विचारों
का रेवड़ [कविता ]
मैं हांकता रहता हूँ, हरदम विचारों का रेवड़ ,
जैसे गडरिया
हांका करता अपनी भेड़ों का रेवड़ |
मेरे विचारों
का रेवड़ ,कभी पहुँच जाता है ,
पर्वतों के
पीछे बसी सुरम्य घाटियों में ,तो कभी ,
घनी कंटीली
झाडियों के मध्य से ,लहुलुहान हुआ गुजरता है ,
कभी,कलकलाते
झरनों के किनारे ,
बड़ी-बड़ी चट्टानों को
फलांघता है ,तो कभी ,
नदियों के
किनारे ,बिछी रेत में ,
पदचिन्ह छोड़ता गुजरता
है ,बिल्कुल भेड़ों के रेवड़ की तरह |
गड़रिये के कुत्ते की
तरह ,
मेरा विवेक ,करता है
रखवाली ,
मेरे विचारों के रेवड़
की |जिस तरह निर्जन वनों से गुजरता रेवड़ ,
सहम जाता है ,किसी
भेडिये या बाघ जैसे हिंसक
जानवर की आवाज से, ठीक
उसी तरह ,
मेरे विचारों का रेवड़
भी,सुना करता है ,
ऐसी हिंसक आवाजें
,सैंकडो–हजारों....,और ,
सहम जाया करता है गाहे-वगाहे..,
चलते-चलते ,
जिस तरह ,गड़रिये का
रेवड़ ,फिर ,
चरकर , थका-मांदा ,आ
जाता है फिर उसी
बाड़े में , रात
गुजारने ,जहां से गया था ,सुबह चरने ,
उसी तरह ,मेरे विचारों
का रेवड़ भी ,
आ जाता है अपने घर ,घूम-फिर
कर ,
आटे–चावल और नमक-मिर्च के
बाड़े में.......|||
*अशोक ‘दर्द’
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