू की पत्नी के विरुद्ध खड़ा कर दिया  | मुट्ठी भर पढ़े लिखे लोगों के लिए कल्लू की अनपढ़ पत्नी और अनपढ़ जनता से टक्कर लेना एक दु:स्वप्न सा था | जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता गया मुट्ठी भर पढ़े-लिखे  युवा अकेले पड़ते गये | सारा गाँव अर्थात बाकी के गाँव भी कल्लू के साथ खड़े हो गये | रातों को शराब की पेटियां उड़ने लगी | न जाने कितने ही मुर्गे चुनाव की बलि चढ़ गए | लोगों के बही खातों से लाला ने सारा बकाया काट कर खाते निल कर दिये | उधर पढ़े-लिखे मुट्ठी भर युवा घर-घर जाकर कल्लू की सच्चाई बताते रहे | परन्तु कोई भी सुनने को तैयार नहीं था  | अबकी बार भी लाला कल्लू की अनपढ़ पत्नी उस युवा शिक्षित लड़की को सैंकड़ों मतों से हराकर चुनाव जीत गई | ढोल नगाड़ों की धुनों पर लोग लाला कल्लू के आँगन में नर्तन कर रहे थे   | ऐसे लग रहा था जैसे लोकतन्त्र कल्लू के आँगन में नाच रहा हो | चुनाव का परिणाम आते ही  मुट्ठी भर पढ़े-लिखे युवा अपने-अपने घरों में बत्तियां बुझाकर बिस्तरों में दुबक गए  | मानों हार का मातम मना रहे हों | और मैं अपने कमरे में बैठ कहानी लिख रहा था  | अब मेरी यह  कहानी   खत्म.......| आपको कहीं यह कहानी सच्ची तो नहीं लगी , बिलकुल काल्पनिक है काल्पनिक ....||                    
                                                             अशोक दर्द
     








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