भले
ही वह शहर की बदनाम औरत थी | परन्तु उसके अन्दर भी एक नेक दिल था | जिसे अक्सर
लोगों ने नहीं देखा था | मैं उसकी नियति की कहानियाँ लिखने उसके पास जाता , भरे
दिन के उजाले में | वह बार-बार मना करती “ तुम बदनाम हो जाओगे, मुझ संग
मिलने-मिलाने से , अगर मिलना ही है मेरी नियति लिखने को तो रात के अँधेरे में आया
करो | शहर के कई इज्जतदार लोग मुझसे मिलने रात के अँधेरे में आते हैं और सुबह पौ
फटने से पहले चले जातें हैं | कोई उनकी तरफ अंगुली नहीं उठाता | तुम भी ऐसा ही करो
|’’ उसने मुझे चेताते हुए कहा | मैं उसकी चेतावनी को नजरअंदाज करके दिन के उजाले
में पाक मिलता रहा | कुछ दिनों बाद वे इज्जतदार लोग मेरे उससे मिलने की कानाफूसी
कर रहे थे और मैं शहर में बदनाम हो रहा था | वो इज्जतदार लोग आज भी इज्जतदार थे |
अशोक दर्द
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