मैं हांकता रहता हूँ,
हरदम विचारों का रेवड़ ,
जैसे गडरिया हांका करता है,
अपनी
भेड़ों का रेवड़ |
मेरे विचारों का रेवड़ ,
कभी पहुँच जाता है ,
पर्वतों के पीछे बसी सुरम्य घाटियों में ,
तो कभी ,
घनी कंटीली झाडियों के मध्य से ,
लहुलुहान हुआ गुजरता है ,
कभी,
कलकलाते झरनों के किनारे ,
बड़ी-बड़ी चट्टानों को फलांघता है ,
तो कभी ,
नदियों के किनारे ,
बिछी रेत में ,
पदचिन्ह छोड़ता गुजरता है ,
बिल्कुल भेड़ों के रेवड़ की तरह |
गड़रिये के कुत्ते की तरह ,
मेरा विवेक ,
करता है रखवाली ,
मेरे विचारों के रेवड़ की |
जिस तरह निर्जन वनों से गुजरता रेवड़ ,
सहम जाता है ,
किसी भेडिये या बाघ जैसे हिंसक
जानवर की आवाज से,
ठीक उसी तरह ,
मेरे विचारों का रेवड़ भी,सुना करता है ,
ऐसी हिंसक आवाजें ,सैंकडो–हजारों....,
और ,
सहम जाया करता है
गाहे-वगाहे.., चलते-चलते ,
जिस तरह ,
गड़रिये का रेवड़ ,फिर ,
चरकर , थका-मांदा ,
आ जाता है फिर उसी
बाड़े में , रात गुजारने ,
जहां से गया था ,सुबह चरने ,
उसी तरह ,
मेरे विचारों का रेवड़ भी ,
आ जाता है अपने घर ,
घूम-फिर कर ,
आटे–चावल और नमक-मिर्च के
बाड़े में.......|||
*अशोक ‘दर्द’
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