आई बसन्त की रानी
ली मौसम ने अंगडाई
फिर से, हुई धरा मस्तानी |
महकी संग हवाएं
लेकर, आई बसन्त की रानी ||
नन्हे-नन्हे स्वप्न
सजाकर, आई फिर तरुणाई |
नव जीवन की लिए
चेतना, बही सुरभित पुरवाई ||
भ्रमरों के गुंजन ने
फिर, सरगम नयी सुनाई |
नन्हीं कोंपलें खिली
पेड़ों पर, जीवन ने ली अंगडाई ||
महकी संग हवाएं
लेकर, आई बसन्त की रानी ||
लगे चहकने और महकने,
सारे वन-उपवन |
पंछी और पंखेरू सब
का, हो गया सुरभित जीवन ||
कोयल ने छेड़ी कूक,
मयूर नाचा छनछन |
रंग-बिरंगी ओढ़
चुनरिया, बनी कुदरत दुल्हन |
गाने लगा गीत बसन्त
के, नदियों-झरनों का पानी |
महकी संग हवाएं
लेकर, आई बसन्त की रानी ||
खत्म हुआ आतंक शिशिर
का, सबने खुशी मनाई |
बन्द हुए संदूकों
में फिर, कम्बल और रजाई ||
धरती के कण-कण में
फिर, नई उमंगे छाई |
भूल वेदना पतझड़ की
ठूठों ने, कोपलों की माला सजाई ||
ऊँचे-ऊँचे हिमशिखरों
का, नर्तन कर रहा पानी |
महकी संग हवाएं
लेकर, आई बसन्त की रानी ||
पर्वत और ढलानों की
फिर, लंबी ख़ामोशी टूटी |
रूत के सूरज से फिर,
किरण बसंती फूटी ||
फूलों के मौसम में
भ्रमरों ने, फिर से चाँदी कुटी |
इस बसन्ती मौसम की,
सबने फिर मोजें लुटीं ||
खत्म हुई बेला
ठिठुरन की, आई ऋतू सुहानी |
महकी संग हवाएं
लेकर, आई बसन्त की रानी ||
अशोक
दर्द
व्यथा का पिटारा
जब भी ,
होता है मेरा गांव जाना तो ,
‘कर्मू’ मेरा पड़ोसी,
बचपन का सखा ,
खोल देता है अपनी
मुसीबतों का
पिटारा ,
मेरे आगे...,
बोलता है, अशोक बाबू
!
जमाना बड़ा खराब आ
गया,
परिवार बिखर गया है
,
सभी इधर-उधर जा बसे
हैं ,
गावं की तरफ...,
देखते नहीं ;
मजदूरी से पेट नहीं
पलता ,
मंहगाई जान निकालने
लगी है ;
खेतों में फसल नहीं
होती ,
पशु-पक्षी बीज ही
चुनकर खा जाते हैं ;
‘घासनियाँ’ उदास हो
गयी हैं ;
दीवारें और छतें
साथ-साथ
होते हुए भी बतियाती
नहीं ,
सुख-दुःख बांटती
नहीं..,
जब पूछता हूँ उसके
बच्चों बारे
तो..’
बोलता बिटिया दस कर
के
घर बैठाई थी ,
क्योंकि आगे पढ़ाने
की हिम्मत नहीं थी ,
फिर..,
ई.जी.एस. में टीचर
लग गई थी ,
कुछ बरसों से ,
अब सरकार ने स्कूल
कर दिया है ,
बेटी बेरोजगार हो गई
अब वह कई दिनों से
सुबह-सुबह घर से चली
जाती है
धरने पर बैठने ,
और भी कई बच्चें हैं
उसकी नियति के...,
बेरोजगारी का दंश
झेलते
सब दे रहे हैं धरने
बैठें हैं अनशन पर
मगर.., उनकी कोई
नहीं सुनता ;
लड़का बी.ए. ,बी.एड.
है ,
वह भी वही कुछ कर
रहा है
जो बिटिया शीनू कर
रही है ;
धरना...हड़ताल...अनशन
;
मैं भी कई दिनों से
ठेकेदार के आगे-पीछे
फिर रहा हूँ ,
कई महीनों की मजदूरी
फंसी है
पैसे ही नहीं देता ,
बोलता है घाटा पड़
गया है ;
दो साल से ‘सांड’
भैंस
पाल रहा हूँ ,
जरुर कोई चेला ‘टकर’
गया है ,
घर वाली बीमार रहती
है ,
दवाईयों के लिए पैसे
नहीं होते ,
और भी बहुत कुछ होता
है
उसके व्यथा के
पिटारे में ,
जिसे मैं सुनना नहीं
चाहता या
सुनकर अनसुना कर
देता हूँ ,
मैं भी चाहता हूँ ,
अपनी नियति उससे
सांझी करूँ ,
मगर...,
मैं उसकी नजरों में
गिरना नहीं चाहता
इसलिए ,
दिल की बातें ,
दिल में छुपाए रखता
हूँ
झूठे ओढ़े नकाब के
अन्दर
ताकि ,
उसकी नजर में ,
मेरी आबरू
बची रहे..||
अशोक दर्द
“स्वतंत्रता के लिए”
स्वतंत्रता के लिए
शीश कटाये, अमर क्रान्तिवीरों ने ,
मगर न अपने शीश झुकाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
सिंचित कर लहू से
अपने, इस आर्यवर्त की क्यारी में ,
आज़ादी के पुष्प
खिलाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
डिगे न अपने प्रण
से, लगा दी निज प्राणों की बाजी ,
तन-मन-धन सर्वस्व
लुटाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
मिले प्रलोभन लाखों
फिर भी, अविचल होकर डटे रहे ,
जान लुटा कर
संस्कृति-संस्कृत-राष्ट्र बचाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
सुविधा-साधन सीमित
थे पर, जिगरे से थे बहुत बहुत बड़े ,
दुश्मन क़दमों पर
गिराये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
स्वतंत्रता के
महायज्ञ में, देकर आहुति निज प्राणों की ,
माँ की कोख के मान
बढ़ाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
सिंहो के संग खेलने
वाले, श्रगालों से नहीं डरते हैं ,
कह कर जग वाले
समझाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
कण-कण राष्ट्र का
महक उठा, आजादी की खुशबु से ,
शहादत के जब फूल
खिलाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
अशोक दर्द
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