Tuesday, January 21, 2014

कुछ कविताएँ


आई बसन्त की रानी
ली मौसम ने अंगडाई फिर से, हुई धरा मस्तानी |
महकी संग हवाएं लेकर, आई बसन्त की रानी ||
नन्हे-नन्हे स्वप्न सजाकर, आई फिर तरुणाई |
नव जीवन की लिए चेतना, बही सुरभित पुरवाई ||
भ्रमरों के गुंजन ने फिर, सरगम नयी सुनाई |
नन्हीं कोंपलें खिली पेड़ों पर, जीवन ने ली अंगडाई ||
महकी संग हवाएं लेकर, आई बसन्त की रानी ||
लगे चहकने और महकने, सारे वन-उपवन |
पंछी और पंखेरू सब का, हो गया सुरभित जीवन ||
कोयल ने छेड़ी कूक, मयूर नाचा छनछन |
रंग-बिरंगी ओढ़ चुनरिया, बनी कुदरत दुल्हन |
गाने लगा गीत बसन्त के, नदियों-झरनों का पानी |
महकी संग हवाएं लेकर, आई बसन्त की रानी ||
खत्म हुआ आतंक शिशिर का, सबने खुशी मनाई |
बन्द हुए संदूकों में फिर, कम्बल और रजाई ||
धरती के कण-कण में फिर, नई उमंगे छाई |
भूल वेदना पतझड़ की ठूठों ने, कोपलों की माला सजाई ||
ऊँचे-ऊँचे हिमशिखरों का, नर्तन कर रहा पानी |
महकी संग हवाएं लेकर, आई बसन्त की रानी ||
पर्वत और ढलानों की फिर, लंबी ख़ामोशी टूटी |
रूत के सूरज से फिर, किरण बसंती फूटी ||
फूलों के मौसम में भ्रमरों ने, फिर से चाँदी कुटी |
इस बसन्ती मौसम की, सबने फिर मोजें लुटीं ||
खत्म हुई बेला ठिठुरन की, आई ऋतू सुहानी |
महकी संग हवाएं लेकर, आई बसन्त की रानी ||

                                         अशोक दर्द





व्यथा का पिटारा
जब भी ,
होता है मेरा गांव जाना तो ,                              
‘कर्मू’ मेरा पड़ोसी, बचपन का सखा ,
खोल देता है अपनी मुसीबतों का
पिटारा ,
मेरे आगे...,
बोलता है, अशोक बाबू !
जमाना बड़ा खराब आ गया,
परिवार बिखर गया है ,
सभी इधर-उधर जा बसे हैं ,
गावं की तरफ...,
देखते नहीं ;
मजदूरी से पेट नहीं पलता ,
मंहगाई जान निकालने लगी है ;
खेतों में फसल नहीं होती ,
पशु-पक्षी बीज ही चुनकर खा जाते हैं ;
‘घासनियाँ’ उदास हो गयी हैं ;
दीवारें और छतें साथ-साथ
होते हुए भी बतियाती नहीं ,
सुख-दुःख बांटती नहीं..,
जब पूछता हूँ उसके बच्चों बारे
तो..’
बोलता बिटिया दस कर के
घर बैठाई थी ,
क्योंकि आगे पढ़ाने की हिम्मत नहीं थी ,
फिर..,
ई.जी.एस. में टीचर लग गई थी ,
कुछ बरसों से ,
अब सरकार ने स्कूल कर दिया है ,
बेटी बेरोजगार हो गई
अब वह कई दिनों से
सुबह-सुबह घर से चली जाती है
धरने पर बैठने ,
और भी कई बच्चें हैं
उसकी नियति के...,
बेरोजगारी का दंश झेलते
सब दे रहे हैं  धरने
बैठें हैं अनशन पर
मगर.., उनकी कोई नहीं सुनता ;
लड़का बी.ए. ,बी.एड. है ,
वह भी वही कुछ कर रहा है
जो बिटिया शीनू कर रही है ;
धरना...हड़ताल...अनशन ;
मैं भी कई दिनों से
ठेकेदार के आगे-पीछे फिर रहा हूँ ,
कई महीनों की मजदूरी फंसी है
पैसे ही नहीं देता ,
बोलता है घाटा पड़ गया है ;
दो साल से ‘सांड’ भैंस
पाल रहा हूँ ,
जरुर कोई चेला ‘टकर’ गया है ,
घर वाली बीमार रहती है ,
दवाईयों के लिए पैसे नहीं होते ,
और भी बहुत कुछ होता है
उसके व्यथा के पिटारे में ,
जिसे मैं सुनना नहीं चाहता या
सुनकर अनसुना कर देता हूँ ,
मैं भी चाहता हूँ ,
अपनी नियति उससे सांझी करूँ ,
मगर...,
मैं उसकी नजरों में गिरना नहीं चाहता
इसलिए ,
दिल की बातें ,
दिल में छुपाए रखता हूँ
झूठे ओढ़े नकाब के अन्दर
ताकि ,
उसकी नजर में ,
मेरी आबरू
बची रहे..|| 
                     अशोक दर्द






“स्वतंत्रता के लिए”
स्वतंत्रता के लिए शीश कटाये, अमर क्रान्तिवीरों ने ,
मगर न अपने शीश झुकाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |                 
सिंचित कर लहू से अपने, इस आर्यवर्त की क्यारी में ,
आज़ादी के पुष्प खिलाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
डिगे न अपने प्रण से, लगा दी निज प्राणों की बाजी ,
तन-मन-धन सर्वस्व लुटाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
मिले प्रलोभन लाखों फिर भी, अविचल होकर डटे रहे ,
जान लुटा कर संस्कृति-संस्कृत-राष्ट्र बचाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
सुविधा-साधन सीमित थे पर, जिगरे से थे बहुत बहुत बड़े ,
दुश्मन क़दमों पर गिराये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
स्वतंत्रता के महायज्ञ में, देकर आहुति निज प्राणों की ,
माँ की कोख के मान बढ़ाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
सिंहो के संग खेलने वाले, श्रगालों से नहीं डरते हैं ,
कह कर जग वाले समझाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
कण-कण राष्ट्र का महक उठा, आजादी की खुशबु से ,
शहादत के जब फूल खिलाये, अमर क्रान्तिवीरों ने |
                                     अशोक दर्द 

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