बदरवा तुम घिर-घिर
कर आओ |
तृषित चातक की तृषा
मिटाओ ||
बहुत दिवस हुए तुमको
बरसे |
तृषित नयन वृष्टि को
तरसे ||
हुए विफल स्वप्न
अधमर से |
क्यों रूठे तुम चातक
प्रियवर से ||
स्वप्नों में
नवप्राण ले आओ |
तृषित चातक की तृषा
मिटाओ ||
उमस भरी बह रही समीर
|
हुआ विरही मन विफल
अधीर ||
सही नहीं जाती अब
निठुर तृषा –पीर |
ह्रदय विदीर्ण हुआ
“लीरा-लीर” ||
इस विदीर्ण ह्रदय को
सी जाओ |
तृषित चातक की तृषा
मिताओ ||
यदा-यदा तुम विचरें
गगन में |
स्वप्न अंगडाईयाँ
लेते हैं मन में ||
एक पुलकन पुलकित हो तन
मन में |
सुरमित स्वप्न
कुसुमित हों मन-उपवन में ||
निर्ठुर मेघा न
इन्हें कुम्हलाओ |
तृषित चातक की तृषा
मिटाओ ||
तुम ही चातक के इक
ठौर |
तुम बिन कौन करेगा
गौर ||
न तुम बिन जग में
कोई और |
हाथ तुम्हारे प्रिय
चातक-जीवन-डोर ||
लो अपना अब कर्तव्य
निभाओ |
तृषित चातक की तृषा
मिटाओ ||
अशोक
“दर्द”
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