Tuesday, January 21, 2014

तृषा मिटाओ


              
बदरवा तुम घिर-घिर कर आओ |
तृषित चातक की तृषा मिटाओ ||
बहुत दिवस हुए तुमको बरसे |
तृषित नयन वृष्टि को तरसे ||
हुए विफल स्वप्न अधमर से |
क्यों रूठे तुम चातक प्रियवर से ||
स्वप्नों में नवप्राण ले आओ |
तृषित चातक की तृषा मिटाओ ||
उमस भरी बह रही समीर |
हुआ विरही मन विफल अधीर ||
सही नहीं जाती अब निठुर तृषा –पीर |
ह्रदय विदीर्ण हुआ “लीरा-लीर” ||
इस विदीर्ण ह्रदय को सी जाओ |
तृषित चातक की तृषा मिताओ ||
यदा-यदा तुम विचरें गगन में |
स्वप्न अंगडाईयाँ लेते हैं मन में ||
एक पुलकन पुलकित हो तन मन में |
सुरमित स्वप्न कुसुमित हों मन-उपवन में ||
निर्ठुर मेघा न इन्हें कुम्हलाओ |
तृषित चातक की तृषा मिटाओ ||
तुम ही चातक के इक ठौर |
तुम बिन कौन करेगा गौर ||
न तुम बिन जग में कोई और |
हाथ तुम्हारे प्रिय चातक-जीवन-डोर ||
लो अपना अब कर्तव्य निभाओ |
तृषित चातक की तृषा मिटाओ ||
                                          अशोक “दर्द”

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