बेटी
धरती का श्रृंगार है बेटी |
कुदरत का उपहार है बेटी ||
रंग-बिरंगे मौसम बेशक |
जैसे ऋतू बहार है बेटी ||
कहीं शारदा कहीं रणचंडी |
चिड़ियों की उदार है बेटी ||
दो कुलों की शान इसी से |
प्रेम का इक संसार है बेटी ||
इस बिन सृजन न हो पायेगा |
धरती का विस्तार है बेटी ||
बेटी बिन जग बेदम-नीरस |
जग में सरस फुहार है बेटी ||
मधुर-मधुर एहसास है बेटी |
पूर्णता-परिवार है बेटी ||
धरती का स्पन्दन है यह |
ईश-रूप साकार है बेटी ||
बेटे का मोह त्यागो प्यारे |
नूतन-सृजन-नुहार है बेटी ||
कुल की शान बढ़ाये बेटी |
मत समझो कि बहार है बेटी ||
दिल की बातें दर्द सुनाये |
अपने तो सरकार है बेटी ||
अशोक दर्द
प्रवास
कुटीर ,गाँव व डाकघर बनीखेत
तह.डलहौजी जिला चंबा,हिमाचल प्रदेश
176303
मोब. 9418248262
अन्नदाता
भरी दुपहरी में
झुलसाती धूप के नीचे
कंधे पर केई उठाकर
चल देता है खेतों की
ओर मौन तपस्वी |
जाड़े की ठिठुरती
रातों में
अब भी करता है
रखवाली
होरी बनकर अपनी
फसलों की नील गायों से |
आज भी उजड़ जाते हैं
उसके खेत
समय बदला मगर
उसके लिए कुछ नहीं
बदला |
महंगी फीस न भर पाने
की विडम्बना
झेलती है उसकी संतति
और देखती है पसरी चकाचौंध
बेबस लाचार होकर |
उसकी मेहनत और बाजार
का व्याकरण
कभी तालमेल नहीं
बैठायेगावह बखूबी जानता है
उसके हक की आवाज कोई
नहीं उठाएगा |
वह अपनी लूट का सच
महसूसता है
फिर भी अपने
अन्नदाता होने का फर्ज
निभाता है वचनबद्ध
होकर |
वह कभी हडताल नहीं
करता बेशक ऋण का बोझ
उसे कुचल ही क्यों न
दे अपने पैरों तले |
जिस दिन वह हडताल
करेगा
खेत में बीज नहीं
बोयेगा उस दिन
भूखे पेट अन्नदाता की कीमत पहचानेगा और रोयेगा ||
अशोक दर्द
प्रवास
कुटीर ,गाँव व डाकघर बनीखेत
तह.डलहौजी जिला चंबा,हिमाचल प्रदेश
१७६३०३
मोब. 9418248262
मुक्तक
1
बिकता
देखा दीं इश्क की बस्ती मे |
तड़पे जल बिन मीन इश्क की बस्ती मे ||
जो जो हुआ दीवाना इस शै का दर्द |
बज गया
उसका टीन इश्क की बस्ती में ||
२
कहता दीवाना दोस्त मेरे चार दिन की चांदनी |
जग ने भी मन दोस्त मेरे चार दिन की चांदनी ||
नजरे आतिश कर दो तुम सारी पुराणी रंजिशें |
है जमाना दोस्त मेरे चार दिन की चांदनी ||
३
तुम्हारी यादों के फूल हम मुरझाने नहीं देंगे |
दिल के दरवाजे बंद कर लेंगे जाने नहीं देंगे ||
हमारा तुम्हारा शायद खुदा ने खुद बनाया है |
अब तुम्हें चाहकर भी दामन छुड़ाने नहीं देंगे ||
बरसात में
धरती से है मिला गगन बरसात में |
भीगा भीगा है तन मन बरसात में ||
रिमझिम रिमझिम बूँदें गीत सुनती हैं
पुलकित पुलकित है कण कण बरसात में ||
मोर पपीहा कोयल गाएं गीत मधुर |
पल्लवित पुष्पित है चमन बरसात में ||
नदियाँ नाले झरने सब मदमस्त हुए |
छ्या सब पे है यौवन बरसात में ||
शीतल झोंकों संग कोंपलें नाच रही |
देख देख हुए तृप्त नयन बरसात में ||
कान लगाकर जब झरनों को सुनता हूँ |
घुंघरू की है ज्यूँ छण-छण बरसात में ||
मीठी गंध धरा की दामन में लेकर |
सुरभित सुरभित है पवन बरसात में ||
नन्हीं नन्हीं बूँदें पुष्प उपजाती हैं |
पुष्पित पुष्पित है वन उपवन बरसात में ||
नन्हीं बूंदों ने धरती सहलायी तो |
सारे हो गये मूक प्रश्न बरसात में ||
बोने को है आतुर सृजन के बीज पुनः |
लिपट रति के संग मदन बरसात में ||
[
4-7-2016 ]
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